रविवार, 25 अप्रैल 2010

श्री राधा जी का दिव्य प्रेम ( सच्चे प्रेम की परिभाषा )

हम वैसे इस योग्य तो नहीं कि राधा जी के विरह को समझ सकेवो तो शाश्वत परात्पर ब्रह्म क़ी ही चैतन्य शक्ति हैंपर हम तो ईश्वर के बेटे हैंइसीलिए बेटे को पिता के बारे में कहने के लिए कोई कागज़ी स्वीकृति कि आवशयकता नहीं होती

ईश्वर प्रेम या अपने सच्चे प्रेम लगभग एक जैसे लगते हैंसंसारी प्रेम में बस ये होता हैं कि इसमें कभी कभी मोह भी होता हैं तो भेद कर पाना मुश्किल होता हैंफिर भी चाहे कुछ भी हो अगर मोह हैं तो भी सारा ईश्वर को ही साक्षी मानकर किया जाये कि हे प्रभु उस लड़की का सौंदर्य भी तुने ही तो दिया और मेरे मन को कमजोर भी तुने ही तो कियाअब जैसी तेरी मर्ज़ीबस हममे सदा सच्चा प्यार ही देना


राधा जी के विरह की अवस्था देखिये , वो जब कृष्ण से कहती हैं कि कृष्ण मेरी दशा तो देखो जब तुम मेरे पास नहीं होते हो तुम्हारे विरह में तड़पती हूँ , पर जब तुम्हारे पास आती हु तो भी पहले पल से लेकर आखिरी पल तक यही सोचती रहती हूँ कि तुमसे आज अलग भी होना हैंमतलब दिल इतना बेक़रार होता हैं कि दूरी कि समय तो दुःख हैं कि प्रेमी पास नहीं हैं पर जब प्रेमी पास हैं तो उसके दूर हो जाने का दुःख हैंयही विरह का प्रेम हम सबके लिए पहेली बना रहता हैं कि क्यों वृन्दावन में राधे राधे गूंजती हैं

सच में क्यों ना गूंजेक्यों ब्रज चौरासी में सिर्फ राधे राधे ना होये कोई ज्ञान जैसी भारी भरकम वास्तु थोड़े ही हैं , ये तो अपने अहम् को खो देने वाली विधि हैं जिसमे मिट जाना हैं , बर्बाद करना हैं अपने आप कोकोई इच्छा नहीं कोई अपेक्षा नहीं
इस प्रेम को समझाने के लिए ही भगवान् कृष्ण ने परम ज्ञानी उद्धव जी को राधाजी के पास भेजा थाप्रेम तो सच में ज्ञान जैसा नहींहमें प्रेम का पता नहीं इसीलिए राधा जी को नहीं समझ पाते हैंजब उद्धव भी शुरू में नहीं समझ पाया तो मेरे जैसे की औकात नहीं हैंवो तो सच में गोपियाँ पा गयी और वो सचिदानंद उनका दास होकर भी कहता हैं कि गोपिओं मैं तुम्हारा ऋणी हु और कभी तुम्हारा बदला नहीं चुका सकता
राधा जी के प्रेम में कहाँ शारीरिक आकर्षण हैंअगर सच में ऐसा होता तो भगवान् कृष्ण जहाँ 16108 शादी कर सकते तो एक राधा जी से एक और कर लेतेये तो अलग मामला हैं साहब , पूज्य संत मोरारी बापू कहते हैं कि ज्ञान सच में दो कौड़ी कि वस्तु हैं प्रेम के सामनेबस आपने अपने प्रेमी को दिल दिया और आप ख़त्म या तबाह हो गएकोई कहीं के नहीं रहते , सिवाय रोने के कोई उपहार नहीं दे सकते अपने प्रेमी कोमैंने कथा से ही सुना हैं कि एक भक्तानी कहती हैं
" जो मैं ऐसा जानती कि प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती कि तुम प्रीत ना करिहों कोई "

और एक और दोहा सा हैं जो मैंने अपने गुरु बापूजी के सत्संग से सुना हैं कि गोपियाँ उद्धव जी को कहती हैं
"
ये मुहब्बत कि बाते हैं उद्धव , बंदगी अपने वश कि नहीं हैं
यहाँ सर देकर होते हैं सौदे आशिकी इतनी सस्ती नहीं हैं
प्रेम वालो ने कब किससे पूछा , किसको पूछू बता मेरे उद्धव
यहाँ दम दम पर होते हैं सिजदे , सर उठाने को फुर्सत नहीं हैं "

प्रेम भक्ति के ऊपर मेरी एक दूसरी पोस्ट भी मैंने पहले लिखी थो जिसमे गोपिओ और उद्धव जी का संवाद हैं
लिंक ये हैं

http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/ki.html

आशा हैं ईश्वर प्राप्ति के पथिको को अच्छा लगेगाविषय थोडा जटिल हैं , इसीलिए कोई गलती हो गयी हो तो कृपया मार्गदर्शन करें .

