गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

एक कविता- कह देना कुछ ख़ास नहीं

ये कविता मैंने इन्टरनेट से ही ली । इसके exact लिंक का मुझे अभी पता नहीं हैं । बस मैंने इसे देवनागरी में लिखा हैं जो उम्मीद हैं आपको अच्छी लगेगी । अगर आप में किसी को इसके मूल लेखक के बारे में पता चले तो बता देना जिससे मैं पोस्ट में उनका लिंक डालकर उन्हें इसका पूरा श्रेय दे सकूँ

कोइ तुमसे पूछे कौन हूँ मैं, बस कह देना कोई ख़ास नहीं
एक दोस्त कच्चा पक्का सा , एक झूठ आधा सच्चा सा
दर्द ढके परदे जैसा , वो बहाना है सबसे अच्छा सा
जीवन का एक साथी है, जो दूर हो के पास नहीं है
कोई पूछे कौन हूँ मैं , बस कह देना कोई ख़ास नहीं

हवा का एक वो झोंका है , कभी शांत तो कभी तूफानों सा
शकल देख नजरे झुका ले, सबसे प्यारा कभी बेगानों सा
वो जिंदगी का समंदर, पास है पर किसी को प्यास नहीं ,
कोई पूछे कौन हूँ मैं , बस कह देना कोई ख़ास नहीं

एक साथी जो बिना कहे भी सब कुछ कह जाता है
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है
यूँ तो उसके होने का कुछ गम नहीं
पर कभी आंसू बनकर बह जाता है
यूँ रहता तो मेरे दिल में ही है
पर आँखों को उसकी तलाश नहीं

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
बस कह देना कोई ख़ास नहीं

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

वंशावली भाग छः - भगवान के अवतार (दस पूर्णावतार )

भगवान विष्णु के शास्त्रों ने चौबीस अवतार माने हैं । इनमे दस पूर्णावतार हैं और चौदह अंशावतार हैं । मेरी पिछली वंशावली वाली पोस्टों में आप सन्दर्भ ले सकते हैं जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी आपको समझने में दिक्कत ना हो । क्रम से वंशावली ये हैं ।

पहला अवतार : ( मत्स्यावतार )
सातवें मनु श्री सत्यव्रत महाराज के समय में भगवान् हरि ने अवतार लियाiके सूर्य इस बार के सूर्य के पुत्र हैं । जब पिछले कल्प के अंत का समय आया तो भगवान् विष्णु ने राजा सत्यव्रत को एक सप्ताह पहले मछली के रूप में आकर कहा की वो एक बड़ी नाव बनाये जिसमे सप्त ऋषि और संसार की समस्त ओषधि आ सके । फिर एक सप्ताह बाद जब सारा संसार जल में डूबने लगा तो विष्णु जी ने अपने मत्स्य रूप को बड़ा किया और उस नाव को अपने सींग से बांधकर कल्प की रात्रि में खड़े रहे । फिर दोबारा से मनु महाराज को नयी सृष्टि प्रारंभ करने का मार्गदर्शन दिया । इससे आगे की कथा आप पुरानों से भी पढ़ सकते हैं ।

दूसरा अवतार ( कच्छपावतार)
ये इस कल्प में राजा बलि के समय में जब समुन्द्रमंथन हुआ तो इंद्र और बलि ने मंदराचल पर्वत को रई की तरह प्रयोग किया और रस्सी की तरह वासुकी नाग को प्रयोग किया । इसमें समस्या यह हुई की मंदराचल पर्वत समुन्द्र के अन्दर धंसता चला गया , जिससे देवताओं और राक्षसों के अनुग्रह पर भगवन ने कछुए का रूप धारण करके मंदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया और समुन्द्र मंथन में सहायता करने लगे। वैसे इसी समय विष प्रकट हुआ जिसे भगवान् शिव ने धारण किया और नीलकंठ कहलाये ।

तीसरा और चौथा अवतार (वराह अवतार और नरसिंह अवतार )
कश्यप ऋषि की दो प्रमुख पत्निया थी दिति और अदिति । अदिति के देवता आदि कई पुत्र हुए । दिति के दो राक्षस पुत्र हुए हिरनकश्यप और हिरण्याक्ष । पहले हिरण्याक्ष को मारने के लिए वराह ( सूअर ) का अवतार लिया भगवान् ने और आपने दांतों से जल में समाई पृथिवी को बाहर ले आये और अपने शापित पार्षद जय और विजय को रूप में हिरण्याक्ष और फिर प्रहलाद के पिता हिरन्यकश्यप को नरसिंह बनकर उद्धार कर दिया ।
वैसे यहाँ काबिले गौर हैं सनकादी ऋषियों के श्राप से जय विजय को तीन बार मनुष्य लोक में जन्म लेना पड़ा था
इनका पहला जन्म तो हिरन्यकश्यप और हिरण्याक्ष का हुआ । दूसरा रावन और कुम्भकर्ण और तीसरा यदुवंश में शिशुपाल और दन्तवक्र ( श्री कृष्ण के बुआ के पुत्रों के रूप में ) के रूप में हुआ


पांचवा अवतार (वामन अवतार )
इंद्र के छोटे भाई के रूप में जन्म लिया और पिता कश्यप और माता अदिति से जन्म लिया .
राजा बलि के से तीन पग भूमि मांगने वाले विष्णु जी ने छोटे कद का रूप बनाया और राजा बलि की दानशीलता को अमर बनाया और उन्हें आठवे कल्प में इंद्र बनाने का वरदान दिया । सारा वैभव राजा बलि से जीतकर अपने बड़े भाई इंद्र को सौंप दिया।


छठा अवतार ( भगवान् परशुराम )
रिचिक मुनि के पुत्र जमदग्नि के पुत्र के रूप में एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया और इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर के ब्राह्मणों को दान कर दिया । एक हज़ार भुजाओ वाले सहस्त्रबाहु अर्जुन के हैहयवंश का संहार कर दिया और भगवान् राम के सीता स्वयंवर के बाद साधना के लिए चले गए और अब भगवान् के कल्कि अवतार तक के लिए गुप्त स्थान पर चले गए।

सातवाँ और आठवां अवतार ( राम और कृष्ण अवतार )
सबको इन अवतार के बारे में पहले से ही सारी जानकारी ज्ञात हैं । रावन और कुम्भ कर्ण को भगवान् राम ने संहार का दिया और इनके जय और विजय के तीसरे जन्म में शिशुपाल और दन्तवक्र बनकर आये अपनी बुआ ( कुंती की बहने ) जी के पुत्रों का भगवान् कृष्ण ने समाप्त कर उद्धार कर दिया ।

