मेरा दुःख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मेरा दुःख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 10 जुलाई 2010

अपनी आत्मा बेच चुकी सरकार और मीडिया से दिल कि भड़ास ( कौन सुनेगा हमारी )

एक साधारण आम मध्यमवर्गीय भारतीय कि तरह मैं भी महंगाई की मार से परेशान हूँ । सच कहू पांच साल पहले जिस दस पंद्रह हज़ार में घर चल रहा था अब वो बीस पच्चीस तक पहुँच गया हैं , पर मेरी तनख्वाह तो नहीं बढ़ी हैं ।
अब नीचे मैं अपना दुःख शुरू करता हूँ
हे हमारे देश के सोये हुए प्रधानमंत्री ( श्रीमती सोनिया गाँधी सही रहेगा शायद )
मुझे अब तक समझ नहीं आया कि आप लोग हमारे दुःख दूर करने के लिए सत्ता में हैं या बढ़ाने के लिए । एक सूची देखिये जिन्होंने मेरा दिमाग ख़राब किया हुआ हैं ।

एक :::::::महंगाई बढती जा रही हैं पर क्या आपकी सरकार कि जवाबदेही नहीं हैं क्याबी जे पी ने जो बंद किया था उसका भी मुझे तो नुक्सान ही हुआ क्योंकि हमारी कंपनी उसका किसी और दिन में शिफ्ट कर लेगीपर आप ने और मीडिया ने मिलकर बस तोड़ फोड़ को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया मेरी कमर टूट चुकी गृहस्थी पर कोई ध्यान नहीं दिया

दो
::: रोज़ रोज़ आतंकवादी हमले हो रहे हैं पर पता नहीं आप पाकिस्तान से मीटिंग में व्यस्त हैं , पूरे साठ साल से तो आप लोग यही कर रहे हो पर एक समाधान क्यों नहीं निकाल पा रहे हो , साठ साल कि ढोंगी शांति से तो साठ दिन का सच्चा युद्ध ठीक हैंवैसे भी सैनिक भी तो हमारे परिवारों पर के ही मरेंगे , आप तो हमारे बस दुःख में शरीक होने के लिए एकदम सफ़ेद कपड़ो में आओगे , बिके हुए मीडिया चैनलों पर देशभक्ति की दुहाई दोगे , जबकि आपे बेटा बेटी कही स्विट्ज़रलैंड में जमा पैसो की रसीद कटवा रहे होंगे

तीन
:::::मुझे बताये की ममता बैनर्जी जी का हम क्या करेट्रेनों पर सुरक्षा की कमी होने से नक्सल हमलो में तेजी हो रही हैं पर वो कह रही हैं कि रेलवे का इससे कुछ लेना देना नहीं हैंमुझे डर हैं कि कल यही आपकी पार्टी के हर मंत्री ने कहना हैं कि आर्मी में घोटाला हुआ हैं पर रक्षा मंत्रालय का इससे कुछ लेना देना नहीं हैं

चार
:::हम पढ़ते आये हैं कि देश में लोकतंत्र हैं और जनता के वोटो से चुनकर आये नेता ही देश चलते हैंआपको कहाँ कि जनता ने चुना हैं , किस मैडम को संविधान ने अधिकार दे दिया हैं कि वो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति सिर्फ अपनी इच्छा से बना देती हैं , एक अरब लोगो के वोटो कि कोई कीमत नहींअब तो हद और भी हो गयी जो एक नासमझ से लगने वाले (और जिसे भारत कि आत्मा के बारे में पता नहीं हैं ) लड़के को सिर्फ पारिवारिक रिश्ते कि वजह से हमारे ऊपर थोपा जाने वाला हैं

पांच
:::::हमारा चौथा स्तम्भ मीडिया कम पत्रकारिता शायद आपने खरीद लिया हैंनहीं तो पिछले साल इतनी कमरतोड़ महंगाई के बाद भी आप कैसे जीत गएपिछले मुख्य चुनाव आयुक्त आपकी सरकार में मंत्री हैं और नए वाले सिर्फ आपके प्रति वफादारक्या सच में आपने वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी तो नहीं करवाई क्योंकि आम आदमी तो सच में बताऊ इतना परेशान था कि सिर्फ आपको हटाने को तैयार था