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

मेरी चौथी कविता प्यार की

मेरी इस कड़ी में चौथी कविता हैं , मेरी अपनी सच्ची घटना से सबंधित होने कारण इन चारो कविताओ को श्रृंखला बध पढ़े तो इससे मेरे दुःख को आप ज्यादा मनोरंजक पाएंगेतीसरी कविता का लिंक भी नीचे दे रहा हूँ , ( उस तीसरी पोस्ट में पहले और दुसरे भाग के भी लिंक हैं ) , तीसरे भाग का लिंक
http://saralkumar.blogspot.com/2010/04/blog-post_06.html

अब चौथी कविता ये हैं

वो जताती थी मुझे जैसे वो मेरे लायक नहीं हो
वीरेन मेरी वो प्रेम कथा जिसके तुम नायक नहीं हो

पर मैं बस इतना ही कह सका
क्यों मैंने साधक होने का ढोंग रचाया
क्यों ज्ञानी होने का दम्भ सजाया
वो तो हरि जप से ही मुक्त हो गयी
और मेरी गति पापो से युक्त हो गयी



मेरा प्यार उसके लिए हमेशा सच्चा था
वासना के लिए तो मेरा मन अभी कच्चा था
अगर ये वासना की नदी होती तो बह गयी होती
नहीं तो वो मुझसे क्यों कह गयी होती

तुम्हारा प्यार यु तो बिलकुल सागर जैसा हैं
मिट जाती जहाँ नदिया वो संगम वैसा हैं
बातें हैं दिल में पर बोला ना जाये
आंसू हैं आँखों में पर रोया ना जाए

काश वो मेरी मौत से कुछ पल पहले जाये
गोद में सिर हो उसके और सांसे मर जाये
आँखों में देखू उसके आखिरी सपना
ख़त्म हुआ वीरेन सब अब और नहीं जगना

हर रात को अब ना तारे गिनूंगा
जी ही ना पाया तो अब मरूँगा



अभी थोड़ी और पंक्तिया हैं पर मूर्त रूप नहीं दियाइसीलिए अभी तक के लिए इतना ही ।

रविवार, 11 अप्रैल 2010

सरल कुमार का इंग्लिश प्रेम ( हास्य व्यंग्य )

((( यह एक अपनी पुरानी पोस्ट को चेंज करके लिखी हैं )))))

