ये कविता बस छोटी सी हैं . बस लिख डाला , मेरे साथ दिक्कत यही हैं की भाव बहुत ज्यादा हैं इसलिए किसी को एक लाइन की टिपण्णी देने बैठता हू तो विचारो की असंख्य बाते आ जाती हैं . यहाँ टिपण्णी देने गया था , कविता बना बैठा ( http://kavyawani.blogspot.com/2011/01/blog-post.html )
आप फिर भी पढ़ लीजिये और मार्गदर्शन करे
दर्द में आंसू अगर राधा को ना आते
कन्हैया कृष्ण भला क्यों उन्हें अपनाते
प्रेम में विरह का एक पड़ाव हैं
परमात्मा से जहाँ गहरा जुडाव हैं
पर प्रभु आखिर में हमेशा अपनाते हैं
तभी तो हम हरे राधा कृष्ण नाम गाते हैं
प्रियतम तो हमेशा खुद कि आत्मा होता हैं
फिर भी हमारा मन हमेशा धीरज खोता हैं
प्रेम कि कोई शर्त नहीं होती
भक्ति राधा मीरा सी कही होती
तो मै अपना आप कृष्ण में फिर से मिला देता
भागवत के ज्ञान वैराग्य को दिल में जिला देता
मिलना बिछुड़ना एक सीमा तक ही रहेगा
आखिर में तो परमात्मा बस यही कहेगा
तू मेरा और मै तेरा प्रियतम फिर क्यों तू उदास हैं
राधा की परीक्षा पर खरा उतरा इसीलिए "वीरेन " खास हैं
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
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गुरुवार, 27 जनवरी 2011
शनिवार, 22 जनवरी 2011
भगवान के श्री चरणों में एक आत्मनिवेदन जैसी प्रार्थना- एक कविता
प्रभु श्रीहरि के चरणों में आत्म निवेदन को समर्पित हैं बिना किसी लाग लपेट के । वैष्णवों से उम्मीद हैं मार्ग दर्शन करे ।
हे प्रभु जो इन्सान सच्चे होते हैं
वही तेरे साधक बच्चे होते हैं
ना उन्हें अपने सुख दुःख या मनकी परवाह भी
नसों तक में नासूर बहता पर ना करे वो आह ही
उनका जीवन तेरी मुश्किलों से दिया हुआ
प्रारब्ध के धागों में उनका हर हाल सिला हुआ
फूल की आशा में रुके हुओ को भले कांटे चुभ जाये
सारे कठिन रास्तो को पार करके भी उनकी मंजिल रुक जाये
दुखो के फलो से भरे उनके वृक्ष जैसे कंधे मुडजाये
स्तुति के पात्र वो चाहे बेचारे दुनिया की निंदा में जुड़ पाए
आखिरी कदम तक प्रभु की बाट देखते हैं
भक्ति के सहारे जिंदगी की अँधेरी रात झेलते हैं
तब भी कुछ ज्ञान वाले कहेंगे की भक्ति से कभी दुःख नहीं होता
भला राधा मीरा का अक्स भी कृष्ण सा सुख कभी कही खोता
मुट्ठी भर की खुशिया हजारो जन्मो के पुण्यो से ना आ सकी
सालो की पूजा भी साधक की एक अनुराधा को ना भा सकी
भास्कर सा उसका तेज़ कभी कभी तो दुनिया को हरा सकता था
छोटे छोटे दीपकों से तो उसका साया भी ना डरा करता था
पर प्रकृति ने एक भक्त को मजबूर कर दिया था
किस्मत ने एक अधूरे खाली कल को आज भर दिया था
जिसकी जिम्मेदारी ने आंसुओ की एक नयी भाव झील चला दी
अपना एक स्वार्थ भी बह गया पर परमार्थ की कई नाव सी बहा दी
परम प्रभु आराधना का ये कौन सा आपने दौर बताया हैं
सरल से मुझ साधक को कैसी जटिल उलझन में लाया हैं
क्या मानू कि धर्म की अनूठी परिभाषा लिखने की ये कोई नीव हैं
भगवान बनकर निस्वार्थ सबकी मदद करने वाला " वीरेन " भी जीव हैं
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हे प्रभु जो इन्सान सच्चे होते हैं
वही तेरे साधक बच्चे होते हैं
ना उन्हें अपने सुख दुःख या मन
नसों तक में नासूर बहता पर ना करे वो आह ही
उनका जीवन तेरी मुश्किलों से दिया हुआ
प्रारब्ध के धागों में उनका हर हाल सिला हुआ
फूल की आशा में रुके हुओ को भले कांटे चुभ जाये
सारे कठिन रास्तो को पार करके भी उनकी मंजिल रुक जाये
दुखो के फलो से भरे उनके वृक्ष जैसे कंधे मुड
स्तुति के पात्र वो चाहे बेचारे दुनिया की निंदा में जुड़ पाए
आखिरी कदम तक प्रभु की बाट देखते हैं
भक्ति के सहारे जिंदगी की अँधेरी रात झेलते हैं
तब भी कुछ ज्ञान वाले कहेंगे की भक्ति से कभी दुःख नहीं होता
भला राधा मीरा का अक्स भी कृष्ण सा सुख कभी कही खोता
मुट्ठी भर की खुशिया हजारो जन्मो के पुण्यो से ना आ सकी
सालो की पूजा भी साधक की एक अनुराधा को ना भा सकी
भास्कर सा उसका तेज़ कभी कभी तो दुनिया को हरा सकता था
छोटे छोटे दीपकों से तो उसका साया भी ना डरा करता था
पर प्रकृति ने एक भक्त को मजबूर कर दिया था
किस्मत ने एक अधूरे खाली कल को आज भर दिया था
जिसकी जिम्मेदारी ने आंसुओ की एक नयी भाव झील चला दी
अपना एक स्वार्थ भी बह गया पर परमार्थ की कई नाव सी बहा दी
परम प्रभु आराधना का ये कौन सा आपने दौर बताया हैं
सरल से मुझ साधक को कैसी जटिल उलझन में लाया हैं
क्या मानू कि धर्म की अनूठी परिभाषा लिखने की ये कोई नीव हैं
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