ये कविता बस छोटी सी हैं . बस लिख डाला , मेरे साथ दिक्कत यही हैं की भाव बहुत ज्यादा हैं इसलिए किसी को एक लाइन की टिपण्णी देने बैठता हू तो विचारो की असंख्य बाते आ जाती हैं . यहाँ टिपण्णी देने गया था , कविता बना बैठा ( http://kavyawani.blogspot.com/2011/01/blog-post.html )
आप फिर भी पढ़ लीजिये और मार्गदर्शन करे
दर्द में आंसू अगर राधा को ना आते
कन्हैया कृष्ण भला क्यों उन्हें अपनाते
प्रेम में विरह का एक पड़ाव हैं
परमात्मा से जहाँ गहरा जुडाव हैं
पर प्रभु आखिर में हमेशा अपनाते हैं
तभी तो हम हरे राधा कृष्ण नाम गाते हैं
प्रियतम तो हमेशा खुद कि आत्मा होता हैं
फिर भी हमारा मन हमेशा धीरज खोता हैं
प्रेम कि कोई शर्त नहीं होती
भक्ति राधा मीरा सी कही होती
तो मै अपना आप कृष्ण में फिर से मिला देता
भागवत के ज्ञान वैराग्य को दिल में जिला देता
मिलना बिछुड़ना एक सीमा तक ही रहेगा
आखिर में तो परमात्मा बस यही कहेगा
तू मेरा और मै तेरा प्रियतम फिर क्यों तू उदास हैं
राधा की परीक्षा पर खरा उतरा इसीलिए "वीरेन " खास हैं
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
गुरुवार, 27 जनवरी 2011
शनिवार, 22 जनवरी 2011
भगवान के श्री चरणों में एक आत्मनिवेदन जैसी प्रार्थना- एक कविता
प्रभु श्रीहरि के चरणों में आत्म निवेदन को समर्पित हैं बिना किसी लाग लपेट के । वैष्णवों से उम्मीद हैं मार्ग दर्शन करे ।
हे प्रभु जो इन्सान सच्चे होते हैं
वही तेरे साधक बच्चे होते हैं
ना उन्हें अपने सुख दुःख या मनकी परवाह भी
नसों तक में नासूर बहता पर ना करे वो आह ही
उनका जीवन तेरी मुश्किलों से दिया हुआ
प्रारब्ध के धागों में उनका हर हाल सिला हुआ
फूल की आशा में रुके हुओ को भले कांटे चुभ जाये
सारे कठिन रास्तो को पार करके भी उनकी मंजिल रुक जाये
दुखो के फलो से भरे उनके वृक्ष जैसे कंधे मुडजाये
स्तुति के पात्र वो चाहे बेचारे दुनिया की निंदा में जुड़ पाए
आखिरी कदम तक प्रभु की बाट देखते हैं
भक्ति के सहारे जिंदगी की अँधेरी रात झेलते हैं
तब भी कुछ ज्ञान वाले कहेंगे की भक्ति से कभी दुःख नहीं होता
भला राधा मीरा का अक्स भी कृष्ण सा सुख कभी कही खोता
मुट्ठी भर की खुशिया हजारो जन्मो के पुण्यो से ना आ सकी
सालो की पूजा भी साधक की एक अनुराधा को ना भा सकी
भास्कर सा उसका तेज़ कभी कभी तो दुनिया को हरा सकता था
छोटे छोटे दीपकों से तो उसका साया भी ना डरा करता था