नवां अवतार ( भगवान् बुध )
लगभग चार सो इसा पूर्व ( 400 B. C. ) में भगवान् बुध के रूप में नौवा अवतार हुआ । इनके बारे में भी सभी को पता हैं

दशम अवतार ( भगवान् कल्कि )
कलयुग के आखिरी समय में लगभग तीन लाख पचपन हज़ार साल बाद उत्तर प्रदेश के संभल ग्राम में पंडित विष्णु यशा के घर में अंतिम अवतार होगा । इनके बारे में भी पुरानो में विस्तृत जानकारी उपलब्ध हैं ।
इस अवतार से कई लोग जुड़े हैं जैसे माता वैष्णो देवी जो भगवान् राम को पति रूप में ना पाकर उनके कल्कि रूप में पति रूप में स्वीकारेंगी । राम की पीढ़ी के राजा मरू और भीष्म पितामह के ताऊ देवापी भी उस समय प्रगट होंगे । भगवान् परशुराम और ज्ञानी याज्ञवल्कय भगवान् के गुरु और मार्गदर्शक होंगे । यह संक्षेप में इस अवतार का वर्णन हैं ।

अगर मुझसे लिखने में कोई त्रुटी हो गयी हो तो कृपया मार्गदर्शन करें जिससे मैं उसमे सुधार कर सकूँ .
चौदह अंशावतारों का वर्णन किसी दूसरी पोस्ट में समय आने पर करूँगा

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

श्री सुरेशानंद जी का वैराग्यपूर्ण भजन -आश्रम की कैसेट "भजन सागर" से



तेरा हीरा जन्म बीता जाए रे , भजन कर गोविन्द का
कल कल करके टाल न भाई बड़े भाग्य से नर देह पाई ,
कर ले जग में नेक कमाई काल बदरिया सर पर छाई ,
फ़िर पीछे पछताए रे , भजन कर गोविन्द का
तेरा हीरा जन्म ...........
राम राम राम राम राम राम राम राम

दो दिन का है रैन बसेरा जिस दम तुझको कल ने घेरा
कोई न होवे साथी तेरा हो जाए शमशान में डेरा ,
तुझे छोड़ अकेला आए रे ,भजन कर गोविन्द का ,
तेरा हीरा जन्म ..............

ठाठ तेरा सब पड़ा रहेगा भजन ही तेरे संग चलेगा
भजन बिना भव कैसे तरेगा ,अवसर बीते हाथ मलेगा ,
तू हाथ पसरे जाए रे , भजन कर गोविन्द का ,
जय सिया राम ..

कुटुंब की खातिर क्यूँ मरता है मेरा मेरा क्यूँ करता है
पाप की गठरी सिर रखता इस झगड़े में क्यूँ पड़ता है
भटक भटक मर जाए रे ,
जय सिया राम ...

यह तो दो दिन का है मेला जाना पड़ेगा तुझे अकेला
छला छली का लगे झमेला आया अकेला चला अकेला
मत कर हाय हाय रे ।
राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम

रविवार, 13 दिसंबर 2009

सरल कुमार का इंग्लिश प्रेम -हास्य व्यंग्य

सभी युवा भारतीयों में अपने पढ़ाई के आखिरी सालों में अपनी मातृभाषा से गद्दारी करने की बड़ी भयंकर लाइलाज बीमारी पायी जाती है । इसे कभी सुधारी हुई भाषा में इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स या ग्रुप डिस्कशन या Personality Development से भी परिभाषित किया जाता है । सभी कहते हैं की नोकरी और शादी दोनों बंदोबस्त करने हो तो फलां फलां संसथान के लेबल से आपके मार्केट वैल्यू में सेंसेक्स की तरह उफान आ सकता है । हालाँकि कोर्स पूरा करते ही पता नही क्यों "recession" नाम की विदेशी बीमारी आ धमकती है ।
हाँ तो बात सरल कुमार की करें । अपने इंजीनियरिंग फायनल साल में तीन चार होलीवुड फ़िल्म देखने के बाद इंग्लिश के दीवाने दोस्तों ने सरल का भी मन बना लिया की सिर्फ़ छत्तीस घंटे में रोज़गार की अपार संभावनाओं के रस्ते खुलना तय है। वैसे भी इंजीनियरिंग के चार साल लगाने के चार पैसे की नौकरी न मिलने के बाद तो घर बैठना तय था । कम से कम इस इंग्लिश कोर्स से बाद में जो आय होगी उन पाँच छः सौ रुपये में घर में काम करने वाली बाई तो रख सकेंगे
फीस के लिए घर में विश्वास मत सर्व सम्मति से पास हो गया पर बड़ी शर्त ये की छोटे भाई बहनों की इंग्लिश बिना कोर्स कराये ठीक होनी चाहिए । आख़िर कितनी सही सोच थी की जो छोटे भाई बहन अभी रो पीट कर ढंग से हिन्दी बोलना भी नही सीखें है अब इंग्लिश सीखेंगे। पहले दिन ही सारे ओजार खरीद लिए गए , मसलन पेन और नोट बुक क्योंकि इंजीनियरिंग में तो दोस्तों के पेन मारकर और पन्ने फाड़कर ही कम चल गया था । पर यहाँ तो कुछ प्रोफैशनल एप्रोच जैसा ड्रामा करना जरुरी था । impression बनने की बात थी पता नही किसके सामने , या तो मोहल्ले के उन लोगों के सामने जो सरल कुमार की प्रतिभा पर हमेशा शक करते थे या फ़िर कोर्स की उन लड़किओं के सामने जो rejected लड़कों को कभी भी भइया की संज्ञा देकर एक अच्छा भला करियर चौपट कर सकती थी ।
फ़िर धीरे धीरे क्लास जमनी शुरू हो गई । देर रात तक उलटे सीधे अंग्रेज़ी अखबार और पत्रिकाएं जिनके हर शब्द के लिए सरल को "advanced learner oxford dictionary " सर पर रखकर तांडव करना पड़ता है। कोर्स फीस के साथ बिजली बिल को जोड़ लेने को माता पिता का सुझाव कितना पारदर्शी था। पर अभी भी शब्दों की कमी साफ़ थी । किसी नए नए इंग्लिश टीचर ने शब्दों को सीधे अनुवाद की राय देकर जब सरल कुमार की नोट बुक देखि तो अपना ही माथा पकड़ लिया । शब्दों का अर्थ अनर्थ कर रहा था । कुछ शब्दों का अर्थ तो महा -dictionary में भी नही मिला फ़िर हारकर सरल के ही पैर पकड़े और अर्थ पूछा , कुछ शब्द ये है :-

