बुधवार, 31 मार्च 2010

महापंचायतो के खिलाफ न्यायालय का एक ऐतिहासिक फैसला ( क्या हालात सुधरेगे ?"

कृपया पहले अगर आप हरदीप जी कि ये ब्लॉग पोस्ट पढेंगे तो थोडा पूरक सामग्री भी आपको मिलेगी

http://hardeeprana.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html
लेखक की संवेदना गहरी मानवीय संवेदना हैं . हरदीप ने इस पोस्ट में सही विश्लेषण किया जिसमे मुझे कहना पड़ा
" समर्थ को नहीं दोष गोसाई :

हमारे देश के संविधान या कानून में सच में ही अजीब हैं और फिर इसमें फंसते सिर्फ असहाय लोग ही हैं
इसी कड़ी में कहना पड़ेगा की पांच सात मजदूरों को सोयी अवस्था में अपनी B M W कार से कुचलने वाले तो एश में हैं और संसद और देश की आन पर हमले वालो को बचने के लिए मानव अधिकार का पेंच ढूंढ लिया जाता हैं .

ये तो बेचारे गाँव के कुछ लोग जिन्हें हमारे समाज के आधुनिक होने का पता नहीं हैं . इनको क्या पता की हमारे न्यायलय ने तो लड़के से लड़के की शादी तक को मान्यता दे दी हैं . इन पंचायत के लोगो को बस कहा जा सकता हैं किसी झूठी तथाकथित खानदानी इज्ज़त के लिए मजबूर हुए होंगे . उनका अपराध तो बिलकुल अक्षम्य हैं फिर दुःख ये हैं की गाँव के लोगो से नेताओ को सिर्फ वोट चाहिए और खुद नेता चाहते हैं कि लोग पिछड़े ही रहे . जब सो डेढ़ सो पुलिस वाले गुडगाँव में मुख्यमंत्री के कहने पर हज़ारो होंडा कर्मचारियो को कुत्तो कि तरह पीट सकते हैं तो क्या पांच लोगो से एक पति पत्नी को नहीं बचा सकते थे . खबर हमने सुनी थी कि जब इनको बचने के लिए उच्च न्यायलय से आदेश थे फिर किसकी इतनी हिम्मत हुई कि सबके सामने दो लोगो को मार दिया गया


जब संविधान में लिखा हैं कि बालिग लड़का लड़की शादी कर सकते हैं फिर भी पुलिस वालो के सामने कैसे उन्हें मार दिया गया . क्या गृह मंत्रालय कि कोई जिम्मेदारी नहीं बनती , आठ हज़ार कि तन्खवाह वाला सिपाही बेचारा कैसे पंचायतो कि भीड़ से निपट सकता हैं . एक भी छोटे से छोटे से नेता ने उस समय इसकी बुराई नहीं कि क्योंकि चुनाव का डर था . और गैरत ऐसी कि अब भी न्यायलय के इस निर्णय का समर्थन भी नहीं .

गोत्र और अंतरजातीय विवाद में हमारे हरियाणा में इतने इतने काण्ड हुए हैं कि मन तौबा कर जाये पर दिक्कत ये हैं कि इन्ही महापंचायतो के मतदान निर्णय से नेता जीतते और हारते हैं . इसीलिए मुख्यमंत्री तो क्या प्रधानमंत्री जिन्हें ऑस्ट्रेलिया में हुए एक मुसलमान पर हमले से रात को नींद नहीं आई अपने ही दिल्ली से तीन तरफ से सटे हरयाणा में हो रहे नरसंहारो पर कुम्भकरण बन जाते हैंजिस परिवार के लोग मरते हैं वो जानते हैं कि जिंदगी क्या होती हैंहर चीज़ में कायरो कि तरह बस न्यायलय को बलि का बकरा बनाया जाता हैंअरे क्या अपने सामने मरती जिंदगी में हर बार सुप्रीम कोर्ट मदद करेगा .