पर प्रकृति ने एक भक्त को मजबूर कर दिया था
किस्मत ने एक अधूरे खाली कल को आज भर दिया था
जिसकी जिम्मेदारी ने आंसुओ की एक नयी भाव झील चला दी
अपना एक स्वार्थ भी बह गया पर परमार्थ की कई नाव सी बहा दी
परम प्रभु आराधना का ये कौन सा आपने दौर बताया हैं
सरल से मुझ साधक को कैसी जटिल उलझन में लाया हैं
क्या मानू कि धर्म की अनूठी परिभाषा लिखने की ये कोई नीव हैं
भगवान बनकर निस्वार्थ सबकी मदद करने वाला " वीरेन " भी जीव हैं
--
हे प्रभु जो इन्सान सच्चे होते हैं
वही तेरे साधक बच्चे होते हैं
ना उन्हें अपने सुख दुःख या मन
नसों तक में नासूर बहता पर ना करे वो आह ही
उनका जीवन तेरी मुश्किलों से दिया हुआ
प्रारब्ध के धागों में उनका हर हाल सिला हुआ
फूल की आशा में रुके हुओ को भले कांटे चुभ जाये
सारे कठिन रास्तो को पार करके भी उनकी मंजिल रुक जाये
दुखो के फलो से भरे उनके वृक्ष जैसे कंधे मुड
स्तुति के पात्र वो चाहे बेचारे दुनिया की निंदा में जुड़ पाए
आखिरी कदम तक प्रभु की बाट देखते हैं
भक्ति के सहारे जिंदगी की अँधेरी रात झेलते हैं
तब भी कुछ ज्ञान वाले कहेंगे की भक्ति से कभी दुःख नहीं होता
भला राधा मीरा का अक्स भी कृष्ण सा सुख कभी कही खोता
मुट्ठी भर की खुशिया हजारो जन्मो के पुण्यो से ना आ सकी
सालो की पूजा भी साधक की एक अनुराधा को ना भा सकी
भास्कर सा उसका तेज़ कभी कभी तो दुनिया को हरा सकता था
छोटे छोटे दीपकों से तो उसका साया भी ना डरा करता था
पर प्रकृति ने एक भक्त को मजबूर कर दिया था
किस्मत ने एक अधूरे खाली कल को आज भर दिया था
जिसकी जिम्मेदारी ने आंसुओ की एक नयी भाव झील चला दी
अपना एक स्वार्थ भी बह गया पर परमार्थ की कई नाव सी बहा दी
परम प्रभु आराधना का ये कौन सा आपने दौर बताया हैं
सरल से मुझ साधक को कैसी जटिल उलझन में लाया हैं
क्या मानू कि धर्म की अनूठी परिभाषा लिखने की ये कोई नीव हैं
भगवान बनकर निस्वार्थ सबकी मदद करने वाला " वीरेन " भी जीव हैं
--
शनिवार, 15 जनवरी 2011
भगवान के चौदह अंशावतारो और दस पूर्ण अवतारों पर कविता
भगवान के चौदह अंशावतारो और दस पूर्ण अवतारों पर ये कविता लिखी हैं . आशा हैं धार्मिक लोगो को पसंद आएगी .
आत्मा जैसे परमात्मा की भक्ति को तरसती हैं
संतो की मेघो रुपी करुना दुनिया पर बरसती हैं
प्रभु तेरे हर अवतार को प्रार्थना करनी हैं
रोम रोम में तुझे शरण कि धारणा भरनी हैं .