आलूबुखारा :- potato fevera
कान्खाजूरा - ear data
मोरी ( नाली ) -peacocki

फ़िर वो टीचर उस इंस्टिट्यूट में फ़िर दिखाई नही दिया । सरल को अब काफी संभावनाएं नज़र आने लगी थी जैसे अब वो आईएस के पेपर दे देगा , एक आईएस पूरे जिले का हेड होता है । हर साल सिर्फ़ चार सौ भाग्यशाली युवा ही इसे पास करते हैं । एक राज्य में सिर्फ़ सो या डेढ़ सो आईएस होते हैं । कितना सम्मान और ये सब इंग्लिश के कारन । क्या पता क्रिकेट में किस्मत खुल जाए कम से कम ढंग की स्पीच तो हो जाएगी क्रिकेटर इंजमाम उल हक के जैसी
आज आखिरी दिन ख़त्म करके वो घर आया तो छोटे भाई से टीवी का रिमोट छीनकर इंग्लिश न्यूज़ चैनल देखने लगा । ठेठ हरयाणवी में हरियाणा के मुख्यमंत्री जी भाषण दे रहे थे जो सिर्फ़ उनके कार्यकर्ताओं के अलावा किसी को समझ नही आ रहा था । सारे आईएस वहां सिर्फ़ सलामी देने का काम कर रहे थे । या फ़िर बुत की तरह खड़े थे । एक सरपंच आकर धक्का देकर आईएस को कुछ %&#*&*#$#%$ शब्दों का आदान प्रदान करके मुख्यमंत्री जी के गले मिलता है ।
दुःख में आकर सरल ने हिन्दी न्यूज़ चैनल पर लगाया , वहां लालू यादव जी की रेल बजट पेश हो रहा था । इंग्लिश देखकर सरल के सपने हवा हो गए आईएस बनने के । फ़िर दूसरे चैनल पर महारास्त्र को देश से भी बड़ा बताने वाली एक पार्टी के लोगो द्वारा हिन्दी भाषी नेता की pitayee देखी

बस सरल को लगा सब बातें है । पर इतना तय है को सरल कुमार के तीन हज़ार रुपये , बिजली बिल , नौकरी और शादी सब तबाह हो गए.

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

कवि गंग का अद्भुत इश्वर प्रेम - जीवन परिचय

मेरे पूज्य सदगुरु बापूजी ने कवि गंग के जीवन काल में हुए अन्याय के बारे में बताया है। उसी को आधार मानकर मैं यह धार्मिक प्रेमिओं के लिए रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ । किसी भी दोष के लिए कृपया मुझे माफ़ करें ।
कवि गंग के बारे में शायद बस धार्मिक और गूढ़ साहित्य प्रेमी ही जानते हैं । वो तानसेन के समकालीन थे और अकबर के दरबार में कविता आदि गाने का काम करते थे । वो तानसेन से बहुत प्रभावशाली थे परन्तु कुछ कारन थे जिनकी वजह से वो इतिहास से बिल्कुल बेदखल कर दिए गए । उसका सबसे महत्वपूर्ण विषय यह है :-
कवि गंग सिर्फ़ इश्वर निष्ठ कवि थे । भगवान् के अतिरिक्त वो किसी और की प्रशंसा के गीत कभी नही गाते थे । हालांकि सामाजिक मुद्दों पर भी लिखते जैसा मैंने इससे पिछली पोस्ट में उनका एक दोहा लिखकर दर्शाने का प्रयास किया है । पर कभी भी उन्होंने चापलूसी करने जैसी कोई कविता अकबर के लिए नही लिखी । ये वाकई दुर्लभ बात थी क्योंकि उस समय लगभग सभी अपनी आजीविका बढ़ाने के लिए झूठी सच्ची कविताये लिखकर अकबर से इनाम पाते थे। पर कवि गंग ने ऐसा कभी नही किया ।
कवि गंग की एक खास शैली ये थी वो आखिरी पंक्ति में अकबर को संबोधित कर लेते थे । अब एक दिन अकबर ने उन्हें आदेश दिया की कल वो एक कविता बनायें और उसकी आखिरी पंक्ति हो
" सब मिलकर आस करें अकबर की "
मतलब साफ़ था की कवि गंग को अकबर की बड़ाई करनी होगी । अगले दिन कवि गंग ने कविता पढनी शुरू की . उसके अर्थ कुछ ऐसे थे की एक को छोड़कर जो दूसरे को पुकारे उसकी जीभ कट जाए , वो दुश्चरित्र है जो बार बार अपने ईमान बदल लेते है। कवि गंग कहना चाहते थे की वो इश्वर अधीन है , कभी भी अकबर की झूठी चापलूसी नही करेंगे ।
उन्होंने आखिरी पंक्ति शुरू की ,
सारी दुनिया धन को भजे , कवि गंग तो एक गोविन्द भजे
जिसको न भरोसा इश्वर का , वो सब मिलकर आस करे अकबर की ।

बस कहने की जरुरत नही की क्या माहौल बनाया होगा अकबर के चापलूसों ने । फ़िर भी अकबर ने कहा की साफ़ साफ़ कहो । तो कवि गंग ने कहा
एक हाथ घोडा एक हाथ खर ( गधा ) ,
कहना था सा कह दिया करना है सो कर

दुष्ट सत्ता ने आदेश दिया की कवि गंग को हाथी से कुचल दिया जाए । कुचले जाने से पहले महान कवि ने अपनी आखिरी पंक्तियाँ कही
" कभी न रानडे रन चढ़े कभी न बाजी बंध ,
सकल सभा को आशीष है ,विदा होत कवि गंग
कायर कभी रन में नही लड़ते और कभी नही जीतते , भरी सभा को कवि गंग आशीर्वाद देता विदा होता है ।

कृपया कोई भी इसे हिंदू मुस्लिम कोण से न देखे , सिर्फ़ एक राजा और एक प्रतिभाशाली इश्वर प्रेमी कवि के चापलूस न होने को ही इस घटना का आधार माने । मैं भाग्यशाली था जो अपने बापूजी के आश्रम की मासिक पत्रिका " ऋषि प्रसाद " से ये पढ़ पाया ।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

एक बुरो प्रेम को पंथ बुरो.--कवि गंग ( मोरारी बापू के कथा प्रवचन से )

कवि गंग एक अद्भुत कवि थे जो सिर्फ़ धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर ही लिखते थे , वे तानसेन के समकालीन थे । उनका जीवन परिचय किसी और पोस्ट में डालूँगा अभी उनके उस कविता के बारे में चर्चा करते है जो शायद आप सभी ने पूज्य मोरारी बापूजी की कथा में भी सुनी होगी।