हमारे देश में तीन चार विचारधाराओं के लोग एक साथ जी रहे हैं । एक तो हमारे जैसे पिछड़े हैं जहाँ गोत्र तक का ध्यान एक सामान्य शादी में रखा जाता हैं , बिलकुल सच कहूँगा स्वयं मुझे अपने रिश्ते के लिए गोत्र विवाद के चलते योग्य लड़की नहीं मिल पा रही हैं . कही मम्मी का गोत्र मिलता हैं कही दादी काअपना खुद को तो खैर कभी हो ही नहीं सकता हैं

एक दूसरा समाज हैं जो हाई फाई लोग जो लिव इन और गे marriage करके भी आराम से रहते हैं । यहाँ कोई पंचायत नहीं हैं क्योंकि इनके पास पैसा पॉवर मीडिया और विदेशी लिंक हैंशायद इसीलिए मेरे मुह से निकला समर्थ को नहीं दोष गोसाईएक छोटा सा सा सच्चा उदहारणएक हमारे युवा भारतीय नेता हैं श्री सचिन पायलट वो तो बिलकुल परिपक्व हैं और उनके अपने प्रोफाइल में पूरी अच्छी छवि भी दिखती हैं ।, हर कोण से वो एक आधुनिक चेहरा हैंइतने उदार कि इन्होने हर पिछड़ी सोच को दरकिनार करते हुए एक मुस्लिम लड़की (जो कि फारूख अब्दुल्ला कि बेटी हैं) से शादी कर लीअब देखिये ये गुर्जर नेता हैं और मैं भी गुर्जर समाज से सबंधित रखता हूँहमारे बड़े बूढ़े इन्हें बेमतलब इन्हें गुर्जर नेता बेमतलब इन्हें गुर्जर कि शान आदि आदि नमो से नवाज देते हैंपर अगर हम इनकी तरह अंतर धर्म तो क्या अगर अंतरजातीय विवाह तो क्या गोत्र का ध्यान रखे बिना अगर हम शादी कर लेते हैं तो हमारा सामाजिक बहिष्कार तय हैं पर सचिन जी कभी नहीं कहते कि वो गुर्जर नेता हैंइतना द्विअर्थी मापदंड हैं कि बस निराशा ही हाथ लगती हैं .

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

दैनिक कडिया भाग पांच ( गुडगाँव विशेष )

गुडगाँव वैसे तो कहने को साइबर सिटी हैंपर कई जगहों पर इतनी समस्या हैं कि आप का मन बस बिलकुल तौबा कर लेजमीनों के रेट इतने महंगे हैं की बिना कर्जा लिए एक आम मध्यम वर्गीय मकान नहीं खरीद सकतायह सारा काम कभी कभी लगता हैं की भ्रष्टाचारो की वैतरणी में गोता लगी रही सरकारों के कारन लगता हैंसरकारों ने पैसे के लालच में हर जगह बस फ्लैट बनाने वाले कम्पनियों को जमीन उपलब्ध करवाई हैं . इसमें सबसे दुखद ये हैं की ये जमीन कृषि योग्य थी .

विदेशो की तर्ज़ पर S E Z बनाने वाले भूल गए की चीन में दस S E Z हैं और सारे समुद्र के पास और बंजर और बेकार भूमि परमतलब उन्होंने हमारी तरह कृषि योग्य भूमि को प्रयोग में नहीं लायागुडगाँव के सारे मूल निवासी जिनके पास बेचने के लिए जमीन नहीं हैं उनका दिल शहरी चकाचौंध को देखकर टूट जाता हैं . अंदर गुडगाँव में जो पुराने निवासी और आस पास के गाँव में जो लोग रहते हैं