सभी युवा भारतीयों में अपने पढ़ाई के आखिरी सालों में अपनी मातृभाषा से गद्दारी करने की बड़ी भयंकर लाइलाज बीमारी पायी जाती है । इसे कभी सुधारी हुई भाषा में इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स या ग्रुप डिस्कशन या Personality Development से भी परिभाषित किया जाता है । सभी कहते हैं की नोकरी और शादी दोनों बंदोबस्त करने हो तो फलां फलां संसथान के लेबल से आपके मार्केट वैल्यू में सेंसेक्स की तरह उफान आ सकता है । हालाँकि कोर्स पूरा करते ही पता नही क्यों "recession" नाम की विदेशी बीमारी आ धमकती है ।
हाँ तो बात सरल कुमार की करें । अपने इंजीनियरिंग फायनल साल में तीन चार होलीवुड फ़िल्म देखने के बाद इंग्लिश के दीवाने दोस्तों ने सरल का भी मन बना लिया की सिर्फ़ छत्तीस घंटे में रोज़गार की अपार संभावनाओं के रस्ते खुलना तय है। वैसे भी इंजीनियरिंग के चार साल लगाने के चार पैसे की नौकरी न मिलने के बाद तो घर बैठना तय था । कम से कम इस इंग्लिश कोर्स से बाद में जो आय होगी उन पाँच छः सौ रुपये में घर में काम करने वाली बाई तो रख सकेंगे
फीस के लिए घर में विश्वास मत सर्व सम्मति से पास हो गया पर बड़ी शर्त ये की छोटे भाई बहनों की इंग्लिश बिना कोर्स कराये ठीक होनी चाहिए । आख़िर कितनी सही सोच थी की जो छोटे भाई बहन अभी रो पीट कर ढंग से हिन्दी बोलना भी नही सीखें है अब इंग्लिश सीखेंगे। पहले दिन ही सारे ओजार खरीद लिए गए , मसलन पेन और नोट बुक क्योंकि इंजीनियरिंग में तो दोस्तों के पेन मारकर और पन्ने फाड़कर ही कम चल गया था । पर यहाँ तो कुछ प्रोफैशनल एप्रोच जैसा ड्रामा करना जरुरी था । impression बनने की बात थी पता नही किसके सामने , या तो मोहल्ले के उन लोगों के सामने जो सरल कुमार की प्रतिभा पर हमेशा शक करते थे या फ़िर कोर्स की उन लड़किओं के सामने जो rejected लड़कों को कभी भी भइया की संज्ञा देकर एक अच्छा भला करियर चौपट कर सकती थी ।
फ़िर धीरे धीरे क्लास जमनी शुरू हो गई । देर रात तक उलटे सीधे अंग्रेज़ी अखबार और पत्रिकाएं जिनके हर शब्द के लिए सरल को "advanced learner oxford dictionary " सर पर रखकर तांडव करना पड़ता है। कोर्स फीस के साथ बिजली बिल को जोड़ लेने को माता पिता का सुझाव कितना पारदर्शी था। पर अभी भी शब्दों की कमी साफ़ थी । किसी नए नए इंग्लिश टीचर ने शब्दों को सीधे अनुवाद की राय देकर जब सरल कुमार की नोट बुक देखि तो अपना ही माथा पकड़ लिया । शब्दों का अर्थ अनर्थ कर रहा था । कुछ शब्दों का अर्थ तो महा -dictionary में भी नही मिला फ़िर हारकर सरल के ही पैर पकड़े और अर्थ पूछा , कुछ शब्द ये है :-

आलूबुखारा :- potato fevera ( पोटेटो फीवरा )
कान्खाजूरा - ear data ( इयर डेटा )
मोरी ( नाली ) -peacocki (पिकोकी )

फ़िर वो टीचर उस इंस्टिट्यूट में फ़िर दिखाई नही दिया । सरल को अब काफी संभावनाएं नज़र आने लगी थी जैसे अब वो आईएस के पेपर दे देगा , एक आईएस पूरे जिले का हेड होता है । हर साल सिर्फ़ चार सौ भाग्यशाली युवा ही इसे पास करते हैं । एक राज्य में सिर्फ़ सो या डेढ़ सो आईएस होते हैं । कितना सम्मान और ये सब इंग्लिश के कारन । क्या पता क्रिकेट में किस्मत खुल जाए कम से कम ढंग की स्पीच तो हो जाएगी क्रिकेटर इंजमाम उल हक के जैसी
आज आखिरी दिन ख़त्म करके वो घर आया तो छोटे भाई से टीवी का रिमोट छीनकर इंग्लिश न्यूज़ चैनल देखने लगा । ठेठ हरयाणवी में हरियाणा के मुख्यमंत्री जी भाषण दे रहे थे जो सिर्फ़ उनके कार्यकर्ताओं के अलावा किसी को समझ नही आ रहा था । सारे आईएस वहां सिर्फ़ सलामी देने का काम कर रहे थे । या फ़िर बुत की तरह खड़े थे । एक सरपंच आकर धक्का देकर आईएस को कुछ %&#*&*#$#%$ शब्दों का आदान प्रदान करके मुख्यमंत्री जी के गले मिलता है ।
दुःख में आकर सरल ने हिन्दी न्यूज़ चैनल पर लगाया , वहां लालू यादव जी की रेल बजट पेश हो रहा था । इंग्लिश देखकर सरल के सपने हवा हो गए आईएस बनने के । फ़िर दूसरे चैनल पर महाराष्ट्र को देश से भी बड़ा बताने वाली एक पार्टी के लोगो द्वारा हिन्दी भाषी नेता की पिटाई देखी

बस सरल को लगा सब बातें है । पर इतना तय है को सरल कुमार के तीन हज़ार रुपये , बिजली बिल , नौकरी और शादी सब तबाह हो गए.


गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

वैराग्य पूर्ण भजन - एक खुद मस्ती बिन और मस्त ............

यह थोडा वैराग्य जगाने वाले भजनों में से एक हैं । इसके मूल लेखक और मूल स्रोत का मुझे अभी पता नहीं हैं । आप में किसी को पता हो तो कृपया मुझे बताये जिससे मैं वो भी यहाँ लिख सकू ।
ये भजन मैंने बापूजी के सत्संग में सुना हैं । मूल भजन में कई शब्द कठिन हैं । इसीलिए उनकी जगह पर मैंने साधारण शब्द डाल दिए हैं । इस भजन में बताया गया हैं की हम सब बस किसी ना किसी चीज़ को एक तरह से अपनी जिम्मेदारी बनाकर या समझकर पूरी जिंदगी बना लेते हैं । कुछ ना कुछ बहाना सा बना ही रहता हैं जीवन का । फिर भी संत हमें बताते हैं की थोडा अपने जीवन के मूल उद्देश्य को प्राप्त करने पर भी ध्यान देना चाहिए । उस मूल को प्राप्त ना करने के कारन हम अविद्या रूप फांसी में फंस कर मार जाते हैं ।
आशा हैं ईश्वर यात्रा के पथिको को यह पसंद आएगा

कोई अकल मस्त कोई शकल मस्त कोई चंचलताई हांसी में
कोई वेद मस्त कितेब मस्त कोई मक्के में कोई काशी में
कोई ग्राम मस्त कोई धाम मस्त कोई सेवक में कोई दासी में
एक खुद मस्ती बिन और मस्त सब बन्दे अविद्या फांसी में

कोई हाल मस्त कोई माल मस्त कोई तूती मैना सुए में
कोई खान मस्त पहरान मस्त कोई राग रागिनी दोहे में
कोई अमल मस्त कोई रमल मस्त कोई शतरंज चौपड़ जुए में
एक खुद मस्ती बिन और मस्त सब बन्दे अविद्या कुए में

कोई पाठ मस्त कोई ठाठ मस्त कोई भैरो में कोई काली में
कोई ग्रन्थ में कोई पंथ मस्त कोई श्वेत पीत रंग लाली में
कोई काम मस्त कोई खाम मस्त कोई पूरण में कोई खाली में
एक खुद मस्ती बिन और मस्त सब अविद्या जाली में

कोई हाट मस्त कोई घाट मस्त कोई वन पर्वत उजाड़ा में
कोई जात मस्त कोई पांत मस्त कोई तात भ्रात सूत दारा में
कोई कर्म मस्त कोई धर्म मस्त कोई मस्जिद ठाकुर द्वारा में
एक खुद मस्ती बिन और मस्त सब बहे अविद्या धारा में

कोई रिश्तो में मस्त कोई ख़ाक मस्त कोई खासे में कोई मलमल में
कोई योग मस्त कोई भोग मस्त कोई स्थिति में कोई चलचल में
कोई ऋद्धि मस्त कोई सिद्धि मस्त कोई लेन देन की कलकल में
एक खुद मस्ती बिन और मस्त सब फंसे अविद्या दलदल में

कोई उर्ध्व मस्त कोई अधः मस्त कोई बहार में कोई अंतर में
कोई देश मस्त विदेश मस्त कोई औषध में कोई मंतर में
कोई आप मस्त कोई ताप मस्त कोई नाटक चेटक तंतर में
एक खुद मस्ती बिन और मस्त सब बन्दे अविद्या अंतर में

कोई खाली पेट मस्त कोई भरे पेट मस्त कोई दीर्घ में कोई छोटे में
कोई गुफा मस्त कोई सूफा मस्त कोई तुम्बे में कोई लोटे में
कोई ज्ञान मस्त कोई ध्यान मस्त कोई असली में कोई खोटे में
एक खुद मस्ती बिन और मस्त सब रहे अविद्या टोटे में

ऐसी ही कुछ हमारी दशा होती हैं और हम कोई ना कोई बहाना बना ही लेते हैं पर जब तक ईश्वर की कृपापूर्ण आत्मस्ती या भक्ति का प्रसाद नहीं मिलता तब तक तो सब कुछ पाया अनपाये के समान ही हैं ।
धन्यवाद
वीरेन्द्र