एक बुरो प्रेम को पंथ , बुरो जंगल में बासो
बुरो नारी से नेह बुरो , बुरो मुरख में हंसो
बुरो सूम की सेव , बुरो भगिनी घर भाई
बुरी नारी कुलक्ष , सास घर बुरो जमाई
बुरो ठनठन पाल है बुरो सुरन में हंसनों
कवि गंग कहे अकबर सुनो एक सबते बुरो माँगनो
माँगनो एक सबते बुरो
सरलार्थ : प्रेम का मार्ग बहुत बुरा है क्योंकि सच्चे प्रेमी कहीं के नही रहते , जंगल में निवास करना बुरा है क्योंकि वहां कोई सुविधा नही होती , स्त्री से अकारण ज्यादा प्रेम करना भी बुरा है क्योंकि इतिहास में बड़े युद्ध सुंदर स्त्रिओं के कारन ही हुए है ( ये विचार व्यक्तिगत है शास्त्र्गत नही , इसीलिए मेरे अलावा किसी और को इस पंक्ति के लिए दोष न दे ), मूर्खो की सभा में कभी हँसना नही चाहिए क्योंकि उनकी कोई बात आपके योग्य नही होती ।
बुरो सूम के सेव का मतलब है की कंजूस की सेवा में कभी कोई सेवक आनंद नही पाया है , बहन के घर भाई को ज्यादा दिन तक नही रुकना चाहिए क्योंकि इससे मान घट जाता है । ख़राब लक्षणों वाली नारी बुरी होती है क्योंकि उसका डांवाडोल चरित्र आपमें भी दोष पैदा कर सकता है । सास के घर दामाद बहुत दिन रुके तो ये बहुत बुरा है क्योंकि आत्मसमान दांव पर लगा होता है ।
ठनठन पाल अर्थात गरीब होने में भी burayee है क्योंकि आप जीवन का आनंद नही उठा सकते । rajaon ki sabha me भी हँसना सुरक्षित नही है क्योंकि वहां माहौल बहुत संवेदनशील होता है ।
लेकिन इन सबके बाद भी सबसे बुरा है माँगना या याचना करना क्योंकि आपका अस्तित्व उस samay भिखारी के समान होता है

रविवार, 6 दिसंबर 2009

वंशावली भाग पाँच - कुछ अन्य वंश वशिष्ठ ,व्यास शुकदेव

वेदव्यास और वशिष्ठ जी के बीच सबंध

ब्रहमाजी के नौ मानस पुत्रों में से एक है वाशिष्ठ जी इनकी पत्नी का नाम अरुंधती हैइनके शक्ति आदि चार पुत्र हुए शक्ति जी के पुत्र हुए पराशर जी जिनके बाद की पीढियां पाराशर गोत्र से परिभाषित की गई



पराशर जी बहुत ही ऊंचे संत थे उनको एक अद्भुत संयोग का पता था, वो संयोग था कि अगर वो किसी स्त्री से विशेष समय पर विवाह करते हैं तो वो स्त्री इश्वर का जन्म देगी इसीलिए उन्होंने उस पल का इंतज़ार किया और खास समय पर एक अति निर्धन कन्या मत्स्यगंधा ( सत्यवती ) से विवाह के लिए उसके पिता का सामने प्रस्ताव रखा धीवर पिता ने आज्ञा दे दी सत्यवती के गर्भ धारण के बाद मुनि पराशर चले गए

इन्ही सत्यवती ने कालांतर में भगवन वेदव्यास को जन्म दिया
वेद व्यास जी के पुत्र हुए :: प्रसिद्ध भागवत भास्कर श्री शुकदेव मुनि जो दिगम्बरी थे और ख़ुद भी जो पूर्ण ब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार कर गए इन्होने ही परीक्षित को सात दिन के लिए श्रीमद भागवत सुनाई थी .

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

सुध लो मोरी गोपाल मैं खोई गैया तेरी -भजन

प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक श्री जगजीत सिंह की आवाज़ में गाया ये भजन बहुत अच्छा लगता है । हालांकि हमने इस भजन को कई संतो के श्रीमुख से भी सुना है । इश्वर में थोड़ी अच्छी स्थिति के साधकों को तो यह काफी भावुक बना देता है।

इसी भजन की पंक्तियाँ हैं :

सुध लो मेरी गोपाल मैं खोयी गैया तेरी
तुम ढूंढो मुझे गोपाल मैं खोयी गैया तेरी

पांच विकार से हांकी जाए पंच तत्व की ये देहि
बरबस भटकी दूर कहीं अब चैन ना पाऊ अब केहि
ये कैसा मायाजाल मैं उलझी गैया तेरी, सुध लो ....

जमना तट ना नंदन वट ना गोपी ग्वाल कोई दीखे
कुसुम लता ना तेरी छटा ना पांख पखेरू कोई दीखे
अब सांझ भाई घनश्याम मैं व्याकुल गैया तेरी , सुध लो ...

कित पाऊँ तरुवर की छाव जित साजे कृष्ण कन्हैया
मन का ताप शाप भटकन का तुम हो हरि रास रचैया
अब मैं निहारु बाट प्रभुजी मैं गैया तेरी
, सुध लो .........
बंसी के सुर नाद से तेरो मधुर तान से मुझे पुकारो
राधा कृष्ण गोविन्द हरिहर मुरली मनोहर नाम तिहारो
मुझे उबारो हे गोपाल मैं खोई गैया तेरी , सुध लो ..........

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

एक रहस्य -हमेशा इंद्र जी का सिंहासन ही क्यों डोलता है


वैसे तो मज़ाक सा भी है और गंभीर विषय भी कि जब भी कोई छोटा या बड़ा , पुरूष या स्त्री तपस्या करता है तो हमारे हिंदू धर्म की मान्यता है कि इंद्र जी का सिंहासन हिल जाता है। क्या सब देवताओं के अधिपति इंद्र इतने कमजोर है या सबसे पहले उनका नम्बर आता है।

इस का कारन बहुत ही simple है . हमारी सृष्टि में चौदह लोक माने जाते है , और मनुष्य लोक बीच में आता है । जब कोई व्यक्ति तपस्या करता है तो देवता के potential के हिसाब से उसे फल मिलता है ।
पर त्रिदेव सब देवताओं से पृथक है । अगर आपको स्वर्ग तक का सुख चाहिए तो इंद्र जी की पूजा करिए । इंद्र पद या इससे आगे के लोको या फ़िर मुक्ति और भक्ति चाहिए तो इन तीनो देवो के अधीन है ब्रह्मा ,विष्णु महेश ।

