इस बार एक अलग से मुद्दे पर कविता लिखी हैं , अपनी बुराई दिल खोलकर लिखी हैं , आपको मजा आ जायेगा ।
कितने घर उजाड़ दिए मेरे प्रेम ने और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ
हवाओ के झोको से उड़ जाने वाला हिमालय से टकराता फिरता हूँ
मेरी नाकामिया मुझे लेकर डूबी, रिश्तेदारिया मुझसे सारी रूठी
गलतियाँ ही मैंने सबकी ढूंढी , अच्छाई की तो आशा छूटी
नजदीकिया ना निभा पाया और दुरिया निभाता फिरता हूँ
मेरे पापो की सूची लम्बी और मैं चरित्र निभाता फिरता हूँ
मेरी मरती सांसो कि भी क्या कसमे खायी जाये
जिंदगी के बाद अब मौत की रस्मे लायी जाये
सूखी धरती मेरा प्यार और मैं दुनिया भिगोता फिरता हूँ
भ्रष्ट परंपरा मेरा आधार और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ
नोटों की गिनती पर मेरा इमान डोलता हैं
अपने मतलब के लिए हमेशा मेरा दिल बोलता हैं
जुर्म का मैं बेताज बादशाह और सत्संग कराता फिरता हूँ
संयम का गला घोंट दिया मैंने और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ
सत्ता की चापलूसी मेरी महत्वाकांक्षा हैं
सुन्दर रूपसी मिले ये भोंदू मन की आकांक्षा हैं
कट्टर हिन्दू मुस्लिम बन कर मैं भगवान् बनाता फिरता हूँ
धर्म की मुझे समझ नहीं और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ
आशा हैं मैंने आपको पूरा निराश किया होगा ,
झूठी एक संवेदना से पूरी कविता को जीया होगा
शब्दों की मेरी सीमा हैं फिर भी मैं ब्लॉग बनाता फिरता हूँ
बदनामी अपनी सारी छुपा ली और मैं चरित्र दिखाता फिरता हूँ
आप सबके श्री चरणों में नमन !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
वीरेन्द्र ..
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