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बुधवार, 6 जनवरी 2010

वंशावली भाग सात - भगवन विष्णु के चौदह अंशावतार ( सनकादि ऋषि और नारदजी अवतार )

वंशावली भाग छः में मैंने दस पूर्ण अवतारों के बारे में बताया था । अब इस पोस्ट में हम चर्चा करते हैं उनके अंशावतारों की । समय भेद और ग्रन्थ भेद के कारन मुझे एक दो अवतारों के बारे में थोडा कम पता हैं । वैसे मैं अवतार विशेष के लिए अपनी कम जानकारी भी स्पष्ट कर दूंगा । फिर भी ज्ञानी साधक मार्गदर्शन दें जिससे इश्वर के जिज्ञासु स्पष्ट जानकारी पा सकें । सभी चौदह अवतारों का वर्णन एक पोस्ट में नहीं होगा क्योंकि पोस्ट बहुत बड़ी हो जायेगी । शायद चार पांच पोस्ट लगेंगी , सबका शीर्षक एक ही होगा बस ब्रेकेट में मैं अवतार का नाम लिख दूंगा जिससे आपको ढूंढना ना पड़े।

अवतार की क्रम संख्या सिर्फ आसानी के लिए हैं इसे अवतार के समय से ना जोड़े जैसे ऐसे ना समझे कि व्यास जी तीसरे क्रम पर हैं तो चौथे क्रम वाले अवतार भगवान् कपिल ने उनसे बाद में जन्म लिया हैं । मैंने तो सिर्फ गिनती के लिए एक एक अवतार को क्रम दिया हैं ।

पहला अवतार : ( सनकादि )

हम सबने सनकादि ऋषिओं के बारे सुना हैं । ये पांच वर्ष के चार बालक हैं जो सिर्फ धोती पहने रहते हैं । भगवान् विष्णु के प्रचार में लगे हुए ये पार्षद सीधे विष्णुजी के अंश से प्रगट हैं । इन चारों के नाम हैं : सनक , सनंदन , सनातन और सनत्कुमार । इसीलिए इनको सनक आदि या सनकादि के नाम से जाना जाता हैं ।
ये सबसे पुरातन विष्णु अंशावतार माना जा सकता हैं। ये बेरोक टोक कहीं भी आ जा सकते हैं । सरल और पवित्र लोगों को इस समय में भी लोगों को इनके दर्शन होते हैं । जहाँ हरि संक्तिर्तन कथा होती हैं , वहां वे वेश बदलकर या सांकेतिक रूप से प्रगट होते हैं । वैसे तो ये परम शांत हैं पर एक बार विष्णु जी के पार्षद जय विजय ने इन्हें क्षीरसागर में जाने से मन किया तो इन्होने जय विजय को राक्षस होने के श्राप दिया जिससे वो हिरन्यकश्यप , रावन और शिशुपाल के रूप में आये।



दूसरा अवतार ( नारद )

अपने वाणी चातुर्य और परम नारायण भक्त नारद जी सिर्फ सरल हृदय साधको के समझ में आने वाले चरित्र हैं ।

एक जन्म में ये दासी के पुत्र थे । संत सेवा के कारन इन्हें विष्णुजी के दर्शन हुए । तब विष्णुजी ने वरदान दिया कि इस जन्म के समाप्त होने के पश्चात वे विष्णुजी के अंश से ब्रह्माजी के मानस पुत्र होकर नारायण के परम पार्षद बनेंगे । नारद जी इश्वर भक्तो के आदर्श , प्रेम सरलता , ज्ञान सागर माने जाते हैं । ये चिरंजीवी भी हैं और इस समय भी प्रगट होते हैं । इनकी छवि और चरित्र के लिए नारद भक्ति सूत्र प्रमाण हैं । नारद जी बिलकुल भी वैसे व्यंग्यकार या मजाकिया किस्म के नहीं हैं जैसे फिल्मो में नाटकों में दिखाया जाता हैं। कलियुग में दोशाबुधि दर्शन के कारन हमारे ही देखने का नजरिया बदल गया हैं

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...