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मंगलवार, 8 जून 2010

राष्ट्र प्रेम को समर्पित मेरी एक और कविता

मेरे लिए तो प्रेम ईश्वर, राष्ट्र, समाज और मित्र सबमे हैं . प्रेम का हर भाव मुझे ईश्वर की देन लगता हैं क्योंकि हमारे व्यक्तिगत प्रेम में तो स्वार्थ भरा होता हैं . आज कुछ ईश्वर प्रेम ने राष्ट्र को समर्पित ये कविता लिखने को उत्साहित किया . शुरू में थोडा आदतवश नेताओ को भड़ास का माध्यम सा बनाना पड़ा , जो आपको थोडा पार्टी विशेष के विरोध में लग सकता हैं . पर राष्ट्र के लिए कई बार बहुत कड़क होना पड़ता हैं , हमारे ढीले पीले रवैये ने देखिये कमजोर इच्छाशक्ति बढाकर आतंकवाद को टोनिक दिया हैं . देखिये तो सही कैसी कैसी आतंकवादी घटनाये हो जाती हैं और इनको समर्थन देने वाले लोग हमारे अंदर देश में मौजूद हैं
खैर कविता पढ़े ,

उनकी मेहनत का ना यकीन सो हक़ हमारे भी बिखर गए
जब सहने का दौर आया तो पत्थर रिश्ते भी पिघल गए

क्यों आस बंधाते हो चंद झूठे लोगो से
ये कैसी आग बुझाते हो गीले नोटों से

शिकवा दुनिया से क्या हो जब ईश्वर वफ़ा ना कर पाए
ज़माने को मारी जिन्होंने ठोकर वो खुद कहाँ संभल पाए

सच्चे दिल वाले तो कब के मिट कर फ़साना बन खो गए
और झूठी नीयत वाले कुछ चोर सत्ता का आईना हो गए

किस किस में कमी निकालू जब चिराग के तले ही अँधेरा हो
सबको कैसे फांसी चढ़ाऊ जब वोट से चुना हर सत्तावान मेरा हो

तुफान से लायी शहीदों की कश्ती आखिर हमने कहाँ फंसाई
संविधान की आड़ में कुकर्म करके हमने राष्ट्रीयता गँवाई

किसी के मन को मोहने वाले सत्ताधीश दरअसल दगाबाज थे
मैडम के हाथो अपने सम्मान गिरवी रख चुके कुछ ड्रामेबाज थे

महंगाई से मैं मारा गया पर इनकी दुकाने सज रही थी
स्विस बैंक इनका हुआ पर मेरी मंदी चल रही थी

मैं धर्म से से जुड़ा तो इन्होने मुझे मजहबी करार दिया
देश जिहोने तोड़ दिया इन्होने उसे फरार किया

देश धर्म ना सही कम से कम एक इंसान तो बच जाता
बस भारत माँ को गाली ना देते तो" वीरेन" इनका क्या जाता

मत पुकार माता तेरा " वीरेन " तो बिना बुलाये आ जाएगा
तेरे कदमो में फूल नहीं माँ वो तो अपना मस्तक बिछाएगा

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे


Email:virender.zte@gmail.com

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...