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बुधवार, 24 मार्च 2010

जीवन का उद्देश्य और दुनिया में उलझे हम लोग

कभी कभी लगता हैं कि हम इतना जीवन जी लेते हैं पर कोई सार नहींऔर सुबह से शाम तक बस कम में लगे रहो का नारा लेकर मशीन बने रहते हैंइसमें सबसे बुरा हाल हम कम्पनी कर्मचारिओं का होता हैंवहां सारी चीज़ें इतनी जटिल होती हैं कि एक बार तो मन करता हैं सारा कुछ छोड़ कर भाग लो यहाँआखिरी ऐसे हम काम करते हैं जैसे शापित आत्माएं

हमारा बोरिंग काम सुबह से शुरू होता हैं जैसे
सुबह सुबह मोबाइल में अलार्म लगाकर सो जाते हैं , हमारा सारा काम तो हमारा मोबाइल पर ही शुरू होता हैंपारंपरिक अलार्म तो अब शायद ख़त्म ही हो गए हैंनहीं तो जब हम पढ़ते तो हमें पता था कि ये एक सौ पंतीस रुपये की चीज़ पूरे दिन का टाइम टेबल तय करती थीऔर आजकल बस आस्था चैनल पर बाबा रामदेव का योग और फिर एक गुरु जी या किसी दुसरे संत की पूरे दिन के लिए अध्यात्मिक डोज़ लेकर हमारे बाथरूम कम गैराज में घुस लेते हैं जहाँ पर तू निकल मुझे जाना हैं की तर्ज़ पर एक घंटा अति संवेदनशील हो जाता हैंपांच मिनट की देरी हुई नहीं की ऑफिस बस लेट होते ही पारंपरिक तरीको से आप एक घंटे लेट हो जाते हैं

अगर
बस पकड़ ली तो क्या आगे एक बंदा फिर बस रुकवा देता हैंऔर हमें अफ़सोस होता हैं की इनके लिए इतनी देर और मेरी लिए पांच मिनट भी नहींजद्दोजहद के बाद सीट मिलते ही हेड फोन पर गाना सुनना और ट्रेफिक की भीड़ में कोई गाड़ी ठुक जाने पर मज़े लेना और अपनी ठुक जाये तो राजी नामे को दौर

जैसे
तैसे कम्पनी पहुंचना और बस सारा दिन कम में उलझे रहना या बॉस की डांट खाते रहना , बड़ाई तो दुरलभ सी हो जाती हैंबस पांच बजते ही सारा ताम झाम समेटनाघर आकर खाना खाना और टी वी देखनापैसे लेकर दिखाई जा रही खबरों को लेकर उदास होना और फिर कोई कोमेडी या होलीवूड की फिल्म देखकर संतोष करनाकुछ काम हो तो बाज़ार का एक राउण्ड या किसी दोस्त के यहाँ पेशीबस दस ग्यारह बजे सो जाना

इतना घिसा पिटा दिन का काम फिर भी पता नहीं जी रहे हैंकोई आनंद नहीं फिर भी लगे हुए हैंजैसे सारी सोच को लकवा मार गया हैंकोई कहता हैं कि उद्देश्य बनाओ तब थोडा ठीक रहेगाअब हर व्यक्ति के उद्देश्य को भी
लेकर विवाद हैं

धार्मिक ग्रन्थ कहते हैं कि ईश्वर को पाना उद्देश्य होता हैं , इसी लिए सारा संत भक्ति से जुड़े कामो को बढ़ाने के लिए कहते हैंपर ये इतना लम्बा सफ़र और एक तरफ़ा रास्ता लगता हैं कि यार फिर तो कुछ भी जरुरी नहीं हैंक्यों हम खामख्वाह टाइम ख़राब कर रहे हैं दुनिया में

और
फिर कैरिएर बीवी बच्चे समाज , इतना बड़ा माया का जाल कुछ भी जंजाल के अलावा लगता नहींमहंगाई से लोग मर रहे हैं पर शीला दीक्षित कि स्वघोषित महंगाई पलायन बयानबाजी से भी मन कुढ़ सा जाता हैंये तो थी मेरी दिनचर्या आपकी इससे काफी अच्छी हो सकती हैंआप भी अपनी बात शेयर करें

मेरा तो आखिर में बस दिमाग सोचना बंद कर देता हैं और बस एक प्रार्थना उभरती कि हे भगवान् तू जहाँ भी हैं बस इसी पल एक बार के लिए जा और हमें मुक्त करके ये रहस्य बता कि आखिर ये सब दुनियादारी क्या हैं .

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...