अब आपने देखा होगा इंद्र का सिंहासन तभी डोलता है जब कोई व्यक्ति इन तीन में से किसी एक की तपस्या करता है। अब उस व्यक्ति को स्वर्ग तो चाहिए नही । पर पुन्य इतने हो जाते है की कुछ भी इसे मिल सकता है । परन्तु क्योंकि हम सब जीवों में एक परमात्मा है तो वो हमेशा संदेश देता है की कही कुछ घट रहा है जो सात्विक लोग उन्हें आसपास के अच्छे माहौल की ख़बर हो जाती है ।
इंद्र जी सबसे बड़े सात्विक और पुण्यात्मा है , तो उनकी चेतना किसी भी अच्छी चीज़ , या तप से या पुन्य से प्रभावित हुए बिना नही रह सकती क्योंकि तप करने वाला व्यक्ति उनसे भी आगे निकल जाता है।
इसीलिए इंद्र जी का सिंहासन हिल जाता हुआ दिखाई देता है पर ये सांकेतिक होता है ।
ये इतना आम नही है जो टी वी सीरियल में दिखाया जाता है । बहुत दुर्लभ लोग ही इस करते हैं जैसे ध्रुव , माता पार्वती , विश्वामित्र जैसे लोग ।

हमें ये सब बातें थोड़े अभ्यास और धैर्य से समझ में आ जाती हैं

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

श्री हनुमान जी , श्री विभीषण जी और तुलसीदास जी अद्भुत प्रेमाभक्ति और स्वीकारोक्ति

हनुमान जी तो ज्ञानी और प्रेमी भक्तों के शिरोंमणि है। विभीषण जी शरणागत भक्तो के लिए एक पूर्ण आदर्श हैं ।

वैसे तो श्री राम जी से इनकी निकटता ही इनकी महानता को दर्शाता है । लेकिन उनकी निश्छल बातें सहज ही हमें आकर्षित करती हैं और हमारा मन कह उठता है कि हम अपने आपको बहुत धार्मिक समझते हैं पर जो इश्वर को परम प्रिय है वो शिव जी जब ख़ुद हनुमान जी बनकर आते हैं तो कितनी सरल वाणी में इश्वर से बात करते हैं और अपने आप को एकदम तुच्छ मानकर जीवन निर्वाह करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास भी वैसे इसी श्रेणी में आते हैं .रामचरित मानस जैसा अद्वितीय ग्रन्थ रच दिया जिस पर ख़ुद शिव जी हस्ताक्षर कर गए और "सत्यम शिवम् सुन्दरम " लिखकर चले गए ।

तुलसी दास जी का अपने बारे में विचार , जो उनकी सरलता की महिमा बताता है।
"तिन्ह माह रेख प्रथम जग मोरी ,धींग धर्मध्वज धंधक धोरी "
इन पंक्तिओं का अर्थ है कि "धर्म के नाम पर जो अपना स्वार्थ सिद्ध करने हेतु सबसे ऊँचा झंडा उठा कर रखते है उनमे मेरे प्रथम स्थान है। " अब अगर हमने रामचरित मानस बनाया होता तो शायद सात पुश्तों तक royality लेते और अपने आपको इश्वर भी घोषित करने में देर नही लगाते ।

परम पूज्य हनुमान जी कहते हैं भगवान् राम से
"एक मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अज्ञान- पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान् ।"
एक तो मैं वैसे ही मोह के वश हूँ और ऊपर से कठोर ह्रदय और अज्ञानी और इस पर हे नाथ आप प्रभु ने भी मुझे भुला दिया ।
लंका में विभीषण जी को तो हनुमान जी इतना तक कह देते हैं
"कहहु कवन मैं परम कुलीना , कपि चंचल सब ही विधि हीना ,
प्रातः लेही जो नाम हमारा ,ताहि तेहि दिन न मिले अहारा ,"
हे विभीषण जी मैं कौन सा परम कुलीन हूँ । जाती से बन्दर हूँ और वो भी भक्ति के सब साधनों से हीन हूँ , हमारी दशा ही ऐसी है कि जो सुबह हमारा नाम ले तो उस दिन उसको खाना भी न मिले । फ़िर भी इश्वर कृपा से इतना नाम और सामर्थ्य है ।

विभीषण जी कि सरलता तो बिल्कुल ही प्रणाम करने योग्य है ।
वो लंका में हनुमान जी से कहते है ।
"तामस तनु कछु साधन नाही प्रीती न पद सरोज मन माहि "
एक तो मेरा राक्षसी शरीर है ऊपर से श्री राम के चरण कमलो में प्रेम भी नही है ।
फ़िर भगवान् राम से जब भेंट होती है तो राम जी को ही बोलते हैं
"नाथ मैं निशिचर अति अधम सुभाऊ ,शुभ आचरनु कीन्हेउ नही काहू ,
सहज पाप प्रिय तामस देहा ,जथा उलुकेही तम पर नेहा ।"
हे राम मैं अति नीच स्वाभाव का राक्षस हूँ और मैंने कोई शुभ व्यवहार भी नही किया है , मेरी पाप में सहज ही रूचि है वैसे ही जैसे उल्लू कि अंधेरे में होती है । "

अब इतनी सरलता मेरे जैसे स्वघोषित धार्मिक (ढोंगी ) लोगो के लिए पर्याप्त है ।
इसीलिए जय श्री राम ,जय श्री कृष्ण

भगवान् श्री कृष्ण की दिव्य रासलीला

भगवान् श्री कृष्ण सोलह कलाओं से सम्पूर्ण अवतार हैं। वे रस स्वरुप हैं ,आनंदस्वरूप हैं । बचपन से लेकर स्वधाम गमन तक उनकी हर लीला मनोहारी है। उन्ही परम पुरूष के सान्निध्य के लिए गोपिओं को अनेक जन्मो तक साधना करनी पड़ी । प्रसाद स्वरुप इश्वर ने उन्हें शरद पूर्णिमा के दिन सगुण ब्रह्म को असंख्य रूपों में प्रकट किया और प्रेमाभक्ति को सबसे श्रेष्ठ दर्शाया । रामानंद सागर के सीरियल "श्री कृष्ण " में इसका बहुत अच्छा वर्णन दिया है । उसी की ये पंक्तिया हैं ।

पहले आकाश वाणी होती है
आकुल व्याकुल गोपिया ,उनकी दशा विचार रूप अनेकों धर प्रगट हुए प्रेम अवतार
इसके बाद श्री कृष्ण एक से अनेक हो गए , अब इसके बाद राधा जी , गोपिओं और कृष्ण जी का अलोकिक संवाद है जो इस प्रकार है । बीच में आकाशवाणी भी होती है .

