गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

कृष्ण साधको और आत्म संगिनी को समर्पित कविता

ये कविता मेरी दो तीन दौर को इकट्ठे जोड़ कर बनायीं गयी हैं . इसमें कुछ बाते हैं जो मुझे अपनी उन कृष्ण भक्त साधको को कहनी हैं जो बस कृष्ण प्रेम में पागल हैं . फिर अपने उन दोस्तों को बतानी हैं जो मेरी soulmate की परिभाषा के बारे में पूछते रहते हैं . ये कविता soulmate वाले कन्सेप्ट से थोडा आगे भक्ति की धरा में उस भाव को बढ़ा देने के लिए लिखी हैं . वन्दना जी के लिए तो खैर हैं ही . अपनी soulmate ढूँढने के आखिरी प्रयासों में ये कविता लिखी हैं की उसे अकल आये और वो मेरी जिंदगी में आये किसी बहाने से . और अब असली प्रार्थना उस माता जी से जो दो महीने से मेरी बात सुन नहीं रही हैं क्योंकि ये कविता असल में उन्ही को पूरी समझ आएगी और मुझे भरोसा हैं की एक बार फिर से वो मेरे जीवन में आएँगी अपने पतिदेव को ढूँढने के लिए . अगर मिल गया हो तो भी बता दे . आजकल स्पिरिचुअल माहौल में बड़े बदलाव हो गए इसीलिए मजबूरी में मुझे कुछ बताना पड़ रहा हैं . पर ये सदा नहीं रहेगा और सृष्टि वापस एक बार रिसेट मोड में जाएगी . आशा हैं जिनके लिए लिखी गयी हैं वो मेल करेगी क्योंकि बहुत समय से रहस्य अपने अन्दर रखने से प्रोब्लम सहन नहीं हो रही हैं . बाकि सभी लोग एन्जॉय करे एक नोर्मल कविता की तरह कि वह क्या लिखा हैं वीरेन्द्र ने .

मै
फिर तुम्हे कहता हू
दर्द तुम्हारा भी खुद सहता हू
उस कृष्ण कि ना बस तुम बात करो
उसके लिए ना तुम अपनी काली रात करो
भक्ति कि दुनिया का वो सबसे बड़ा दाग हैं
फोड़ दिए जिसने मेरी गोपियों के भाग हैं

छीन कर मेरे होठो कि हंसी जो दर्द सारे अपने दे गया
सपनो से भरी मेरी आँखों में जो बहते आंसू दे गया
मेरी आत्मा को जो सबमे बसाकर टुकडो में मुझे बाँट गया
कुरेद कर मेरे जख्मो को उन पर नमक छांट गया

उसी कृष्ण की तू क्यों इतनी दीवानी हैं
पाकर जिसे अच्छे अच्छो की जिन्दगी वीरानी हैं
मेरे आंसुओ का मै तुम्हे अब भी वास्ता देता हू
उसकी दुनिया से जाने को सीधा रास्ता बता देता हू

प्राणों से बसी उसकी यादो को बस तुम सदा के लिए भूल जाओ
चुपचाप सोने की कोशिश करो ना वृन्दावन की धूल खाओ
अगर ऐसा ना कर पाई तो मेरी तरह कही की ना रहोगी
फूलो से डरने वाली तुम दर्द के कांटे बता कैसे सहोगी

तेरे सारे सवालो का जवाब मै चुप रहकर दे देता हूँ
तेरे मौन व्यंग्यो को मै चीख चीख कर ले लेता हूँ
मेरी भक्ति बस तेरा प्यार फिर क्यों मुझे खींच नहीं लेती
किस्मत तेरे सामने हैं फिर क्यों मुट्ठी में भींच नहीं लेती

संदेह क्यों करती हैं जब विश्व का पूरा रहस्य तेरे सामने हैं
आत्मा तू जिसकी हैं उस पर अविश्वास के क्या मायने हैं
सिर्फ और सिर्फ उसका हो जाना तेरा प्रारब्ध हैं
पूछ अपनी सांसो से क्या ये नए जीवन का आरंभ हैं

बिना शर्तो के जो कृष्ण को मजबूर कर गया
उस वीरेन के हिस्से का सारा सुख क्यों मर गया

