हरि हर शरणम्
हे हरिमैं आपकी शरण हूँ । अब समय आ गया है की आप मेरा उद्धार कर दें । अब मुझमे इतनी ताकत नहीं बची किदुनिया से संघर्ष करू या आपकी इस शरीर से सेवा कर सकूँ । आप ही तो कहते हो कि जब मुझे कोई पुकारता है तो मैं आ जाता हूँ । इस संसार में अपनी इच्छा पूर्ति करते करते मैं तंग आ चुका हूँ ।
आप तो सब जानते हैं फिर क्यों जानकार भी अनजान बने हुए हैं । कुछ लोग जो धर्म में नए नए हैं हैं वो भी कहते हैं की वो अपने इष्ट से बात करते हैं । हमें तो प्रभु कोई पूर्वाग्रह नहीं की आप गुरु ,कृष्ण या हरि या शिव बनकर आये अगर आप चाहते हैं की आप मुझे कुछ और बनकर दर्शन देना चाहते हैं तो हम अपनी कल्पना को वैसा
बस बार बार यही दुआ करते हैं की कभी तो हम पर दया करो । बनाने को भी तैयार हैं । हम तो अपनी सोच आप पर लाद ही नहीं रहे हैं
आपके लिए बस सिर्फ ये ही पंक्ति याद आती है
" झूमे झुके कभी न बरसे कैसे हो तुम घनश्याम
कब लोगे शरण मेरे राम
चलते चलते मेरे पग हारे आई जीवन की श्याम
कब लोगे शरण मोरे राम
कहते हैं तुम हो दया के सागर
फिर क्यूँ खाली मेरी गागर
सुन के जो बहरे हो जाओगे
आप ही छलिया कहलाओगे
मेरी बात बने न बने हो जाओगे तुम बदनाम
हे राम हे राम