
अनुराधा पोडवाल के स्वर में ये भजन बहुत ही प्रासंगिक है जो वैष्णव या शैव है और जो अपनी मृत्यु के सिर्फ़ ईश्वर के वातावरण में ही प्राण त्याग करना चाहते है। गीतकार के ये शब्द सहज ही मन को छू जाते है और दीर्घकाल के लिए मन में भक्ति और वैराग्य को बढ़ा देते हैं ।
इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले ,
गोविन्द नाम लेकर फ़िर प्राण तन से निकले ,
श्री गंगा जी का तट हो यमुना का वंशी वट हो ,
मेरा सांवरा निकट हो जब प्राण तन से निकले
श्री वृन्दावन का स्थल हो मेरे मुख में तुलसी दल हो ,
विष्णु चरण का जल हो जब प्राण तन से निकले
जब कंठ प्राण आवे कोई रोग न सतावे ,
यम दर्श न दिखावे जब प्राण तन से निकले
सुधि होवे नही तन ki taiyari हो गमन की ,
लकड़ी हो ब्रज के वन की जब प्राण तन से निकले
ये नेक सी अरज है मानो तो क्या हरज है ,
कुछ आपका फर्ज़ है जब प्राण तन से निकले
इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले ........................