यह भजन मैंने 2002 में सुना था और पहली बार में इतना अच्छा लगा याद कर लिया । आशा है कि सभी गुरु भाईओं को यह पसंद होगा । यह भजन आश्रम के कैसेट "भक्ति अमृत " में है ।
है वही भाग्यवान जो भगवान् को चाहे ,भगवन को चाहे
विद्वान होके नित्य विद्यमान को चाहे विद्यमान को चाहे
हरि हरि ॐ हरि हरि ॐ
भोगी सदा ही भोग के सामान को चाहे ,
अभिमानी सदा अपने ही सम्मान को चाहे
वह त्यागी तपस्वी भी कीर्ति दान को चाहे ,
वह देव पुजारी भी तो वरदान को चाहे
कोई चाहे पुराण या कुरान को चाहे , हरि हरि ॐ ........है वही
कितने ही अपने भले बुरे काम में भूलें,
कुछ नाम में भूलें है कोई नाम में भूलें
कोई हज़ार लाख जोड़ दाम में भूले ,
जो रूप के मोहि है गोरे चाम में भूले ,
भूले नही वो जो दयानिधान को चाहे , हरि हरि ॐ .......है वही
रहता है भिखारी सदा धनवान के पीछे ,
मोहि भूला करता है संतान के पीछे
दुर्बल रहा करता है बलवान के पीछे ,
खोता है मुरख सब कुछ अज्ञान के पीछे
पर बुद्धिमान प्रभु के ही विधान को चाहे , हरि हरि ॐ .......है वही
जो नित्य विद्यमान है वह दूर नही है ,
वह सर्वमय है साक्षी है और यही है
सब उसी के भीतर है जो कुछ भी कहीं है ,
हम भूले हुए जहाँ भी है वह भी वही है
यह पथिक किसी विधि उन्ही महान को चाहे , हरि हरि ॐ .....है वही
भगवान् वही जिससे सब पूरे होते काम ,
भगवान् से प्रकाशित है सारे रूप नाम
भगवान् में ही जीव को मिलता परम विश्राम ,
सबके वही परम आश्रय है सतचित आनंद धाम
जो ज्ञान में है इसी अधिष्ठान को चाहे .
हरि हरि ॐ हरि हरि ॐ !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!