कान्हा रे थोड़ा सा प्यार दे चरणों में ,बैठा के तार दे
ओ गोरी घूँघट उभार दे प्रेम की भिक्षा झोरी में दार दे
प्रेम गली में आके गुजरिया भूल गई रे घर की डगरिया ,
जप तन साधन तन मन जीवन सब तुझे अर्पण प्यारे सांवरिया
माया का तुमने रंग ऐसा डाला बंधन में बंध गया बाँधने वाले
कौन रमापति कैसा इश्वर मैं तो हूँ गोकुल का ग्वाला
ग्वाला रे थोड़ा सा प्यार दे ग्वालिन का जीवन संवार दे


आत्मा परमात्मा के मिलन का मधुमास है यही महारास यही महारास है
हो त्रिभुवन का स्वामी भक्तों का दास है , यही महारास महारास है
कृष्ण कमल है राधे सुवास है यही महारास है यही महारास है
हो इसके अवलोकन की युग युग को प्यास हैं यही महारास महारास हैं


तू झूठा वचन तेरे झूठे मुस्का के भोली राधा को लूटे
मैं भी हूँ सच्चा वचन मेरे सच्चे प्रीत मेरी पक्की तुम्हारे मन कच्चे
जैसे तू रखे वैसे रहूंगी दूँगी परीक्षा पीर सहूंगी
स्वर्गों के सुख भी नीके न लागे तू मिल जाए तो मोक्ष नही मांगे
सृष्टि के कण कण में जिसका आभास हैं यही महारास हैं यही महारास हैं
हो तारों में नर्तन फूलों में उल्लास हैं , यही ...
मुरली की प्रतिध्वनि दिशाओं के पास हैं , यही ...
हो अध्यात्मिक चेतना का सबमे विकास हैं , यही महारास हैं यही महारास हैं।
रास लीला प्रेम रस के साधकों के लिए अद्भुत अनुभूति हैं । यह इतनी पवित्र और रसमयी की स्वयं शिव जी गोपी बनकर रासलीला में प्रगट हुए , जिसके स्थान पर वृदावन में भगवन शिव का गोपेश्वर महादेव मन्दिर बना हैं।
!! राम !!
!! हरि ॐ !!
बापूजी का शुभाशीर्वाद आप पर सदा बना रहे ।

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मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

भजन-इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले


अनुराधा पोडवाल के स्वर में ये भजन बहुत ही प्रासंगिक है जो वैष्णव या शैव है और जो अपनी मृत्यु के सिर्फ़ ईश्वर के वातावरण में ही प्राण त्याग करना चाहते है। गीतकार के ये शब्द सहज ही मन को छू जाते है और दीर्घकाल के लिए मन में भक्ति और वैराग्य को बढ़ा देते हैं ।


इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले ,
गोविन्द नाम लेकर फ़िर प्राण तन से निकले ,
श्री गंगा जी का तट हो यमुना का वंशी वट हो ,
मेरा सांवरा निकट हो जब प्राण तन से निकले

श्री वृन्दावन का स्थल हो मेरे मुख में तुलसी दल हो ,
विष्णु चरण का जल हो जब प्राण तन से निकले
जब कंठ प्राण आवे कोई रोग न सतावे ,
यम दर्श न दिखावे जब प्राण तन से निकले

सुधि होवे नही तन ki taiyari हो गमन की ,
लकड़ी हो ब्रज के वन की जब प्राण तन से निकले
ये नेक सी अरज है मानो तो क्या हरज है ,
कुछ आपका फर्ज़ है जब प्राण तन से निकले

इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले ........................



सोमवार, 30 नवंबर 2009

वंशावली -भाग चार ( भगवन कृष्ण और अर्जुन वंश )


वैसे तो भगवान् कृष्ण और अर्जुन चन्द्रवंश में ही आते है परन्तु कालांतर में कृष्ण जी यदुवंश और अर्जुन पुरुवंश या कुरुवंश में माने जाते हैं । परन्तु कौरव और पांडव भरत के वंशज माने जाते हैं ।

ब्रह्मजी के नौ मानस पुत्रो में से एक ऋषि अत्री को हम सब जानते हैं । उनकी पत्नी सती अनसूया को भी सभी धार्मिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति जानते ही हैं । इनमे ब्रह्म जी के अंश से चंद्रमा का जन्म हुआ । देवगुरु ब्रहस्पति की पत्नी तारा और चन्द्रमा से बुध का जन्म हुआ । बुध और इला से पुरुरवा का जन्म हुआ ।
इला एक शापित स्त्री थी । जो वास्तव में एक पुरूष था । वो महाराजा मनु का पुत्र था और उसका नाम था राजा सुद्युम्न । वो राजा एक बार एक वन में शिकार खेलने गया । शिव जी और माता पार्वती उस वन में विहार कर रहे थे । माता पार्वती के संकोच को दूर करने के लिए शिव जी ने कहा कि शिव जी के अलावा कोई भी पुरूष इस वन में प्रवेश करेगा वो स्त्री हो जाएगा ।
तब भगवन शिव के श्राप से राजा सुद्युम्न एक स्त्री हो गए और इनका पड़ा इला । इला और बुध का पुत्र हुआ -पुरुरवा । पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी के विवाह से विजय आदि छः पुत्र हुए

अब यहाँ से यदुवंश और पुरुवंश शुरू होता है
पुरुरवा और उर्वशी के विजय और आयु आदि छः पुत्र हुए ,
आयु के पुत्र हुए नहुष जो एक बार इंद्र भी बन गए थे पर देवी शची और सप्तर्षि के श्राप के कारन पदच्युत हो गए थे । नहुष के बेटे हुए ययाति , ययाति के देवायनी से दो पुत्र हुए यदु और तुर्वशु । ययाति के शर्मिष्ट से पुरु आदि तीन पुत्र हुए । पुरु सबसे छोटे थे । यदुवंश में श्री कृष्ण हुए और पुरुवंश में अर्जुन हुए ।

यदुवंश
यदु से बारहवी पीढ़ी में में विदर्भ हुए । विदर्भ से इक्कीसवीं पीढ़ी में सात्वत्त हुए । सात्वत्त के पुत्र हुए वृशनी और अन्धक । अन्धक पीढ़ी में देवकी जी हुई । वृशनी के पड़ पोते का नाम भी वृशनी ही था । इस पडपोते के दो बेटे हुए । चित्ररथ और श्वाफल्क । श्वाफल्क से तीन पीढ़ी बाद सत्यकी हुए ।
चित्ररथ से आठ पीढ़ी बाद वासुदेव जी हुए और उनके पुत्र हुए
भगवान् श्री कृष्ण
भगवन श्री कृष्ण >प्रद्युम्न >अनिरुद्ध >वज्रनाभ
अब इससे आगे का आप ख़ुद भी ग्रंथों से सन्दर्भ ले सकते हैं । वैसे यदुवंश अभी भी चल रहा है यादवों या अहीरों के नाम से ।