सनकादि ऋषियो मुझे अपने जैसा बच्चा ही बना दो
भक्ति ज्ञान आपका भागवत स्वरुप मुझे भी जना दो
व्यास के सारे पुराणो में आई वो सारी धर्म ज्ञान कि बाते
पुत्र जिनके शुकदेव रोशन कर गए परीक्षित की शापित राते
ब्रह्मा जी के मानस पुत्र होकर भी दासी के भाग्य में पुत्र का सौभाग्य दिया
देवर्षि नारद बनकर आपने ये अनोखा निष्कपट भक्ति सूत्र लिख दिया
देवहूति और कर्दम के दाम्पत्य को तुमने धन्य कर दिया
नौ बहनों के एक भाई बनकर कपिल मुनि का सांख्य रच दिया
अनोखे पति पत्नी बनकर सुयज्ञ और लक्ष्मी का जोड़ा पाया
इतिहास जिसका रहस्य बस हमेशा शास्त्रों में खोजता पाया
सती अनसूया और अत्री मुनि के त्रिदेव स्वरुप दत्तात्रेय तुम बनकर आये
अपने अगले अवतार में जिसे मारना था उस हैहेयिवंश को सहस्त्रबाहु बनाये
नर नारायण का रूप धरकर धर्म मूर्ति को तप का फल दिया था
उर्वशी को जंघा से जन्म देकर इंद्र को शर्मिंदा निष्फल किया था
फिर इन्ही धर्म मूर्ति को एक और दूसरा जन्म आपने दे दिया था
और इन्ही पृश्नी और सुतपा का बेटा बन अपना नाम पृश्नी गर्भा ले लिया था
दुष्ट वेन की भुजा से फिर आपने पृथु बनकर संतो का कल्याण किया
एक दयावान राजा बनकर पृथ्वी को बेटी का सम्मान दिया
सौ सौ बेटो के पिता ऋषभदेव बने और बेटे जड़भरत को तिलक कराया
उस परम ज्ञानी ने ही तो अगले जन्म में रहूगन को मुक्त कराया
सागर मंथन से आरोग्य के प्रतीक वो पहले चिकित्सा प्रधान
परम औषधि को खुद लेकर प्रगटे धन्वन्तरी भगवान
अमृत वितरण पर सबको मोहित करने मोहिनी बन आये
असुर राहू के शीश को काटकर केतु दो रूप बनाये
हंस और हयग्रीव अवतार बनकर तुम बस उद्धार करने आते हो
सब रूप तुम्हारे यही तो तो समय समय पर जाता जाते हो
ये चौदह अंशावतार पूरे हुए हम इनको शीश नवाते हैं
अब उस निर्गुण भगवान के पूर्ण दस अवतारों की गाथाये गुणों में लाते हैं
इस कल्प की स्थापना करने को मनु जी को चुन लिया
मछली का रूप धरकर जल में खड़े खड़े जैसे प्रलय का युग जिया
फिर मंदराचल अपनी पीठ पर रखकर कछुए ने समुन्द्र मंथन करवा दिया
माता लक्ष्मी को अपनी जान अपनाया और देवो को कल्प वृक्ष दिलवा दिया
वराह बनकर पृथ्वी को जल से निकाल कर ले आये
इसी द्वंद्व युद्ध में हिरण्याक्ष के प्राण पखेरू आपने उडाये
पैंतीस हज़ार सालो की हिरन्यकश्यप की तपस्या पर बच्चा प्रह्लाद भारी पड़ा
अनोखे मौत के वरदान की शर्ते पूरी करने नरसिंह जैसा भयंकर रूप अनाड़ी बड़ा
नन्हे नन्हे पैरो वाले वामन को तीन कदम भूमि भी ना मिली
शुक्राचार्य के त्यागे राजा बलि को बस पाताल की शरण मिली
जमदग्नि का वो उग्र बेटा परशुराम जिसने ब्रह्माण्ड को हिला डाला
इक्कीस बार क्षत्रियो को समेटा और सहस्त्रबाहु को मिटा डाला
फिर वो परम भक्त भरत का भाई राजा राम बनकर आ गया
माता सीता के अपहर्ता रावन को मिटाने सगुण राम छा गया
वो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिसे शिवजी ने पूजा था
लक्ष्मण और हनुमान के लिए वैसा इष्टदेव ना दूजा था
फिर वो मेरा अपना गोपियो वाला अर्जुन का सखा कृष्ण आया
जिसकी बस अभी याद आते आते दिल भर आया
यदुवंश और कुरुवंश को नष्ट करने जिसने महाभारत रचाया
परम अवतारों का वो शिरोमणि इतिहास में जिसने विश्वरूप दिखाया
जरा जन्म और व्याधि को जिसने बुध बनकर समझ लिया
उस परम संत ने अपने असली रूप को झटक लिया
अब कलयुग में परम तेजस्वी जो भयंकर युद्धों का नज़ारा रचेगा
और फिर वो कल्कि माता वैष्णोदेवी के जीवन का सहारा बनेगा
फिर भी हरि तो अनंत हैं और अनंत रहेगा .
