प्रेम ईश्वर भाकित saralkumar saral zte virender blog hindi hindu poem love sad लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रेम ईश्वर भाकित saralkumar saral zte virender blog hindi hindu poem love sad लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 8 मई 2010

प्रेम को समर्पित कविता ( ईश्वर प्रेम )-भाग छः

अब तक मैंने प्रेम के ऊपर पांच कविताये लिखी हैं । इनको भागो में इसीलिए बना रहा हूँ कि मुझे प्यार पर अगर खुद भी ढूंढना पड़े तो आसानी से लिंक मिलता जाये । विषय क्योंकि मुझसे , ईश्वर से और उस लड़की से प्रेरित हैं इसीलिए ये सांझी थीम रखने के लिए भाग क्रमांक देना जरुरी हैं , इससे भाव की तारतम्यता बनी रहेगी और कविता दर कविता बात आगे बढ़ेगी । किसी और विषय पर होता तो मैं भाग नहीं डालता ।
ऐसा मैं इसीलिए भी कर रहा हूँ कि मैं खुद इतनी गहरी प्रेम कि मनोदशा में उतरा हूँ कि हर बात को जोड़ने कि कोशिश करता हूँ । मुझे सच कहू तो किसी को खुश रखने के लिए या ब्लॉग पर भी डालने कि दिलचस्पी नहीं हैं क्योंकि ये मेरे जैसे धार्मिक व्यक्ति के लिए ही बहुत समस्या कड़ी कर रहा हैं । खुद ईश्वर कि तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही हैं , कई मेरे गुरु भाईओं ने मुझे कहा कि ये मैं क्या व्यभिचार जैसा कुछ रच रहा हूँ , मतलब वो मुझे कोई छिछोरा समझ बैठे हैं । खैर जीवन भी अजब पहेली हैं । हमें कोई नहीं समझ सकता और फिर हम क्यों किसी को समझे । बस जैसी जिंदगी आये जी लो उसे । प्यार तो वैसे ही बहुत ही सच्चे और धैर्यवान लोग करते हैं । कुछ लोग जो प्यार को judge करने की कोशिश करते हैं , वो कभी प्यार को जानते नहीं हैं । यह तो गूंगे को गुड का स्वाद पूछने वाली बात हैं । आप तबाह हो जायेंगे अगर आपको प्यार हो गया तो । यहाँ कृपया फ़िल्मी प्यार को थोडा दूर रखे क्योंकि वहां तो सारा व्यभिचार हैं और इसीलिए मेरे साधक भाई बहन मुझे गलत समझ रहे हैं । खैर हे हरि हम तेरी शरण हो , तेरी मर्ज़ी पूरण हो ।
पांचवी कविता का लिंक ये हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post.html

आज की कविता
हे हरि ! तेरे द्वार का मैं भिखारी बन जाऊ
तेरे तरस खाकर वो मुक्ति का सिक्का पाऊ
सुना हैं तेरे प्रेम से जीवन का मोल दिख जाता हैं
बस तुझे चाहने से सौदा सस्ते में निभ जाता हैं

राधा जी जितना तो मैं तेरा प्रेमी नहीं हूँ
मीरा जी जितना तो मैं भजन नेमी नहीं हूँ
मेरा तो मन पल पल तुमसे डिग जाता हैं
बस थोड़े दुःख से ही हौंसला हिल जाता हैं

हे प्रभु , तुम तो दयालु हो अब तो मुझे तार दो
मर गया प्यार के बोझ से और ना अब भार दो
क्यों किसी के प्रेम में तुने मुझे बर्बाद किया
उजाड़ी क्यों मेरी दुनिया , घर ना क्यों आबाद किया

इतनी तो मेरी हैसियत नहीं थी कि तुझे भी क्षोभ होने लगा
मेरे प्रेम की ताकत से तुझे राधा जी पाने का लोभ होने लगा
क्या पिता भी पुत्र के प्रेम में बाधक बनने आता हैं
जब दोष तेरा हो तो क्यों वीरेन व्यभिचारी कहलाता हैं ,

अभी इससे आगे तो धार्मिक रहस्य की बात हैं , वो मैं ब्लॉग पर नहीं डाल सकता हूँ । मैं मानता हूँ की मेरा हर शब्द थोडा आपको संदेह में डालता हैं की जो लिखा जा रहा हैं उसका वही अर्थ हैं या सांकेतिक हैं या ये वीरेन्द्र की कल्पना हैं । पर अब तक की सारी कविताये सच हैं हर पंक्ति का अर्थ हैं और सांकेतिक भी । अभी आज थोडा भावुकता के कारन ज्यादा लिख गया । धार्मिक रहस्य थोड़े परेशान करते हैं और सच कहू तो बस रुला डालते हैं । ईश्वर प्यार तो बहुत करता हैं पर पता नहीं क्यों साथ बैठा भी मदद नहीं करता ।

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...