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रविवार, 7 मार्च 2010

भजन - आज जवानी पर इतराने वाले ...चढ़ता सूरज धीरे ढल जायेगा

ये भजन कल एक बार सुना और बस इतना वैराग्य में डूब गया कि एक एक बात सत्य हैं । फिर क्यों हम एक दुसरे कि कमी ढूंढते हैं । क्यों नहीं जिंदगी से पार होने का उपाय ढूंढ लेते । एक दिन मृत्यु आएगी तब हम बहुत पछतायेंगे . आप इस भजन का ऑडियो अगर आँख बंद कर के ही सुने तो भी बहुत अच्छा हैं । मेरी उर्दू की नासमझी की वजह से एक दो शब्द गलत हो सकते हैं . इसके लिए माफ़ करें और मार्गदर्शन करें . विडियो का लिंक ये नीचे दे रहा हूँ । टी सिरीज़ ने इसको बनाया हैं और गायक हैं जाहिद नाजान ।

http://www.youtube.com/watch?v=_lw0-gvUsYU

गीत के बोल ये हैं
हुए नामवर बेनिशान कैसे कैसे , जमीन खा गयी नौजवान कैसे कैसे
आज जवानी पर इतराने वाले कल पछतायेगा
चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता हैं ढल जायेगा

तू यहाँ मुसाफिर ये सराय फानी हैं ,
चार दिन की मेहमा तेरी जवानी हैं
जर जमीन जेवर कुछ ना साथ जायेगा ,
खाली हाथ आया हैं खाली हाथ जायेगा
जानकर भी अनजान बन रहा हैं दीवाने
अपनी उम्र फानी पर बन रहा हैं दीवाने
इस कदर तू खोया हैं इस जहाँ के मेले में
तू खुदा को भूला हैं फंस के इस झमेले में
आज तक ये देखा हैं पाने वाला खोता हैं
जिंदगी को जो समझा जिंदगी पे रोता हैं
मिटने वाली दुनिया का एतबार करता हैं
क्या समझकर तू आखिर इसे प्यार करता हैं
अपनी अपनी फिकरो में जो भी हैं वो उलझा हैं
जिंदगी हकीकत में क्या हैं कौन समझा हैं
आज समझ ले कल ये मौका हाथ ना तेरे आएगा
गफलत की नींद में सोने वाला धोखा खायेगा
चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता हैं ढल जायेगा

मौत ने ज़माने को ये समां दिखा डाला
कैसे कैसे रुस्तम को ख़ाक में मिला डाला
याद रख सिकंदर के हौसले तो आली थे
जब गया था दुनिया से दोनों हाथ खाली थे
अब ना वो हलाकू हैं और ना उसके साथी हैं
जुंग जू ना कोरस हैं और ना उसके हाथी हैं
कल जो तन के चलते थे अपनी शान और शौकत पर
शम्मा तक नहीं जलती आज उनकी कुर्बत पर
अदना हो या आला हो सबको लौट जाना हैं
मुफलिस और दबंग का कब्र ही ठिकाना हैं
जैसी करनी वैसी भरनी आज किया कल पायेगा
सर को उठाकर चलने वाला एक दिन ठोकर खायेगा
चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता हैं ढल जायेगा

मौत सबको आनी हैं कौन इससे छूटा हैं
तू फनाह नहीं होगा ये ख्याल झूठा हैं
सांस टूटते ही सब रिश्ते टूट जायेंगे
बाप माँ बहन बीवी बच्चे छूट जायेंगे
तेरे ही जितने हैं भाई वक्त का चलन देंगे
छीन कर तेरी दौलत दो गज कफ़न देंगे
जिन को अपना कहता कब ये तेरे साथी हैं
कब्र हैं तेरी मंजिल और ये बाराती हैं
ला के कब्र में तुझको उल्टा फाक डालेंगे
अपने हाथो से तेरे मुह पे ख़ाक डालेंगे
तेरी सारी उल्फत को ख़ाक में मिला देंगे
तेरे चाहने वाले कल तुझे भुला देंगे
इसीलिए ये कहता हूँ खूब सोच ले दिल में
क्यों फंसाए बैठा हैं जान अपनी मुश्किल में
कर गुनाहों से तौबा के बद संभल जाये
दम का क्या भरोसा हैं जाने कब निकल जाए
मुठी बाँध के आने वाले हाथ पसारे जायेगा
धन दौलत जागीर से तुने क्या पाया क्या पायेगा
चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता हैं ढल जायेगा

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...