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

मेरी तीसरी कविता ( मेरा प्यार रिश्तो का मोहताज़ नहीं )

ये इस कड़ी में मेरी तीसरी कविता हैं । लिख तो पहले ही ली थी । पर तनाव के कारण बहुत सारी दुखी चीज़े इसमें डाल दी थी । पर अब थोडा कम दुःख वाली बनायीं और जो बाते थोड़ी साझी समझ वाली थी वो इसमें डाल दी ।
इसके पहले और दुसरे भाग के लिंक ये हैं
पहला भाग
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_9229.html
दूसरा भाग
http://saralkumar.blogspot.com/2010/04/blog-post.html

वैसे इस तीसरी कविता के भी दो भाग आपको लगेंगे क्योंकि थोडा सा थीम अलग लगेगा आपको शुरू कि चार पांच पंक्तियो का और आख़िरी की चार पांच पंक्तियो का . एक तरह से पहले भाग में हम दोनों की बातचीत ही विषय हैं और दुसरे में सिर्फ मेरा दर्द का भाव हैं जो अपने आप से कह रहा हूँ ।


क्या मैं कभी उसके ख्वाब सजा पाउँगा
छूकर उसके गालो को ये कह पाउँगा

आंधियो से जो उड़ जाता मैं वो तख्तो ताज नहीं
मेरा प्यार तुमसे कभी रिश्तो का मोहताज़ नहीं

तुम्हे मेरी ना आज जरुरत तो कल की तकदीर बन जाऊंगा
ना जरुरत तुम्हे आज पति की तो कल बेटा बनकर आऊंगा

कोई बात नहीं अगर इस जन्म में तेरा पति ना बन पाया
तू भी देख लेना अगर उस जन्म में तेरा बेटा ना बनकर आया

तब ये समय बताएगा की क्या ये पंचतत्वो की माया थी
या ईश्वर संकल्प में लिपटी वो मेरे इष्टदेव की छाया थी

पोंछ लेता था कभी सबके आंसू पर पर अब अपने रुक नहीं पाते हैं
मेरे सारे पिछले तर्क कहाँ मुझे अब तसल्ली दे पाते हैं

बीच भंवर में नाव हैं मेरी पर दिखता कोई किनारा नहीं
डूब रहा हूँ समन्दर में तिनके का भी सहारा नहीं

कहना चाहू उसको ,पर होठो को सी जाऊ
आंसू भी आँखों में आये चुपके से पी जाऊ

बस समझ गया कैसे वीरेन शायर हो जाता हैं
फंस के प्यार के धागों में कैसे कोई कायर बन जाता हैं

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

दैनिक कड़िया भाग छः

सानिया कि शादी पर बवाल
हमारा देश भी इतने मज़ेदार बुद्धू लोगो से भरा हैं कि जो खबर हो उसकी तो मरम्मत करते ही हैं पर साथ में बे जरुरी बातो से पूरे माहौल को हम टी वी सीरियल बना देते हैं । एकता कपूर ने हमारी सही नस पकड़ी और बेमतलब के शादी के झमेले के विकल्प हमें बना कर दिए । सानिया की शादी पर मचे बवाल पर गंभीरता कम और कोमेडी ज्यादा दिख रही हैं

कल एक न्यूज़ चैनल पर कुछ छुटभैया नेता एक बैनर लेकर कैमरा के सामने चिंता दिखा रहा था । बैनर पर लिखा था " सानिया मिर्ज़ा को बधाई क्योंकी दाऊद और कसाब उसके भाई " । खाली बैठे कार्यकर्ताओ को जैसे सानिया ने रोज़गार दीया । वैसे भी इनको कौन बताये की सानिया एक पेशेवर खिलाडी हैं इनका देश की शान से कोई मतलब नहीं होता हैं । इनको तो कोई भारत की नागरिकता से भी मतलब नहीं होता हैं ।

और भी शर्मनाक हैं की एक राष्ट्रिय पार्टी को बोलना पड़ा की हमें सानिया की शादी से कोई आपत्ति नहीं हैं । असल में बेचारे प्रवक्ता क्या करे मीडिया वाले और उनके छोटे नासमझ कार्यकर्ता बिन बात के मुद्दे उठा लेते हैं ।देश में और भी समस्याए हैं पर हम बेवक़ूफ़ शोएब मालिक की पूर्व पत्नी के पिता और पहली शादी के मौलवी का एक्सक्लूसिव भाषण सुन रहे हैं ।