जिनके पास जमीन हैं उनका तो लगभग उद्धार जमीन बेचने से हो गया हैंया फिर कई तो बस सिर्फ किराये के मकान की आमदनी ( जो बीस पच्चीस हज़ार आराम से हो जाती हैं ) से ही एश कर रहे हैं । उन बन्दों को कोई काम नहीं होता । सुबह जब हम कम्पनी के लिए निकलते हुए इन्हें देखते हैं तो दुःख होता हैं की देखो कुछ करने की जरुरत नहीं । ये लोग सुबह राजनीति पर चर्चा कर रहे होते हैं और शाम को भी बिलकुल उसी पोज़ में बैठे मिलेंगे । पूरे दिन की कोई आऊट पुट नहीं । पर फिर भी हमारे जितनी ही इनकी आमदनी और खर्चे होते हैं , शायद कइयो कि तो हमसे कई गुना ज्यादा आमदनी हैं ।

पर फिर भी यहाँ फ्लैट के रेट भी बहुत ज्यादा हैंसबसे ज्यादा हंसी तो विज्ञापनों में लगे रेट को देखकर आती हैंपैंतीस लाख रुपये में तो तीन बी एच के मिलता हैंइसे भी मेरे कई अमीर मित्र reasonable कहकर बस मेरा मन दुखी करते हैंतीस चालीस हज़ार की सेलरी वाला भी कितनी कोशिश कर ले बिना लोन लिया बेचारा यहाँ घर नहीं बना सकता

और साफ़ सफाई के हिसाब से कई जगह तो बस दुर्दशा ही हैं . डी एल एफ ही हैं जिसके सहारे पूरे गुडगाँव को जाना जा रहा हैं जैसे ही आप इसे छोड़ देंगे आपको रियल भारत दिखेगा जैसे पूरे वातावरण में हमेशा धूल रहेगीजैसे मरुस्थल में रहती होहमारे कई दुसरे राज्यों के दोस्त कभी समझ ही नहीं पाते कि गुडगाँव में इतनी धूल आती कहाँ से हैं

और एक वास्तविक समस्या गुडगाँव से मानेसर ( जयपुर हाइवे ) पर आपको आपको कोई दस किलोमीटर का यु टर्न हैंयह भी अब दो घंटे मुख्यमंत्री के आदेश पर खोला जाता हैं हीरो होंडा चौक परअब हीरो होंडा चौक को ही ले , जो लोग रोज़ मानेसर जाते हैं उन्हें पता होगायहाँ पता नहीं क्यों लगभग हर रोज़ सीवेरेज़ का पानी इतना हो जाता हैं की हाइवे की सारी गाड़िया दो फुट पानी में खड़ी हो जाती हैंऔर गलती से जल्दी के चक्कर में सर्विस लेन में चले गए तो बस भगवान् ही मालिक हैं आपकाइस समस्या की तरफ पता नहीं प्रशासन का ध्यान क्यों नहीं जातावहां से गुजरते हुए जाम लगता हैं और आप बिलकुल बदबू से बेहाल हो जाते हैंसबसे बुरा हाल उन कम्पनी कर्मचारियो का होता हैं जो बेचारे अपनी कम्पनी की बस का यहाँ इंतज़ार करते हैं

रविवार, 28 मार्च 2010

एक कविता प्यार को समर्पित ( एक अपने अनुभव पर आधारित कविता )

यह कविता एक सच्चे अनुभव पर आधारित हैं
ये एक बहुत ही गहरे अनुभव के बाद लिखी हैं। असल में मैं इस दर्द को सहन नहीं कर पाया और टूटकर ये कविता लिख पाया . बस शुरुवात कि दो पंक्तिया मैंने एक ब्लोगेर अम्बरीश जी से ली हैं । आगे की सारी पंक्तिया ( नीले रंग में ) मेरी खुद की हैं
आज मेरे सामने खुशिया कम ज्यादा गम हैं
फिर भी लगता हैं मेरी आँखों में आंसू कम हैं


मेरी छोटी सी गलती कि इतनी बड़ी सजा मिली
उसे प्यार करने पर वो मुझसे खफा मिली
जिंदगी में मुझे उससे कुछ भी तो प्यारा नहीं
पर मेरा सच्चा प्यार उसने स्वीकारा नहीं

