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शनिवार, 8 जनवरी 2011

एकतरफा प्यार को समर्पित एक कविता

जब आपको कई बार लगे कि कही मेरा प्यार एक तरफ़ा तो नहीं और क्यों सारी जिंदगी भर का दुःख मोल ले लिए और एक पल कि ख़ुशी नहीं . हालाँकि हैं तो क्रिएटिव एंगल से लिखी हुई नहीं तो फ्रस्ट्रेशन बहुत रुला देती हैं । वे भाव बहुत पुराने हैं तो कुछ असंगत से भी लग सकते हैंपर कुल मिलाकर एक एक तरफ़ा प्यार का थीम मैंने इसमें डाला हैं अपनी कल्पना के आधार पर


हे प्रभु ! मुझसे ना अब तेरा दर्द सहा जाता हैं

स्त्रिओ के झूठे भावो में एक मर्द कराहता हैं

सिर्फ और सिर्फ ईश्वर तेरे संयोगो कि बात मानी थी
पुनर्जन्म पिता का उसे लेकर आया जो अनजानी थी
मन कहता था कि उसके शरीर में बसी आत्मा दीवानी थी
हार कर उसे अपना भी लिया पर उसकी अपनी कहानी थी

उसे चीज़े अपने ढंग से चाही थी
मेरी बातो को आदर देने कि जिसमे मनाही थी
इसीलिए मुझे बातो का ढंग बदलना पड़ा
बेशर्मो से भी बुरे कर्मो में मन रगड़ना पड़ा

ना कर सका कोई फरियाद क्योंकि एक साधक का वादा था
आत्महत्या की नौबत पर उफ़ तक करना उसको लगता ज्यादा था
मेरा अपना ना परिवार ना कोई प्राणों से प्यारा था
मैने सबको खोया पर उसे मनाना ख़ानदान सारा था

मुट्ठी भर मेरी जरूरते पर उसे कभी समझ नहीं आई थी
उससे जब कुछ माँगा उसने परिवार की दिक्कते गिनाई थी
होना भी चाहिए था क्योंकि मेरे प्यार से उसे क्या लेना था
सबसे बुरा होकर भी पता नहीं गारंटी का कौन सा सबूत देना था

हमेशा सोचता रहता था की कुछ चमत्कार होकर रहेगा
उसकी तरफ से कभी तो समर्पण का एक झरना बहेगा
पर सिर्फ मेरे लिए ही उससे सच ना बोला जा रहा था
कमजोर हो चुके बंधन से दामन ना खोला जा रहा था

वो ऐसी ही स्पष्ट जरूरतों वाली लड़की हुआ करती थी
हमेशा अपनी परेशानी ही उसको दिल से छुआ करती थी
मेरी तरफ उसे लगता था की चीज़े बहुत आसान हैं
घडी घडी उसके साथ को तरसता क्या "वीरेन" भगवान हैं

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

परमेश्वर को पति रूप में पाने की इच्छा को व्यक्त करती एक कविता

यह कविता मेरी एक मित्र ने भेजी हैं जिन्हें परम तत्व का साक्षात्कार हो चुका हैं , उनका अभिप्राय अपने निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान को सगुण रूप में वरण करने के लिए काफी मार्मिक बन पड़ा हैं । आपको पसंद ना भी आये तो मेरे आनंद में कोई कमी होने वाली नहीं हैं । कविता समझ में आ जाये तो ढीठ बन जाये और मुझे कुछ ना बताये । बस पढ़े और सोचे , कि इश्वर से प्यार करने का क्या क्या भाव हो सकता हैं ,। पहले कविता में वो मेरी खिंचाई करती हैं फिर इश्वर की , तो आपके श्री चरणों में समर्पित :-

कविता लिखना छोडो भाई
पहले करवाओ मेरी विदाई
क्या कोई राजकुमार राजा होने को तरस गया है?
और एक राजा सच्चे वैराग से बरस गया है?
रिमझिम सा उठता एक संकल्प मुझे खींचता है
दुनिया का असली राजा अपना हक छीनता है
मुझे क्या पड़ी किसी छलिये से दिल लगाने की
नाम तो बताया नहीं क्या उम्मीद हो घर बसने की
मैं क्यूँ जाऊं किसी गुरुद्वार
मेरा तो हक है पति का प्यार
कितनी ही बार अलग नाम से मिलता है
उसी नाम को स्वीकारूं तो फिर जलता है
असली पहचान पूछूं तो शक्की समझता है
उसे नहीं पहचान पाई, बस ये ही रटता है
असली कहानी तो खुद उसे ही पता नहीं
ऐसे ही बदनाम कर रहा है, मैं तो उस से खफा नहीं
बहुवचन क्यूँ लगाऊं वो तो एक ही एक है
प्रकृति है रंग बिरंगी, उसी के रूप अनेक हैं
स्त्री तो सिर्फ प्रकृति का रूप है ये सबको ज्ञात है
पुरुषों की जात दो ही हैं ये मुझे विश्वास है
मैंने तो कबका उन्हें चुन लिया था
कितने फेरे लिए उधेड़े अनेक का रूप क्यूँ धर लिया था
अपनी इज्जत करवाने के लिए क्या शब्द ही काफी नहीं
खुद को बहुवचन बना लेना क्या ये शिवजी की जाति नहीं
फिर भी मुझे उनकी जाति समझनी जरूरी है
क्यूंकि मैं तो एक ही हूँ, न बँट सकना मेरी मजबूरी है
ऐसा नहीं कि किसी के भी भाव मुझे द्वैत का एहसास करवाएं
सिर्फ वो ही अलग प्राणी हैं, विश्वास हो तो प्राणपति हो जाएँ
किसी किसी से न प्रार्थना करुँगी
वीरेन चाहे तो बात करवाए, वर्ना बात ही न करुँगी
हरि ॐ