अर्जुन वंश
राजा पुरु से ही शुरू करते हैं । पुरु की उन्नीस वे पीढ़ी में रैभ्य का जन्म हुआ । रैभय से दुष्यंत , और फ़िर दुष्यंत
और शकुन्तला से राजा भरत । भारत ने दत्तक पुत्र भरद्वाज को राजा बनाया जो बहुत विवादस्पद था राज परिवार के लिए , परन्तु भारत ने योग्यता के अनुसार चुनाव किया ।
भरद्वाज के ब्रह्तक्ष्त्र ,उनके हस्ती ( हस्तिनापुर इन्ही के नाम से बना ) हस्ती के अज्मीध फ़िर चार पीढ़ी बाद कुरु
जिनके नाम से आगे वाली सारे पीढ़ी कुरुवंश या कौरव कही जाने लगी । फ़िर कुरु से चौदह पीढ़ी बाद शांतनु और देवापी दोनों भाई हुए । देवापी बड़े थे पर वो तपस्या के लिए चले गए । जब भगवान् कल्कि जन्म लेंगे तब वे फ़िर प्रगट होंगे। शांतनु के बेटे भीष्म पितामह ,चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए ।
विचित्रवीर्य >पांडू >अर्जुन >अभिमन्यु >परीक्षित >जन्मेजय
फ़िर जन्मेजय के बाद छब्बीसवीं पीढ़ी में रजा क्षेमक अन्तिम राजा हुए .

रविवार, 29 नवंबर 2009

वंशावली भाग तीन ( भगवन राम का वंश )



राम जी का वंश या सूर्य वंश भी कह सकते हैं क्योंकि सातवे मनु सूर्य के पुत्र थे।
इनका वंश सतयुग से प्रारम्भ होता है । जो राम के जन्म के बाद महाभारत के युद्ध यानी कलियुग के शुरू तक रहता है । कृपया देखे

महाराजा मनु के पुत्र हुए राजा इक्ष्वाकु । इक्ष्वाकु के एक भाई थे राजा नृग जो अपनी दानशीलता के कारन प्रसिद्ध थे । हालाँकि उन्हें एक बार दान दोष के कारन गिरगिट बनाना पड़ा और फ़िर भगवन कृष्ण ने उनका उद्धार किया।
राजा इक्ष्वाकु की पंद्रहवी पीढ़ी में युवनाश्व हुए । उनके पुत्र मान्धाता हुए, मान्धाता के पुत्र मुचुकंद हुए । ये वोही मुचुकंद है जिनका भगवन कृष्ण ने कालयवन को मारने के लिए प्रयोग किया था ।
मुचुकंद की पांचवी पीढ़ी में प्रसिद्ध सत्यवादी राजा हरीश चन्द्र हुए। उनके बेटे रोहिताश्व हुए ।

फ़िर रोहिताश्व के आठ पीढ़ी बाद राजा सगर हुए जिनके पुत्र असमंजस फ़िर अंशुमन फ़िर दलीप फ़िर भागीरथ क्रमशः चार पिता पुत्र हुए । भागीरथ वही हैं जो गंगा जी को पृथ्वी पर लेकर आए ।


भागीरथ की पाँच पीढ़ी बाद ऋतुपूर्ण हुआ । ये नल का दोस्त था , वही नल जिनके पत्नी दमयंती थी। नल का पोता सौदास हुआ । सौदास की छटी पीढ़ी में राजा खट्वांग हुए जिन्हें घोड़े के रकाब में पैर डालते डालते इस्वर की प्राप्ति हो गई थी । अब पिता पुत्र के क्रम से पढ़िए ....


खट्वांग > दीर्घबाहु >रघु >अज >दशरथ >श्री राम चन्द्र




श्री राम के पुत्र कुश की सोलहवी पीढ़ी में राजा मरू हैं । ये आज भी जीवित हैं। भगवन कल्कि के जन्म के समाये ये प्रकट है । अभी ये कलाप ग्राम में अज्ञात रहकर तपस्या कर रहे हैं । ये भीष्म पितामह के समकालीन हैं तथा भीष्म के चाचा देवापी के साथ रह रहें हैं । राजा मरू के छः पीढ़ी बाद ब्रह्द्व्ल हुए जिसे महाभारत में अभिमन्यु ने मारा था । ब्रह्द्व्ल की 31 वीं पीढ़ी में राजा सुमित्र अन्तिम राजा हुए ।




उम्मीद है मेरा प्रयास आपको सहायक होगा .

वंशावली - भाग दो .. मनु जी के बारे में


इससे पहली पोस्ट में मैं संक्षेप में काल गणना के बारे में बता चुका हूँ ।
अब थोड़ा सा पहले मनु महाराज को भी शामिल करना होगा क्योंकि सृष्टि क्रम उनसे ही बनता है ।
चारों युग मिलकर एक चतुर्युग बनता है । इन एक हज़ार चतुर्युग को मिलाकर एक कल्प बनता है । ये ब्रह्माजी का एक दिन होता है । ब्रह्माजी जी की आयु सौ वर्ष की होती है । उनके एक वर्ष में 365 दिन होते है । कल्प का परिमाण मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ ।
मनुजी का कल ही वास्तव में समय की कुंजी है । एक कल्प में चौदह मनु होंगे । तो अब एक हज़ार चतुर्युग को चौदह हिस्सों में बाँट लीजिये , एक मनु जी का कल होगा। लगभग 71 या 72 चतुर्युग हो सकता है एक मनु का कल। अब तक सात मनु हो चुके हैं । सबसे पहले मनु थे स्वयम्भुव मनु और अब सातवे मनु है वैवस्वत मनु , उनका नाम उनके पिता विवस्वान ( जो इस बार के सूर्य हैं ) के कारन है । वैसे उनका नाम सत्यव्रत मनु है।
इन्ही सातवे मनु के कारन भगवान् ने मत्स्यावतार लिया था जो इनका इस कल्प का पहला पूर्ण अवतार था ।
तो अब जितनी भी वंशावली होंगी मैं उन्हें मनु से जोड़ कर दिखाऊंगा या ब्रह्म जी से जिससे सृष्टि क्रम को आपको सटीक पता चलेगा की हम मनुष्यों और देवताओं के लिए ये दोनों सबसे जरुरी हैं ।

वंशावली ( सृष्टि क्रम )-भाग एक -


!! राम !!
!! हरि ॐ !!
जय श्री गणेश !!!!!!!!!!!!!!!!