मेरे इस एकतरफा प्यार पर मैं टूट गया हूँ
ईश्वर भी कहता हैं "वीरेन मैं तुझसे रूठ गया हूँ "
मेरी जिंदगी का वो सबसे बड़ा सपना हैं
चाहतो में उसकी अब मुझे मर मिटना हैं

मुझे क्या जरुरत थी अपने को यूँ फंसाने की
उसकी ख़ुशी के लिए अपने गम दबाने की
उसकी आत्मा से उठी एक सच्ची दुआ थी
मेरे मन को खींच लेने वाली वो एक हवा थी

मेरी सारी भावनाओ को छीन कर ले गयी
सारे दर्द और और आहे वो मुझे दे गयी
दर्द के इस मरुस्थल में जैसे तैसे आगे सरकता हूँ
अब मौत मुझे आती नहीं और मैं तड़पता हूँ

मैं सिर्फ इतनी पंक्तियाँ ही उसको समर्पित कर सकता हूँ ।
अभी तुमको मेरी जरुरत नहीं हैं बहुत चाहने वाले मिल जायेगे
अभी रूप का एक सागर हो तुम कमल जितने चाहोगी खिल जायेंगे
दर्पण तुम्हे जब डराने लगी जवानी भी दमन छुड़ाने लगे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये

हृदय से निकली मेरी काल्पनिक जीवनी ( हास्य व्यंग्य )

हे इश्वर !
आप तो दुनिया बनाकर भाग गए । अकेला मरने के लिए मुझे छोड़ दिया । बचपन में स्कूल में पिटाई खाने का डर सताता रहता था पर आप कोई ज्यादा मददगार ना हुए । उस साइंस के पीरियड में डिजिटल घडी की एक एक मिनट को गिनता मैं आखिरी क्षण में घंटी सुनने के लिए तरस जाता पर कमीना अमित फिर चुगली कर देता
" सर , इसने केमिस्ट्री कि कॉपी ही नहीं बनायीं " और दो तीन घूंसे प्राथमिक उपचार के तौर पर नसीब में आ ही जाते थे । बचपन में ही सत्संग में सुने संतोष के वचनों से इतना तो बल मिला कि चलो कॉपी तो बायोलोजी और फिजिक्स कि भी नहीं बनायीं , बस एक ही सब्जेक्ट पर धुनाई हुई ।


थ्री इडियट कि तर्ज़ पर इंजीनियरिंग जैसे पिटे पिटाए कोर्स में दाखिला ले लिया । सोचा था बड़े ही बुद्धिमान शिक्षक और छात्र मिलेंगे । सपने जब टूटे जब बस वहां इडियट ही इडियट दिखे । एक से एक बुद्धू शिक्षक मार्गदर्शक बने और आवारो , लफंगो कि एक बड़ी भीड़ जो बस " सीनियर " होने के कारण हमें " फ्रेंक " बनाने कि आड़ लेकर हमारा " सामूहिक $#%$#%$#%#^ " करती थी । किसी तरह जुगाड़ लगाकर चार साल पूरे करने के बाद पता चला कि बस
" नौकरी नहीं हैं "


सारे देवी देवताओं , नेताओं भाई भतीजों और जुगाडू लोगों के सामने दंडवत होकर एक " टुच्ची " किस्म की ट्रेनिंग कम जॉब हथिया ही ली । छः हज़ार का आश्वासन पाकर भी सेलरी कभी पचपन सौ को पता नहीं क्यों छू नहीं पाई । खैर पंद्रह बीस साल पड़े रहे उसी फटीचर कम्पनी में ।
शादी के लिए जब रंगमंच जम रहा था तो सोचा एक आध इंटर कास्ट सीन का विकल्प देखा जाए पर इस विकल्प पर परिवार से मिली आंतंकवादी टाइप की धमकियों ने शोले ठन्डे कर दिए । अब हम " वीरू " तो थे नहीं ।


