जो इस कड़ी में लिखी कविता को पहली बार पढ़ रहे हैं , उनके लिए पंद्रहवी कविता का लिंक ये हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/06/blog-post_16.html
तेरी जिंदगी में क्या मैं भी कही हूँ
भूल गया जो तुझे वो शख्स नहीं हूँ
जिंदगी में मैंने तुझे क्यों वर लिया था,
चेहरा तेरा क्यों आँखों में भर लिया था
ईश्वर ने मुझे ये क्या गम दिया था ,
माहौल को जिसने मेरे नम किया था
तू तो कभी समझ भी नहीं पायेगी
मौत का वो मंजर किसने जीया था
कविताओ से भी ना वो भाव मिलेंगे ,
जहर तेरे हिस्से का क्यों मैंने पीया था
तुम सदा हंसती खिलखिलाती रहो
गलतियो को तेरी मैं सुधार लूँगा
बस दुःख तेरे छीनकर सारे ,
अपने सारे सुख तुझे उधार दूंगा
जितना भी दुःख तुझे महसूस हुआ होगा ,
वो तो मेरे वाले की बस झलक ही थी
तीन जन्म और तीन आत्माओ की बात
तुझे बस एक प्रेम कथा की भनक सी थी
मैंने तो अपनी तकदीरो का रंग बदलते देखा हैं
प्यार की मंजिलो पर नसीबो को बिखरते देखा हैं
शिव जी के विधान को भी कभी बदल दिया था
पर तेरे जीवन में ना कभी दखल दिया था
कभी कभी मन करता हैं कि एक संकल्प कर ही डालू
माया के उस दौर को बस अभी मसल ही डालू
तब तू देखे कि मेरे प्यार और त्याग से ना कुछ बड़ा होता हैं
"वीरेन" की आत्मा में समाया जब श्री हरि खड़ा होता हैं
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