"वीरेन " को आदेश हैं तो बस लिखता रहेगा
कोई भी गलती हो तो कृपया मार्गदर्शन करे .
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
Email:virender.zte@gmail.com
Blog:saralkumar.blogspot.com
आत्मा जैसे परमात्मा की भक्ति को तरसती हैं
संतो की मेघो रुपी करुना दुनिया पर बरसती हैं
प्रभु तेरे हर अवतार को प्रार्थना करनी हैं
रोम रोम में तुझे शरण कि धारणा भरनी हैं .
सनकादि ऋषियो मुझे अपने जैसा बच्चा ही बना दो
भक्ति ज्ञान आपका भागवत स्वरुप मुझे भी जना दो
व्यास के सारे पुराणो में आई वो सारी धर्म ज्ञान कि बाते
पुत्र जिनके शुकदेव रोशन कर गए परीक्षित की शापित राते
ब्रह्मा जी के मानस पुत्र होकर भी दासी के भाग्य में पुत्र का सौभाग्य दिया
देवर्षि नारद बनकर आपने ये अनोखा निष्कपट भक्ति सूत्र लिख दिया
देवहूति और कर्दम के दाम्पत्य को तुमने धन्य कर दिया
नौ बहनों के एक भाई बनकर कपिल मुनि का सांख्य रच दिया
अनोखे पति पत्नी बनकर सुयज्ञ और लक्ष्मी का जोड़ा पाया
इतिहास जिसका रहस्य बस हमेशा शास्त्रों में खोजता पाया
सती अनसूया और अत्री मुनि के त्रिदेव स्वरुप दत्तात्रेय तुम बनकर आये
अपने अगले अवतार में जिसे मारना था उस हैहेयिवंश को सहस्त्रबाहु बनाये
नर नारायण का रूप धरकर धर्म मूर्ति को तप का फल दिया था
उर्वशी को जंघा से जन्म देकर इंद्र को शर्मिंदा निष्फल किया था
फिर इन्ही धर्म मूर्ति को एक और दूसरा जन्म आपने दे दिया था
और इन्ही पृश्नी और सुतपा का बेटा बन अपना नाम पृश्नी गर्भा ले लिया था
दुष्ट वेन की भुजा से फिर आपने पृथु बनकर संतो का कल्याण किया
एक दयावान राजा बनकर पृथ्वी को बेटी का सम्मान दिया
सौ सौ बेटो के पिता ऋषभदेव बने और बेटे जड़भरत को तिलक कराया
उस परम ज्ञानी ने ही तो अगले जन्म में रहूगन को मुक्त कराया
सागर मंथन से आरोग्य के प्रतीक वो पहले चिकित्सा प्रधान
परम औषधि को खुद लेकर प्रगटे धन्वन्तरी भगवान
अमृत वितरण पर सबको मोहित करने मोहिनी बन आये
असुर राहू के शीश को काटकर केतु दो रूप बनाये
हंस और हयग्रीव अवतार बनकर तुम बस उद्धार करने आते हो
सब रूप तुम्हारे यही तो तो समय समय पर जाता जाते हो
ये चौदह अंशावतार पूरे हुए हम इनको शीश नवाते हैं
अब उस निर्गुण भगवान के पूर्ण दस अवतारों की गाथाये गुणों में लाते हैं
इस कल्प की स्थापना करने को मनु जी को चुन लिया
मछली का रूप धरकर जल में खड़े खड़े जैसे प्रलय का युग जिया
फिर मंदराचल अपनी पीठ पर रखकर कछुए ने समुन्द्र मंथन करवा दिया
माता लक्ष्मी को अपनी जान अपनाया और देवो को कल्प वृक्ष दिलवा दिया
वराह बनकर पृथ्वी को जल से निकाल कर ले आये
इसी द्वंद्व युद्ध में हिरण्याक्ष के प्राण पखेरू आपने उडाये
पैंतीस हज़ार सालो की हिरन्यकश्यप की तपस्या पर बच्चा प्रह्लाद भारी पड़ा
अनोखे मौत के वरदान की शर्ते पूरी करने नरसिंह जैसा भयंकर रूप अनाड़ी बड़ा