खैर , अब जब कुछ विकल्प ही नहीं रहा तो घर वालों ने एक खानदानी , सुशील लड़की से शादी करवा दी । वैसे वो लड़की खानदानी , सुशील के साथ थोड़ी .........................मतलब थोड़ी ज्यादा काली और मोटी मुटल्ली किस्म कि थी । पर अब सरल उसे प्यार से प्रिया कहकर तसल्ली पा लेता हैं ।
जिंदगी में लगी वाट में चुन्नू और मुन्नू ने लगी वाट में जन्म लेकर दो होने के बावजूद भी चार चाँद लगा दिए । नर्सरी के टाइम बेटों कि फीस ने कन्यादान और दहेज़ की याद दिला दी ।

फिर तनख्वाह में बढ़ोतरी के लिए भगवान् से मन हटाकर बॉस के ऑफिस में जाने से पहले बड़ी लम्बी प्लानिंग करते कि अगर वो कमीना ये कहेगा तो मैं ये कह दूंगा , उसने ऐसे टांग अडाई तो मैं वैसे पलटी मरूँगा , ऐसे वैसे सब सोच लिया । अंदर घुसा तो सर बेचारे बहुत बिजी थे। भाई कंप्यूटर पर इतने गेम हैं कि आप किसी को बीच में तंग करेंगे तो अन प्रोफैशनल कहे जा सकते हैं । पर सर फिर भी ताश का गेम छोड़कर मेरी बात सुनने लगे । हर शब्द के साथ उनके चेहरे पर लाल रंगत आ रही थी और आँखे बड़ी हो रही थी । खैर उस दिन मुझे पहली बार पता चला कि विचारो का आदान प्रदान किसे कहते हैं , अर्थात मैं उस दिन अपने विचार लेकर बॉस के ऑफिस में गया था और उनके विचारों से सहमत हो आ गया था। और ऐसा कई सालों चलता रहा। कई बार दुर्घटनाये घटी जिन्हें इश्वर कि मर्जी रुपी ढाल कहकर अपने पापो को मैं बचाता रहा ।

स्कूल कोलेज और पड़ोसियों से बच्चो की शिकायतों ने किशोरवस्था की याद दिला दी, आखिर बच्चे किसके थे , बिलकुल बाप पर गए थे बल्कि और एडवांस वर्जन थे। पचास कि उम्र में हम अस्पतालों और अदालतों के परमानेंट तीर्थयात्री हो चुके थे । दोनों बेटे आवारा और लफंगे बनकर कहीं इंटर कास्ट जोड़ा बनाकर रह रहें हैं । फिर सेवा निवृति के महान दिन पर पूरे स्टाफ की ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी की जो गलती तीस साल पहले इस गैर प्रतिभावान व्यक्ति को लेकर की थी आज उसके सुधारने का समय आ गया था ।

फिर दस पन्द्रह साल घर के पास में पार्कों में आवारा कुत्तों और सूअरों के साथ मोर्निंग वाक् करते बिताये । वैसे वो वाक् कम थी टाक ज्यादा थी , जिसमे कश्मीर से कन्याकुमारी के नेताओं को निपटाना , अमरीका रूस पाकिस्तान की विदेश नीति को बदलने की बात कहने , सचिन के संन्यास पर दुविधा जताना और एक बड़े युद्ध की सम्भावना से दुनिया के खत्म होने जैसी दुर्घटना पर चर्चा करना ।


आखिरी समय में " प्रिया " किसी कथा सत्संग में गयी हुई थी कि परलोक कि टीम आ गयी और बोली

" TIME OUT DEAR "
और बस मेरी आखिरी पोस्ट खत्म । पर दिक्कत थी कि अब मेरी बहस मजबूत करने के लिए मेरा वकील साथ नहीं था , कहना ना होगा कि बचपन में स्कूल में शुरू हुई धुनाई परलोक में बदस्तूर जारी रही ।

शनिवार, 27 मार्च 2010

सरल कि सामाजिक प्रतिष्ठा दांव पर हैं ( हास्य व्यंग्य )