हमें क्या ज्यादा जरुरत हैं दूसरो के व्यक्तिगत कामो में फंसने की । क्या हम अपनी शादी में मोहल्ले की राय लेते हैं । अपने ही परिवार के सारे लोग भी संतुष्ट नहीं होते हैं । हमने करना धरना कुछ नहीं , बस तीन चार चाय पी और सानिया मिर्ज़ा को पीकर कोसना हैं की हम क्या मर गए थे ( वैसे ये जायज वजह हो सकती हैं विरोध की ) ।अगर सच में विदेशो में शादी बंद होनी चाहिए तो फिर सोनिया गाँधी के खिलाफ भी तो कोई मोर्चा निकालिए आपके दिन अपने आप सलाखों में कटेंगे

ऐसे ही एक ड्रामा पिछले साल हरयाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के बेटे श्री चंद्रमोहन ( चाँद मोहम्मद कहू , कुछ समझ नहीं रहा ) और सीमा ( फिजा ) की फर्जी शादी , फर्जी तलाक और फिर फर्जी सुलह फिर फर्जी अपहरण , मतलब सब फर्जी और हमारी फर्जी मीडिया ये सब दिखाती रही .

एक खबर /निर्णय / कानून नपुन्सको के लिए
पंजाब और हरियाणा में अब से नपुंसक के सारे नियम और अधिकार वही लागु होंगे जो पुरुषो पर होंगे । ज्यादा कुछ लिखने के लिए इसमें हैं ही नहीं ।

खेल मंत्री का बयान
हमारे खेल मंत्री ( पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ) श्री गिल ने कहा हैं की आई पी एल का देश भक्ति से कोई सबंध नहीं हैं ।उन्हें कौन समझाए की कानून से हिसाब से तो 1983 के विश्व कप के बाद से क्रिकेट का देश से ही मतलब ही नहीं हैं क्योंकि सरकार ने इसे एक स्वायत संस्था बना दिया था मतलब एक कम्पनी की तरह काम करने वाली संस्था और हम बेवक़ूफ़ बेमतलब इसको राष्ट्रिय अस्मिता मानकार इसके लिए समय वेस्ट करते हैं ।

जिंदगी में सब इतना ख़राब लगता हैं कि जीने का मन नहीं करता ।

मेरे पोस्ट ज्यादातर यथार्थ , दुःख और धर्म से जुड़े होते हैंअसल में जीवन में यही सब देखा हैं इसीलिए क्रिकेट ,फ़िल्मी मस्ती , राजनीति में अब मजा नहीं आता हैंबीस साल ( अभी तीस ) तक कि उम्र तक ही सब देखकर लगा कि दुनिया में कही गड़बड़ हैंमाया मोह समाज धर्म को समझने कि कोशिश कि तो थोडा थोडा वैराग्य आयाइंजीनियरिंग पूरी करते करते दोस्त तो प्रोफेशनल हो चुके थे पर मैं एक सन्यासी जैसे साधारण हो चुका थाकोई ज्यादा अच्छा बुरा सोचा नहीं हर चीज़ को गहरे में उतरने नहीं दिया सिवाय धर्म और वैराग्य के

खैर मैं ये सब बाते इसीलिए लिख रहा हूँ आप में से बहुत से लोग सच में बहुत अच्छे हैं जो टिपण्णी भी देते हैं जबकि मैं खुद किसी को टिपण्णी नहीं देता हूँसारे समाज को देखकर लगता हैं कि जैसे हम सब मदहोश से जी रहे हैं बिना किसी मार्गदर्शन केबस शायद सत्तर अस्सी साल कि उम्र तक होकर मर जाने के लिए सारा संघर्ष हैंसाथ के कई दोस्त देहांत को प्राप्त हो चुके हैंअभी कल ही मेरी एक एक्स क्लास मेट (MBA में ) कि मृत्यु का पता चलासारा प्रोफेशनल और इंजीनियरिंग प्रोफाइल धडाक धूमसब इतना ख़राब लगता हैं कि जीने का मन नहीं करता