सनातन धर्म के अनुसार वंशावली समझने के लिए समय और इससे जुड़े कुछ वंशो के बारे में संक्षेप में पता होना बहुत जरुरी है । जैसे कल्प , अयन ,चन्द्रवंश और सूर्य वंश । इन्ही वंशो में सारे देवी देवताओं , राजे महाराजों का वर्णन आ जाता है । यह पोस्ट कई भागो में होगी क्योंकि इसमे बहुत जटिल सबंध हैं। मैं पूरी कोशिश करूँगा कि सरल तरीके से एक एक वंश का वर्णन करूँ । यह पहला भाग है । पहले समय की गणना को लेते हैं ।

गीता के अनुसार और प्रमाणिक ग्रंथो के अनुसार हमारे चोबीस घंटे या आठ पहर का एक दिन होता है । हमारे छः महीने के समय में देवताओं का एक दिन या एक रात होता है । उत्तरायण और दक्षिणायन को देवताओं का क्रमशः देवताओं का दिन और रात माने जाते हैं । अभी कलयुग चल रहा है इसका काल चार लाख बत्तीस हज़ार साल के बराबर होगा । भगवन कृष्ण के स्वधाम गमन के बाद कलयुग शुरू हुआ है । पहला युग सतयुग होता है जिसका समय दूसरे युग त्रेता युग से दुगना होगा । त्रेता का तीसरे युग द्वापर युग से दुगना और द्वापर युग का चौथे युग कलयुग से दुगना होगा।

अब सृष्टि कालऔर वंश की बात अगली पोस्ट में करुगा ..

रविवार, 22 नवंबर 2009

है वही भाग्यवान जो भगवान् को चाहे-स्वर श्री सुरेशानंदजी




यह भजन मैंने 2002 में सुना था और पहली बार में इतना अच्छा लगा याद कर लिया । आशा है कि सभी गुरु भाईओं को यह पसंद होगा । यह भजन आश्रम के कैसेट "भक्ति अमृत " में है ।



है वही भाग्यवान जो भगवान् को चाहे ,भगवन को चाहे
विद्वान होके नित्य विद्यमान को चाहे विद्यमान को चाहे
हरि हरि हरि हरि

भोगी सदा ही भोग के सामान को चाहे ,
अभिमानी सदा अपने ही सम्मान को चाहे
वह त्यागी तपस्वी भी कीर्ति दान को चाहे ,
वह देव पुजारी भी तो वरदान को चाहे
कोई चाहे पुराण या कुरान को चाहे , हरि हरि ........है वही
कितने ही अपने भले बुरे काम में भूलें,
कुछ नाम में भूलें है कोई नाम में भूलें
कोई हज़ार लाख जोड़ दाम में भूले ,
जो रूप के मोहि है गोरे चाम में भूले ,
भूले नही वो जो दयानिधान को चाहे , हरि हरि .......है वही
रहता है भिखारी सदा धनवान के पीछे ,
मोहि भूला करता है संतान के पीछे
दुर्बल रहा करता है बलवान के पीछे ,
खोता है मुरख सब कुछ अज्ञान के पीछे
पर बुद्धिमान प्रभु के ही विधान को चाहे , हरि हरि .......है वही
जो नित्य विद्यमान है वह दूर नही है ,
वह सर्वमय है साक्षी है और यही है
सब उसी के भीतर है जो कुछ भी कहीं है ,
हम भूले हुए जहाँ भी है वह भी वही है
यह पथिक किसी विधि उन्ही महान को चाहे , हरि हरि .....है वही

भगवान् वही जिससे सब पूरे होते काम ,
भगवान् से प्रकाशित है सारे रूप नाम
भगवान् में ही जीव को मिलता परम विश्राम ,
सबके वही परम आश्रय है सतचित आनंद धाम
जो ज्ञान में है इसी अधिष्ठान को चाहे .
हरि हरि हरि हरि !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

मीरा जी का अविस्मर्णीय एवं प्रेमाभक्ति पूर्ण गीत

जिनको कृष्ण की भक्ति सुहाती है उन्हें मीरा जी की श्रेष्ठता कहने की आवशयकता नही है। दुर्गम परिस्थितिओं के होते हुए भी उन्होंने ईश्वर प्रेम को नही त्यागा और हमारे जैसे सरल साधकों के लिए एक अद्भुत उदहारण बनकर चली गयी । अभी भी वृन्दावन और द्वारिका जैसे कृष्ण लीलास्थालों पर मीरा जी के काल की झलकियाँ मिल ही जाती हैं । उनके भजन इतने प्यारे और सरल है जो सदा प्रासंगिक लगते हैं । उन्ही में से एक भजन है जो काफी अच्छा है ।

जगत के रंग क्या देखू तेरा दीदार काफी है,
चली जाऊ मैं वृन्दावन तेरा दरबार काफी है
करूँ मैं प्यार किस किस से , तेरा एक प्यार काफी है
नही चाहिए ये दुनिया के निराले रंग ढंग मुझको ,
चली जाऊँ मैं वृन्दावन तेरा दरबार काफी है
दुनिया के साजे बाजों से हुए है कान अब बहरे ,
कहा जाके सुनु अनहद तेरी झंकार काफी है ,
चली जाऊँ मैं वृन्दावन तेरा दरबार काफी है
जगत के रिश्तेदारों ने बिछाया जाल माया का ,
बुला लो बैकुंठ में मुझको तेरा परिवार काफी है ,
चली जाऊँ मैं वृन्दावन तेरा दरबार काफी है

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

महाभारत के युद्ध के बाद भीष्म जी का स्वर्गारोहण

हम सबको धन्यवादी होना चाहिए बी आर चोपड़ा जी का और रामानंद सागर जी का जिन्होंने दोबारा से भारतीय संस्कृति के पुरातन काल को बिल्कुल जीवंत कर दिया था । अब जैसे महाभारत के इस आखिरी दृश्य को ही लें।नितीश भारद्वाज बिल्कुल ऐसे लग रहे हैं जैसे वास्तव में कृष्ण ही खड़े हो । भीष्म या मुकेश खन्ना जी इस मौके पर भगवन से विदा मांगते है । नीचे वाला चित्र इसी को चित्रित करता है । सभी शोकाकुल हैं पर अर्जुन तो बिल्कुल ही टूट जाते हैं और फूट फूट कर रोने लगते हैं और हृदय से निकले ये बोल बोलते हैं
" पितामह मैं आपको नही जाने दूँगा "


अब आखिरी चित्र के आने से पहले जो आवाज गूंजती है वो हम कभी नही भूल सकते
"महाभारत सा युद्ध न हो , न हो अन्याय की कोई बात
चलो हम हो ले उसके साथ, करें जो कृष्ण के जैसी बात
कर्म है गीता का उपदेश ,महाभारत है शान्ति संदेश

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...