यह कविता एक सच्चे अनुभव पर आधारित हैं
ये एक बहुत ही गहरे अनुभव के बाद लिखी हैं। असल में मैं इस दर्द को सहन नहीं कर पाया और टूटकर ये कविता लिख पाया . बस शुरुवात कि दो पंक्तिया मैंने एक ब्लोगेर अम्बरीश जी से ली हैं । आगे की सारी पंक्तिया ( नीले रंग में ) मेरी खुद की हैं ।
आज मेरे सामने खुशिया कम ज्यादा गम हैं
फिर भी लगता हैं मेरी आँखों में आंसू कम हैं
मेरी छोटी सी गलती कि इतनी बड़ी सजा मिली
उसे प्यार करने पर वो मुझसे खफा मिली
जिंदगी में मुझे उससे कुछ भी तो प्यारा नहीं
पर मेरा सच्चा प्यार उसने स्वीकारा नहीं
मेरे इस एकतरफा प्यार पर मैं टूट गया हूँ
ईश्वर भी कहता हैं "वीरेन मैं तुझसे रूठ गया हूँ "
मेरी जिंदगी का वो सबसे बड़ा सपना हैं
चाहतो में उसकी अब मुझे मर मिटना हैं
मुझे क्या जरुरत थी अपने को यूँ फंसाने की
उसकी ख़ुशी के लिए अपने गम दबाने की
उसकी आत्मा से उठी एक सच्ची दुआ थी
मेरे मन को खींच लेने वाली वो एक हवा थी
मेरी सारी भावनाओ को छीन कर ले गयी
सारे दर्द और और आहे वो मुझे दे गयी
दर्द के इस मरुस्थल में जैसे तैसे आगे सरकता हूँ
अब मौत मुझे आती नहीं और मैं तड़पता हूँ
मैं सिर्फ इतनी पंक्तियाँ ही उसको समर्पित कर सकता हूँ ।
अभी तुमको मेरी जरुरत नहीं हैं बहुत चाहने वाले मिल जायेगे
अभी रूप का एक सागर हो तुम कमल जितने चाहोगी खिल जायेंगे
दर्पण तुम्हे जब डराने लगी जवानी भी दमन छुड़ाने लगे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
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