सारा दिन हर चीज़ में जिस ढोंग के साथ जिंदगी बितायी जाती हैंसरल जी उसे प्रोफेशनल सोच समझते हैं
इनकम नहीं हैं पर टैक्स काटा जा रहा हैंकर्मचारियो में इज्ज़त बचाने के लिहाज़ से कस्टमर केयर लम्बे लम्बे फोन करता हैं कि ये 80 C में कोई नया झोल आया हो तो बतायेइन्वेस्ट कुछ करना नहीं , पैसा नहीं हैं तो निवेश क्या ख़ाक होगापच्चीस तारिख के बाद सौ सौ रुपये के U A ( उधार अलाउंस ) की EMI पर खर्चा चलने की कहानी सरल के लिए बिलकुल आम हैं

कहने भर को क्रेडिट कार्ड हैं पर सारे समाज में उसे कोई क्रेडिट नहीं मिला हैंरिक्शा में बैठना अपने आप में उसके लिए स्टेटस सिम्बल से कम तो नहीं हैं क्योंकि रिक्शा वाला सरल से भी महंगा फोन रखता हैंऊपर से रिक्शा वाला भी उत्साह ख़तम करने में एक पल नहीं लगाता . " बाबूजी हम तो शौकिया रिक्शा चलाते हैं " सरल सोचता अगर यही काम मेरी मजबूरी बन जाए तो कम्पनी वाली नौकरी से ज्यादा कमाई हो

सरल
के सारे बड़े बड़े नोट राशन की दूकान वाला पूरी जांच पड़ताल के बाद ग्रहण करता हैंसरल झेंप जाता हैं कि कहीं अखबार में खबर में ना जाये कि सत्रह सौ रुपये के नकली नोटों के साथ रंगे हाथ एक एजेंट गिरफ्तारमम्मी पापा का खूब नाम रोशन होने के सदमे में सरल नोटों कि परीक्षा तो पास कर लेता हैंनहीं तो एक बार तो इतनी आत्म ग्लानी हुई कि क्या सारे नकली नोटों को भारत में फ़ैलाने कि फ्रान्चैज़ी कही मेरे नाम तो नहीं हो जाएगी और मेरा नाम कोई सरल कुमार से "सरल खान " रखकर क्रेडिट ले जाएगा

अभी सत्तासी रुपिए बचे हैं सोचा सरल ने कि सब्जी खरीद ली जायेतीन चार आलू , दो टमाटर , एक गोभी , एक पेठा दुकानदार तौल देता हैंऔर हाथ में बिना पोलिथीन के थमाता हैंसरल झगडा करता हैं कि भैया पोलिथीन तो दे दोवो सब्जी वाला कुछ " ग्लोबल वार्मिंग " जैसा अग्रेज़ी का भारी भरकम शब्द बाण मरकर सरल को बेहोश कर देता हैंबेचारे सरल को समझ नहीं आया कि अपने चार चार इंच कि हथेलियो पर वो अठारह चीज़ें कैसे रखेपडोसी सोचेंगे कि भीख मांगकर लाया हैंफिर भी सरल बहस करता हैंसब्जी वाला थोड़ी रणनीति से काम लेता हैंएक कैप्री में घूम रही लड़की को बुलाता हैं कि बेटा इनको बतानालड़की अपने कुरकुरे के पैकेट को ख़त्म करके और उसकी पोलिथीन को फेंक कर अपनी पतली सी आवाज़ में कहती हैं " he ! u dont know about the whole stuff of hollywood movie day after tomorrow . " सरल को अंग्रेजी तो खैर कहाँ समझ आनी थीकुछ थोडा समझदार होने कि एक्टिंग करते हुए बोला " o yes , yes " और पेंटो कि जेब में आलू भरकर चल पड़ा

नमी
दोनों जगह थी आँखों में आंसू और जेबों में फूटे टमाटर कीगरीब होना शायद आज सबसे बड़ा अभिश्राप हैं

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...