नन्हे नन्हे पैरो वाले वामन को तीन कदम भूमि भी ना मिली
शुक्राचार्य के त्यागे राजा बलि को बस पाताल की शरण मिली
जमदग्नि का वो उग्र बेटा परशुराम जिसने ब्रह्माण्ड को हिला डाला
इक्कीस बार क्षत्रियो को समेटा और सहस्त्रबाहु को मिटा डाला
फिर वो परम भक्त भरत का भाई राजा राम बनकर आ गया
माता सीता के अपहर्ता रावन को मिटाने सगुण राम छा गया
वो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिसे शिवजी ने पूजा था
लक्ष्मण और हनुमान के लिए वैसा इष्टदेव ना दूजा था
फिर वो मेरा अपना गोपियो वाला अर्जुन का सखा कृष्ण आया
जिसकी बस अभी याद आते आते दिल भर आया
यदुवंश और कुरुवंश को नष्ट करने जिसने महाभारत रचाया
परम अवतारों का वो शिरोमणि इतिहास में जिसने विश्वरूप दिखाया
जरा जन्म और व्याधि को जिसने बुध बनकर समझ लिया
उस परम संत ने अपने असली रूप को झटक लिया
अब कलयुग में परम तेजस्वी जो भयंकर युद्धों का नज़ारा रचेगा
और फिर वो कल्कि माता वैष्णोदेवी के जीवन का सहारा बनेगा
फिर भी हरि तो अनंत हैं और अनंत रहेगा .
"वीरेन " को आदेश हैं तो बस लिखता रहेगा
कोई भी गलती हो तो कृपया मार्गदर्शन करे .
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!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
Email:virender.zte@gmail.com
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मंगलवार, 11 जनवरी 2011
अध्यात्म को समर्पित एक और कविता
यह कविता मेरे एक आध्यत्मिक दोस्त ने भेजी थी पहले पैरा का थीम उसका हैं जो वैसे मैंने चेंज भी कर दिया . दुसरे पैरे से मेरे भाव हैं .
भगवान् को आने के लिए माहौल दिव्य पाया था
दर्द उनका अपना नहीं, भक्तो के हित वो जमीन पर आया था
कोई समझ ना सका जिम्मेदारी कितनी भयानक मिली थी
कीड़े से लेकर इंद्र तक की किरणें भरी हुई पड़ी थी
किस किस की भावनाएं सुनी होंगी, ये तो गिना नहीं जा सकता
भगवान् के सिवा किसी और से इतना सहा नहीं जा सकता
भगवान् सबकी सुनते हैं, भगवान् की कौन सुने प्यारे !
परमात्मा उन्हें सुनने योग्य स्वभाव मुझमे उतारें
मै सोचता था कि परमात्मा हो सकता हूँ
सबमे होकर उनका दुखड़ा रो सकता हूँ
मान्यताओ से पार सब अहम् खो सकता हूँ
करुना से सबके पाप जो धो सकता हू
पर कैसे कैसे जीव कैसी कैसी कामनाये मांगने लगे
तपस्वियों के हिस्से के सुख भी बगले झाँकने लगे
बुरे लोगो की चाँदी हो चली और अच्छो को आत्मघात करना पड़ा
उन्हें तो धर्म हज़म होना नहीं था पीने को विष मुझे सुकरात बनना पड़ा
जी भर आता हैं कि क्या मेरे साथ ऐसा होना ठीक था
सिर्फ सच्ची दुआ थी पर लगा ऐसे जैसे मांग रहा भीख था
अपनी जिंदगी जिनकी विवाद ऐसा भी हर शख्स दे रहा सीख था
ऊपर से उलटी पुलटी सबकी अपेक्षाओं से मेरा मन गया झीख था
पर फिर आखिरी कदम पर गोपियों पर घनश्याम गया रीझ था
