टिशू पेपर -एकहम देसी लोगो के साथ यही दिक्कत होती हैं की हमें चीज़े देर से समझ में आती हैं । मेरी जीवन में भी ऐसा सा ही हुआ था दो बार . 1994 में स्कूल के फंक्शन में जब सारा काम निबट गया था तो हम यूँ ही आवारो कुत्तो की तरह "चेकिंग" पर निकले थे . इस टिशु पेपर को जब हाथ में लिया तो समझ तो गए थे की ये खाने की चीज़ नहीं हैं . पर जब चार पांच पेपर हाथ में लेकर लगा की शायद ये टैंट वालो की तरफ से रंगीन कागज हैं जो सजावट के लिए अभी टांगे जायेंगे . फिर जब चार पांच टिशु मेरी गलती की वजह से थोड़े क्षतिग्रस्त हो गए तो मैं वहा से भाग लिया की कही जरुरी चीज़ हो और मैं इसे बर्बाद कर रहा हूँ । असल में उस समय टीचरों का तांडव जोरो पर होता था । असल में मीडिया इतना जागरूक था नहीं जो एक आठवी क्लास के बच्चे को पिटाई से बचा सके ।
टिशु पेपर - दो
और दूसरा इसके दो तीन साल बाद हुआ , मुझे तो पता था पर एक अति परिचित ने मुझसे कहा की एक पता नहीं क्या चीज़ थी जिसे बस " शहर " के पढ़े लिखे लोग बस चाट कर बिना खाए कूड़ेदान में डाल रहे थे ।
कम्पार्टमेंट
एक और ऐसा ही हैं पर उसका टिशु पेपर से लिंक नहीं हैं . रोहतक के हमारे जानकार की कभी बचपन में किसी क्लास में compartment आई थी . सबको समझ में आया पर उसके दादा जी को नहीं . आप सोचिये उन्होंने क्या कहा होगा - उनके डायलोग :-
" बेटा इब आ गई तो कोई बात नहीं , ल्या बैठक में बैठा ले " ( कोई बात नहीं बेटा बैठक में बिठा ले , जैसे कोई गर्ल फ्रेंड हो )
सच में लगता सब मनोरंजक हैं पर हमारे देसी लोगो के जीवन की तो सच्चाई हैं ।
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
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