छः
::::::आपकी सरकारों के लोग कुछ ना कुछ बयान देते रहे पर हमारे घावो पर मरहम नहीं बल्कि नमक छिडकने जैसा काम किया , सारे बयान तो मैं नहीं लिख पाउँगा क्योंकि आप लोगो ने थोक में काम किया हैं , फिर भी गूगल पर सर्च मार ले शीला दीक्षित , शरद पवार आदि के बारे में

सात
:::::::::::माननीय सोनिया गाँधी ने कभी प्रधानमंत्री पद को त्यागा और संत बनीपर मुझे तो लगता हैं प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को तो वो जब चाहे हड़का सकती हैं तो उनका त्याग मानने का मेरा दिल नहीं करताक्योंकि दरअसल वो तो बड़े पद पर हैं इनसे .

आठ
::::वैसे तो बाते और भी हैं पर बस ये कि आपकी सरकार में चापलूसी कि हद इतनी गिर गयी हैं कि सिर्फ एक परिवार का गुणगान करके प्रधानमन्त्री पद तक पाया जा सकता हैंमुझे दुःख होता हैं जब मैं एक आम भारतीय को देखता हूँ पर मीडिया हमारा या तो प्रियंका गाँधी के गालो के डिम्पल दिखा रहा होता हैं या उनकी साड़ी या उनकी चुनाव वाले दिन कि जींस टॉप कि बिंदास छवि

सबसे
ज्यादा दुःख मुझे उस दिन हुआ था और यकीन हुआ था कि हमारा पूरा देश नपुंसक हैं जिस दिन सोनिया गाँधी के साथ मनमोहन किसी शोक सभा सी में बैठे हुए थे तो प्रियंका गाँधी के बेटे के जूते के फीते बांधकर नेहरु गाँधी परिवार का क़र्ज़ अदा कर रहे थेक्या राष्ट्राध्यक्ष ऐसा होता हैं

मुझे पता हैं मेरी हर बात थोड़ी कांग्रेस और गाँधी परिवार के खिलाफ लगी होगी , पर क्या जो मेरे जैसे साधारण आदमी को इतने मुद्देदिख रहे हैं वो उन्हें प्रधानमन्त्री होकर भी नहीं देख सकते । हम तो अपने भारत के वर्तमान संतो को सुनने के बाद ही कोल्ड ड्रिंक तक को पीने में अपराध बोध महसूस करते हैं , एक पैसा किसी के हक़ का नहीं लेना चाहते हैं , नॉन वेज क्या अंडा भी नहीं खाते , सिर्फ धार्मिक स्थलों पर ही जाते हैं । सिर्फ इतनी साधारण सी जिंदगी हमारी सुरक्षित करने कि जिम्मेदारी किसी सरकार से नहीं हो पा रही हैं तो क्या उसे डूब कर नहीं मर जाना चाहिए । क्यों आत्महत्या नहीं कर लेते सारे मंत्री जो हमारे प्रतिनिधि होने कि नौटंकी करते हैं और मैडम के तलवे चाटने को मरे रहते हैं । ये वही शरद पवार हैं जो कभी कोंग्रेस से मैडम कि वजह से अलग हुए थे और आज देखो इनकी दुम उग आई हैं

बहुत बाते हैं इतनी कि सारी जिंदगी लिख सकता हूँ , बस थोड़े लिखे को ज्यादा समझना
और एक बात कीमते सरकार बढ़ा रही हैं पर फिर ढीठ बयान भी दे देती हैं कि कीमते नहीं घटेगी क्योंकि पैसे खा चुकी होगी शायद । पर मेरी सेलरी बढ़ाने की जब बात आती हैं तो दो साल से आर्थिक मंदी का बहाना बना लेती हैं । हमारा घटिया प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री या राष्ट्रपति कभी कभी जब बयान देता हैं की दुश्मन का मुहतोड़ जवाब देंगे तो उनकी पतली और मरी मरी सी आवाज़ सुनकर हंसी आ जाती हैं कि जिनकी आवाज़ तक गले से नहीं निकल रही हैं ये क्या देश संभाल रहे होंगे ।

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...