सानिया कि शादी पर बवाल
हमारा देश भी इतने मज़ेदार बुद्धू लोगो से भरा हैं कि जो खबर हो उसकी तो मरम्मत करते ही हैं पर साथ में बे जरुरी बातो से पूरे माहौल को हम टी वी सीरियल बना देते हैं । एकता कपूर ने हमारी सही नस पकड़ी और बेमतलब के शादी के झमेले के विकल्प हमें बना कर दिए । सानिया की शादी पर मचे बवाल पर गंभीरता कम और कोमेडी ज्यादा दिख रही हैं ।
कल एक न्यूज़ चैनल पर कुछ छुटभैया नेता एक बैनर लेकर कैमरा के सामने चिंता दिखा रहा था । बैनर पर लिखा था " सानिया मिर्ज़ा को बधाई क्योंकी दाऊद और कसाब उसके भाई " । खाली बैठे कार्यकर्ताओ को जैसे सानिया ने रोज़गार दीया । वैसे भी इनको कौन बताये की सानिया एक पेशेवर खिलाडी हैं इनका देश की शान से कोई मतलब नहीं होता हैं । इनको तो कोई भारत की नागरिकता से भी मतलब नहीं होता हैं ।
और भी शर्मनाक हैं की एक राष्ट्रिय पार्टी को बोलना पड़ा की हमें सानिया की शादी से कोई आपत्ति नहीं हैं । असल में बेचारे प्रवक्ता क्या करे मीडिया वाले और उनके छोटे नासमझ कार्यकर्ता बिन बात के मुद्दे उठा लेते हैं ।देश में और भी समस्याए हैं पर हम बेवक़ूफ़ शोएब मालिक की पूर्व पत्नी के पिता और पहली शादी के मौलवी का एक्सक्लूसिव भाषण सुन रहे हैं ।
हमें क्या ज्यादा जरुरत हैं दूसरो के व्यक्तिगत कामो में फंसने की । क्या हम अपनी शादी में मोहल्ले की राय लेते हैं । अपने ही परिवार के सारे लोग भी संतुष्ट नहीं होते हैं । हमने करना धरना कुछ नहीं , बस तीन चार चाय पी और सानिया मिर्ज़ा को पीकर कोसना हैं की हम क्या मर गए थे ( वैसे ये जायज वजह हो सकती हैं विरोध की ) ।अगर सच में विदेशो में शादी बंद होनी चाहिए तो फिर सोनिया गाँधी के खिलाफ भी तो कोई मोर्चा निकालिए आपके दिन अपने आप सलाखों में कटेंगे।
ऐसे ही एक ड्रामा पिछले साल हरयाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के बेटे श्री चंद्रमोहन ( चाँद मोहम्मद कहू , कुछ समझ नहीं आ रहा ) और सीमा ( फिजा ) की फर्जी शादी , फर्जी तलाक और फिर फर्जी सुलह फिर फर्जी अपहरण , मतलब सब फर्जी और हमारी फर्जी मीडिया ये सब दिखाती रही .
एक खबर /निर्णय / कानून नपुन्सको के लिए
पंजाब और हरियाणा में अब से नपुंसक के सारे नियम और अधिकार वही लागु होंगे जो पुरुषो पर होंगे । ज्यादा कुछ लिखने के लिए इसमें हैं ही नहीं ।
खेल मंत्री का बयान
हमारे खेल मंत्री ( पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ) श्री गिल ने कहा हैं की आई पी एल का देश भक्ति से कोई सबंध नहीं हैं ।उन्हें कौन समझाए की कानून से हिसाब से तो 1983 के विश्व कप के बाद से क्रिकेट का देश से ही मतलब ही नहीं हैं क्योंकि सरकार ने इसे एक स्वायत संस्था बना दिया था मतलब एक कम्पनी की तरह काम करने वाली संस्था और हम बेवक़ूफ़ बेमतलब इसको राष्ट्रिय अस्मिता मानकार इसके लिए समय वेस्ट करते हैं ।
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शनिवार, 3 अप्रैल 2010
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