इसीलिए अब सब कुछ ठीक हो जाने के "वीरेन" एकदम करीब था
सब हालत प्रभु के दिए हुए उसने बस अपनी चेतना मिला दी
नयी ऐसी उसकी बातो ने तो धर्म की भी जड़े हिला दी
सारे शास्त्रों में लिखी बातो से जोड़ जोड़ कुछ नयी बना दी
गूंगा बोले बहरा सुन ले पूजा की ऐसी विधिया बता दी
मंजिल जिनकी बस परमात्मा ऐसी गाड़िया चला दी
हर किसी को बैकुंठ भेजा यम की गलिया खाली करा दी
मेरा अब श्री हरि ही जाने क्योंकि अब बस उनका ही सहारा हैं
अनुराधा से कृष्णानुज मिलना तय क्योंकि "वीरेन " कुंवारा हैं
-- मै सोचता था कि परमात्मा हो सकता हूँ
सबमे होकर उनका दुखड़ा रो सकता हूँ
मान्यताओ से पार सब अहम् खो सकता हूँ
करुना से सबके पाप जो धो सकता हू
पर कैसे कैसे जीव कैसी कैसी कामनाये मांगने लगे
तपस्वियों के हिस्से के सुख भी बगले झाँकने लगे
बुरे लोगो की चाँदी हो चली और अच्छो को आत्मघात करना पड़ा
उन्हें तो धर्म हज़म होना नहीं था पीने को विष मुझे सुकरात बनना पड़ा
जी भर आता हैं कि क्या मेरे साथ ऐसा होना ठीक था
सिर्फ सच्ची दुआ थी पर लगा ऐसे जैसे मांग रहा भीख था
अपनी जिंदगी जिनकी विवाद ऐसा भी हर शख्स दे रहा सीख था
ऊपर से उलटी पुलटी सबकी अपेक्षाओं से मेरा मन गया झीख था
पर फिर आखिरी कदम पर गोपियों पर घनश्याम गया रीझ था
इसीलिए अब सब कुछ ठीक हो जाने के "वीरेन" एकदम करीब था
सब हालत प्रभु के दिए हुए उसने बस अपनी चेतना मिला दी
नयी ऐसी उसकी बातो ने तो धर्म की भी जड़े हिला दी
सारे शास्त्रों में लिखी बातो से जोड़ जोड़ कुछ नयी बना दी
गूंगा बोले बहरा सुन ले पूजा की ऐसी विधिया बता दी
मंजिल जिनकी बस परमात्मा ऐसी गाड़िया चला दी
हर किसी को बैकुंठ भेजा यम की गलिया खाली करा दी
मेरा अब श्री हरि ही जाने क्योंकि अब बस उनका ही सहारा हैं
अनुराधा से कृष्णानुज मिलना तय क्योंकि "वीरेन " कुंवारा हैं
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
Email:virender.zte@gmail.com
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शनिवार, 8 जनवरी 2011
एकतरफा प्यार को समर्पित एक कविता
जब आपको कई बार लगे कि कही मेरा प्यार एक तरफ़ा तो नहीं और क्यों सारी जिंदगी भर का दुःख मोल ले लिए और एक पल कि ख़ुशी नहीं . हालाँकि हैं तो क्रिएटिव एंगल से लिखी हुई नहीं तो फ्रस्ट्रेशन बहुत रुला देती हैं । वे भाव बहुत पुराने हैं तो कुछ असंगत से भी लग सकते हैं । पर कुल मिलाकर एक एक तरफ़ा प्यार का थीम मैंने इसमें डाला हैं अपनी कल्पना के आधार पर
हे प्रभु ! मुझसे ना अब तेरा दर्द सहा जाता हैं
स्त्रिओ के झूठे भावो में एक मर्द कराहता हैं
सिर्फ और सिर्फ ईश्वर तेरे संयोगो कि बात मानी थी
पुनर्जन्म पिता का उसे लेकर आया जो अनजानी थी
मन कहता था कि उसके शरीर में बसी आत्मा दीवानी थी
हार कर उसे अपना भी लिया पर उसकी अपनी कहानी थी