शनिवार, 3 जुलाई 2010

आज एक ब्लॉग पर एक साधक बहन को इश्वर कि बड़ाई करते सुना जो मेरे जैसे ईर्ष्यालु से सहन नहीं हुआ । अपनी इसी टिपण्णी को कविता का रूप दे दिया । कविता छोटी हैं अब क्या करू ईश्वर से थोडा डर भी तो लगता हैं कि कही ज्यादा खुंदक ना जाये और मेरी वाट ना लगा दे ( भाई मैं भी थोडा प्रोफेशनल हूँ )
प्रिय साधक बहन ,

कहाँ प्रभु प्यारे हैं
चढ़ते सूरज सदा ही तारे हैं
गिरतो को कहा अपनाया हैं
राधा जी तक को ठुकराया हैं

वृन्दावन में उसने "monoply" चला रखी हैं
धर्म कि कई दूकान सजा रखी हैं
भेष बदल बदल कर पैसे मांगता हैं
पूजा की थाली सिर्फ अपनों में बांटता हैं

भाव का भूखा तो हैं पर दाम बहुत ऊंचा हैं
कभी जब मदद मांगी तो उसने बस नोचा हैं

क्यों तुम उसकी इतनी बड़ाई करती हो
क्यों खुश रखने को चापलूस बनती हो
अख्रिरी दम पर ही असली रूप दिखेगा
बस क्या कहू बहन तुमसे ना निभेगा

फिर भी उस कमीने को पाने का प्रण लेता हूँ
तुम्हे अगर बुरा लगा हो तो यु टर्न लेता हूँ


--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

सोमवार, 28 जून 2010

एक दोस्त कि भेजी हुई प्यार पर सच्ची कविता ( प्यार भाग सत्रह )

यह कविता मेरी एक दोस्त ने ईश्वर प्रेरित विधान से संग होकर कुछ अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए भेजी हैं ।
वास्तव में ये उसके सच्चे प्यार को ढूँढने कि कवायद हैं । आप में से जो कोई भी इसे पढ़े और वास्तविक अर्थो की तह तक जाकर समाधान दे सके या उस व्यक्ति तक पहुँचाने में मदद करे सके जिसके लिए ये लिखी गयी हैं तो आपका बड़ा आभार होगा । मुझे इ मेल से सूचित कर दे मैं आगे फोरवर्ड कर दूंगा । कविता धर्मो के सार रूप में अपने soul mate के लिए लिखी गयी हैं । आपका बहुत आभार होगा अगर आप इसमें सहाय होते हैं ।

इसके बाद के शब्द उस दोस्त के हैं जो उसने अपने प्रेमी को ढूँढने के लिए लिखे हैं :-

माफ़ी के काबिल तो नहीं हूँ, फिर भी संभाल लो
मैं नहीं संभाल पायी उसका न मुझे कोई भाव दो
भाव की ही मूरत हूँ अवसाद से उबार लो

इस इस उस उस किस किस को क्या क्या कहती फिरी
खुद को कब का त्याग चुकी हूँ, मुझे किसी को न उधार दो
तब तो संभाल नहीं पायी अब दर्द अपना उतार लो

गलती अपनी कोई थी नहीं, समय चक्र ही घुमा गया
कष्ट तो दिया लेकिन सृष्टि सारी समझा गया

फिर उभरे वो शायद हम में, जब नाव अपनी एक पार हो
उसी से ही पूछ लेना अभी हाल क्यूँ बेज़ार हो
मैं तो संभाल नहीं पायी अब आप ही संवार लो

बदतमीज़ तो बहुत हूँ और कदर करना भी नहीं जानती
बहुत वैरागी बनाया आपको, सिर्फ धर्म हूँ पहचानती

अब तो आपकी सेवा ही धर्म है मेरा
कुछ भी समझ के स्वीकार लो
मेरी ये कोशिश रहेगी कि मूड ना आपका खराब हो

मैं तो नालायक हूँ और ऐसा मानती भी नहीं
उपदेश झाडती रहती हूँ और कुछ जानती ही नहीं

चाहे कुछ भी समझो मुझको पर मन अपना संवार लो
हँसते खेलते रहो और सेवा का अधिकार दो
तब तो संभाल नहीं पायी अभी प्रार्थना मेरी स्वीकार लो

इंतज़ार अपने किया और जिंदगी की राह चुनी
मौत तो मैं खोज न सकी व्यर्थ की ही बात बुनी

शिकायतों
के ढेर हों चाहे पर अब न कोई तकरार हो
तरसना भी भूल चुकी हूँ मिलने की कोई राह दो
तबसे तो बचती फिरी हूँ अपनी कैद में आप डाल लो

कभी इज्जत से बोलती हूँ कभी कैसे ही भाव जटक देती हूँ
बस रुलाना आता है मुझको, कैसे माने कि प्यार भी करती हूँ

प्यार न करना आये मुझको समर्पण ही स्वीकार लो
जो अच्छा लगे रखो बाकी भाव आप गुज़ार दो
पगली के पागलपन को इतना भी मत व्यवहार दो

खुद ही खुद को कहूं बावरी फिर उम्मीद का क्या सार हो
आपको ही संभालना है अब तो चाहे कब्र में उतार दो
हरि ॐ"

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...