अभी प्यार की कविताओ की कड़ी में ये आज पंद्रहवी कविता हैं । आशा हैं आपको पसंद आएगी । इसमें थोडा ईश्वर से शिकायत भरी बाते हैं , जो शायद वो सहन कर ले । भाव में तारतम्यता के लिए चौदहवी कविता का लिंक देने की जरुरत नहीं क्योंकि वो exact पहली पोस्ट में हैं ,आप सीधे ब्लॉग से पढ़ ले , भूमिका भी ।
जीव बनकर तेरे हर कहर मैं सहता गया
और कृष्ण तू रस बनकर बस औरो के लिए बहता गया
क्या करू जब एक बुरी लड़की भा जाये
मेरे मिटने का भाव उसके लिए आ जाये
जिंदगी उस कदम पर जाकर बेमानी हो गयी थी
उसकी ख़ुशी के लिए अपनी भक्ति खो गयी थी
चरित्रहीन तुने ही बनाया कृष्ण मुझमे कहाँ ताकत थी
समाज के पुराने रिवाजो की खिलाफ मेरी बगावत थी
मेरा दोष तो बताओ प्रभु जो खुद का सजा दे सकू
डूबी हो मल्लाह से कश्ती तो क्यों ना खुद मैं खे सकू
इसके उसके इलज़ाम कब तक लिए मैं फिरूँ
सांस पूरे हो चुकी जिंदगी में किसलिए प्राण भरूँ
ना हरि ना ब्रह्म ना ग्रंथो का ही सहारा मिला
जाऊ कहाँ भवसागर पार जब ना किनारा मिला
भक्ति हो या प्रेम हो या पर ज्ञान की कोई मांग नहीं
नशा बस एक सच्चे समर्पण का झूठा मेरा स्वांग नहीं
झूठे सारे लोगो को वफ़ा का रास्ता मिला
सच्चो को तो भावो ने दिया जड़ से हिला
कभी तो दो पल हमारे जीवन में सुकून के आ जाते
अच्छे पल ना मिले , बुरे लोगो में हम समा जाते
कभी कभी तो वो धुंधले राज ईश्वर की दया से चमक जाते
दुआ उसकी होती "वीरेन" के चिराग जिसकी झोली में दमक जाते
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बुधवार, 16 जून 2010
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
मेरी चौथी कविता प्यार की
मेरी इस कड़ी में चौथी कविता हैं , मेरी अपनी सच्ची घटना से सबंधित होने कारण इन चारो कविताओ को श्रृंखला बध पढ़े तो इससे मेरे दुःख को आप ज्यादा मनोरंजक पाएंगे । तीसरी कविता का लिंक भी नीचे दे रहा हूँ , ( उस तीसरी पोस्ट में पहले और दुसरे भाग के भी लिंक हैं ) , तीसरे भाग का लिंक
http://saralkumar.blogspot.com/2010/04/blog-post_06.html
अब चौथी कविता ये हैं
वो जताती थी मुझे जैसे वो मेरे लायक नहीं हो
वीरेन मेरी वो प्रेम कथा जिसके तुम नायक नहीं हो
पर मैं बस इतना ही कह सका
क्यों मैंने साधक होने का ढोंग रचाया
क्यों ज्ञानी होने का दम्भ सजाया
वो तो हरि जप से ही मुक्त हो गयी
और मेरी गति पापो से युक्त हो गयी

मेरा प्यार उसके लिए हमेशा सच्चा था
वासना के लिए तो मेरा मन अभी कच्चा था
अगर ये वासना की नदी होती तो बह गयी होती
नहीं तो वो मुझसे क्यों कह गयी होती
तुम्हारा प्यार यु तो बिलकुल सागर जैसा हैं
मिट जाती जहाँ नदिया वो संगम वैसा हैं
बातें हैं दिल में पर बोला ना जाये
आंसू हैं आँखों में पर रोया ना जाए
काश वो मेरी मौत से कुछ पल पहले आ जाये
गोद में सिर हो उसके और सांसे मर जाये
आँखों में देखू उसके आखिरी सपना
ख़त्म हुआ वीरेन सब अब और नहीं जगना
हर रात को अब ना तारे गिनूंगा
जी ही ना पाया तो अब मरूँगा ।
अभी थोड़ी और पंक्तिया हैं पर मूर्त रूप नहीं दिया । इसीलिए अभी तक के लिए इतना ही ।
http://saralkumar.blogspot.com/2010/04/blog-post_06.html
अब चौथी कविता ये हैं
वो जताती थी मुझे जैसे वो मेरे लायक नहीं हो
वीरेन मेरी वो प्रेम कथा जिसके तुम नायक नहीं हो
पर मैं बस इतना ही कह सका
क्यों मैंने साधक होने का ढोंग रचाया
क्यों ज्ञानी होने का दम्भ सजाया
वो तो हरि जप से ही मुक्त हो गयी
और मेरी गति पापो से युक्त हो गयी

मेरा प्यार उसके लिए हमेशा सच्चा था
वासना के लिए तो मेरा मन अभी कच्चा था
अगर ये वासना की नदी होती तो बह गयी होती
नहीं तो वो मुझसे क्यों कह गयी होती
तुम्हारा प्यार यु तो बिलकुल सागर जैसा हैं
मिट जाती जहाँ नदिया वो संगम वैसा हैं
बातें हैं दिल में पर बोला ना जाये
आंसू हैं आँखों में पर रोया ना जाए
काश वो मेरी मौत से कुछ पल पहले आ जाये
गोद में सिर हो उसके और सांसे मर जाये
आँखों में देखू उसके आखिरी सपना
ख़त्म हुआ वीरेन सब अब और नहीं जगना
हर रात को अब ना तारे गिनूंगा
जी ही ना पाया तो अब मरूँगा ।
अभी थोड़ी और पंक्तिया हैं पर मूर्त रूप नहीं दिया । इसीलिए अभी तक के लिए इतना ही ।
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