कहाँ
हम सरकारों में कमी निकालते हैंपर घर में एक साथ कुछ दुर्घटना हो जाये तो बस सब ख़त्मफिर आप समाज से लगभग पांच साल पीछे चले जाते हो क्योंकि आपको भावनाए समाज के साथ संतुलन नहीं बनाने देतीसांसारिक काम इतने मुश्किल लगते हैं कि लगता हैं क्यों हम सब जैसे जिंदगी को बोझे कि तरह ढोए जा रहे हैंजैसे एक सच्चा उदहारण बताता हूँमेरे पिता जी 2004 में मेरे इंजीनियरिंग के आखिरी साल में स्वर्गवासी हुएअब क्योंकि मेरे अकेले के लिए तो एग्जाम डेट बदलेंगी नहींसाल ख़राब होगा , यहाँ जिंदगी ख़राब हो गयी और प्रोफेशनल सोच कह रही हैं कुछ और

उस
महीने में हम दूरसंचार इंजिनियर के लिए G P S तकनीकी कि ट्रेनिंग भी मिली और मैंने उसमे अच्छे नम्बर भी लायेपर क्या ये सही लगता हैं कि जिंदगी कि मूलभूत चीजों को छोड़कर हम बेमतलब कि तथाकथित वैज्ञानिक जानकारी और भी ना जाने क्या क्या प्रोफेशनल एप्रोच जैसे भंवर जहाँ एक आदमी खो जाता हैं
सब कहते हैं कि ईश्वर दयालु हैंऔर वो वास्तव में हमारी अपेक्षा से ज्यादा दयालु हैंफिर भी हम उसकी तरफ जाने में क्यों आलसी हो जाते हैं

मेरी
तो उम्र खैर तीस साल ही हैं पर मैंने साठ सत्तर साल के लोगो को दुनिया के मामलो में बुरी तरफ फंसे देखा और ऊपर से मुझ जैसे बन्दों को भी नसीहते देते सुना कि बेटा अपने कम धंधे करो परिवार से निभाओ आदि आदि बातेये सब बाते तो हम कर ही रहे हैंपर दिक्कत यही तो हैं कि हमसे ये दुनिया ये जिंदगी कभी भी छीन सकती हैं , और बस कुछ व्यावहारिक लोग हमारी मृत्यु पर बाते ही बनाते दिखेंगे कि बंदा अच्छा था बुरा , ऐसे हुआ वैसे हुआऔर फिर पंद्रह दिन बाद फिर जिंदगी वही

अभी जैसे ब्लॉग को ही लेमुझे किसी ने पिछले साल कहा था कि ये एक अच्छा मंच हैंपर अब यहाँ भी वही अखबार और मीडिया के लोगो ने गन्दगी फैलाकर हिन्दू मुस्लिम माहौल तैयार कर दिया हैं
पता नहीं छः सो ग्राम के दिमाग से उस ईश्वर को जज करते हैं जो खुद कहता हैं कि मुझे कोई नहीं जनतावैसे एक दो पोस्ट मैंने इस पर भी लिखी थी पर कुछ ज्ञान शिरोमणि मुझे सीख देने गए कि ये तो सरल रस्ते हैं और आपकी ये बाते तो पहले भी लिखी हैंबड़ी मुश्किल से ऐसे लोगो से चरण वंदना करके बचता हूँइनमे से दो के लिंक ये हैं
ईश्वर को कैसे जाने
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_06.html
ईश्वर प्राप्ति के सरल साधन
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html
जीवन का उद्देश्य
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_1312.html

हर बात के बात मेरे कहने का मतलब यही हैं क्यों नहीं हम सब एक दुसरे को प्यार करते , क्यों नहीं मदद करते एक दुसरे कि , समर्थन क्यों नहीं करतेपता नहीं कितने दिन कि जिंदगी हैं सब क्यों बरबाद करे ऐसी बातो में कि हिन्दू बड़े या मुस्लिमकांग्रेस या भाजपा , अमेरिका या चीन

सारा
संक्षेप तो यही हैं कि व्यवहार के लिए थोडा थोडा तो करें पर व्यर्थ समय ख़राब करके एक एक घंटे न्यूज़ वालो से बहस करना ठीक नहीं हैं । हमने बस टाइम पास करना होता हैंकभी उस ईश्वर से भी पूछे कि तू क्या चाहता हैंतेरे इस एक तरफा प्यार पर हमें अपनी शरण में ले क्यों हम डरे और डरे , फंसे और फंसाए .

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...