उसे चीज़े अपने ढंग से चाही थी
मेरी बातो को आदर देने कि जिसमे मनाही थी
इसीलिए मुझे बातो का ढंग बदलना पड़ा
बेशर्मो से भी बुरे कर्मो में मन रगड़ना पड़ा
ना कर सका कोई फरियाद क्योंकि एक साधक का वादा था
आत्महत्या की नौबत पर उफ़ तक करना उसको लगता ज्यादा था
मेरा अपना ना परिवार ना कोई प्राणों से प्यारा था
मैने सबको खोया पर उसे मनाना ख़ानदान सारा था
मुट्ठी भर मेरी जरूरते पर उसे कभी समझ नहीं आई थी
उससे जब कुछ माँगा उसने परिवार की दिक्कते गिनाई थी
होना भी चाहिए था क्योंकि मेरे प्यार से उसे क्या लेना था
सबसे बुरा होकर भी पता नहीं गारंटी का कौन सा सबूत देना था
हमेशा सोचता रहता था की कुछ चमत्कार होकर रहेगा
उसकी तरफ से कभी तो समर्पण का एक झरना बहेगा
पर सिर्फ मेरे लिए ही उससे सच ना बोला जा रहा था
कमजोर हो चुके बंधन से दामन ना खोला जा रहा था
वो ऐसी ही स्पष्ट जरूरतों वाली लड़की हुआ करती थी
हमेशा अपनी परेशानी ही उसको दिल से छुआ करती थी
मेरी तरफ उसे लगता था की चीज़े बहुत आसान हैं
घडी घडी उसके साथ को तरसता क्या "वीरेन" भगवान हैं
हे प्रभु ! मुझसे ना अब तेरा दर्द सहा जाता हैं
स्त्रिओ के झूठे भावो में एक मर्द कराहता हैं
सिर्फ और सिर्फ ईश्वर तेरे संयोगो कि बात मानी थी
पुनर्जन्म पिता का उसे लेकर आया जो अनजानी थी
मन कहता था कि उसके शरीर में बसी आत्मा दीवानी थी
हार कर उसे अपना भी लिया पर उसकी अपनी कहानी थी
उसे चीज़े अपने ढंग से चाही थी
मेरी बातो को आदर देने कि जिसमे मनाही थी
इसीलिए मुझे बातो का ढंग बदलना पड़ा
बेशर्मो से भी बुरे कर्मो में मन रगड़ना पड़ा
ना कर सका कोई फरियाद क्योंकि एक साधक का वादा था
आत्महत्या की नौबत पर उफ़ तक करना उसको लगता ज्यादा था
मेरा अपना ना परिवार ना कोई प्राणों से प्यारा था
मैने सबको खोया पर उसे मनाना ख़ानदान सारा था
मुट्ठी भर मेरी जरूरते पर उसे कभी समझ नहीं आई थी
उससे जब कुछ माँगा उसने परिवार की दिक्कते गिनाई थी
होना भी चाहिए था क्योंकि मेरे प्यार से उसे क्या लेना था
सबसे बुरा होकर भी पता नहीं गारंटी का कौन सा सबूत देना था
हमेशा सोचता रहता था की कुछ चमत्कार होकर रहेगा
उसकी तरफ से कभी तो समर्पण का एक झरना बहेगा
पर सिर्फ मेरे लिए ही उससे सच ना बोला जा रहा था
कमजोर हो चुके बंधन से दामन ना खोला जा रहा था
वो ऐसी ही स्पष्ट जरूरतों वाली लड़की हुआ करती थी
हमेशा अपनी परेशानी ही उसको दिल से छुआ करती थी
मेरी तरफ उसे लगता था की चीज़े बहुत आसान हैं
घडी घडी उसके साथ को तरसता क्या "वीरेन" भगवान हैं
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह लोग भक्ति के संगीत में डूबने का नाटक करते हुए उस भगवान् को बेवक़ूफ़ बनाते हैं जो हम सबसे ज्यादा चालाक हैं और...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...