दुनिया अपने हिसाब से तोलेगी क्योंकि पुराने सारे तराजू हैं
मेरे ज्ञान समझ को जो उठा पाए ऐसे ना किसी के बुद्धि में बाजू हैं



जितनी जल्दी हो सके अपने जीवन की दिशा तय करके रहो
देर अगर हो गयी तो शायद माफ़ी मांगने लायक भी ना रहो
सच ये कि अँधेरी रात को मिटाने जैसे कोई सूरज उगता हैं
झूठ बोलती तेरी बुद्धि जो वीरेन तुझे पागल लगता हैं

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

एक कविता - माँ को समर्पित

हर माता पिता को बुढ़ापा देखना पड़ता हैं । ऐसी ही एक कविता लिखी हैं जिसमे संताने अपनी माँ को बताना चाहते हैं कि वो बुढ़ापे को कैसे संभाले । . मैंने प्रेरित होकर अपनी मम्मी के लिए लिखी हैं . हर किसी माता पिता की तरह ही सबको एक उम्र के बाद शरीर कमजोर महसूस होता हैं तो अनेक चिंताए घेर लेती हैं की बेटो को क्या होगा . कैसे ये रहेंगे अगर मै ना रही तो या दुनिया बड़ी तेज़ हैं आदि आदि बाते .

मेरी माँ तू आजकल इतनी उदास क्यों हैं
तेरे माथे पर बुढ़ापा लाई झुर्रिया ख़ास यो हैं

जीवन के हर दौर को मानव झेल सकता हैं
बचपन में जैसे हर बच्चा खेल सकता हैं
हर इन्सान जवानी में जो ताकत से लड़ पाता हैं
वही मानव रुपी फल बुढ़ापे में झड़ जाता हैं .

सब फल तो पक कर मीठे बन जाते हैं
जिंदगी में बुढ़ापे के साल फीके रह जाते हैं
यह ही तो परमात्मा का विधान हैं
झुक जाता इसके पीछे हर इन्सान हैं

जब तुने तो सब कुछ अपना कर्तव्य निभा दिया
अपने बेटो में जीने का सच्चा हौसला सिखा दिया
क्या उनकी आत्माए तेरे सफल होने कि गवाही नहीं देती
प्रकृति क्या रह रह कर सारा श्रेय इसका तुझे नहीं देती

ऐसा कौन सा काम रह गया जो तू चिंता करती हैं
तू तो अज़र आत्मा हैं सिर्फ शरीर की परते मरती हैं
गुरुओ से पाया वो ज्ञान तेरी सच्ची धरोहर हैं
ना अब तू कुछ पिछला सोच तेरा भविष्य मनोहर हैं

तेरे बेटे कभी तेरे लिए पुत्रवधू भी लायेंगे
भाग्य जिन देवियों के सब लोग सराहेंगे
पर इन चीजों का एक निश्चित समय होता हैं
फिर क्यों तेरा कोमल मन धीरज खोता हैं

क्या चीजों के देरी होने में तू कही दोषी हैं
तेरा क्या बस जब तू हमेशा कर्मयोगी हैं
शरीर के धर्म में बुढ़ापा भी तो जरुरी हैं
भगवान को भी पता हैं तू अपने प्रयासों में पूरी हैं

फिर एक बात बता क्या तेरे करने से ये दुनिया चलती हैं
इसका प्रबंधन प्रभु के हाथो तो उसी लगाम से दुनिया बढती हैं
बेमतलब की मानी हुई जिम्मेदारियों से क्या हो जायेगा
बस इतना जरुर हैं तेरा मूल आत्मा इसमें फिर खो जायेगा

तुने अपने सारे फ़र्ज़ निभाए बस अब शांति से आगे निभाती चली जा
शरीर से अपनी आसक्ति मिटाकर मन बुद्धि को आत्मा में समाती चली जा
तेरे सारे कर्तव्यों का निर्वाह हो चुका हैं
आज्ञा तेरी मानने को शीश हमारा झुका हैं
ईश्वर सारे पुण्यो का फल बेटे के रूप में भेज देते हैं
तभी स्नेह की लता से उपजे "वीरेन" जैसे तेरे बेटे हैं

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...