गुरुवार, 28 जनवरी 2010
बयानबाजी cum गुंडागर्दी (व्यंग्य )
फिर कृषि मंत्री अदद गंवार कह रहे हैं की सब्जिओं के दाम बढ़ सकते हैं । मतलब इसका की वो कालाबाजारी वालों से मिले हुए हैं क्या जो उन्हें पता हैं की सब्जियां महँगी होंगी । समझ नहीं आता की वो पक्ष में हैं या विपक्ष में ।
युवराज रोउल घांदी कह रहे हैं कि परिवार वाद ने देश को बहुत नुकसान पहुँचाया हैं और अब देश की राजनीति में परिवारवाद की कोई जगह नहीं हैं और अपने स्वर्गीय पिता के बयान को लेकर भावुक हो जाते हैं कि ऊपर से सौ रुपये चलते हैं तो गरीब तक सिर्फ एक रूपया पहुँचता हैं ,
अब सरल को कौन बताये की किस परिवार ने पचास साल देश की "सेवा " की और गरीब तक एक रूपया पहुँचाने की जिम्मेदारी उस सरकार या पार्टी की हैं जो शुरू से सत्ता में रही ।
भारतीय जनता पार्टी बयान दे रही हैं की उनकी पार्टी में एकता हैं ।
ये बयान सरल को सच्चा लग रहा हैं क्योंकि तभी तो एकता कपूर के टी वी सीरियल की तरह धमाधम मची हैं एक दुसरे की बुरे करने की ।
ब्लॉग लिखते लिखते अचानक इन्टरनेट काम करना बंद कर जाता हैं , सरल देखता हैं की एक ट्रक टेलीफोन के खम्बे से टकरा गया हैं और पोस्ट बंद कर......................................
अब ट्रक वाले और सरल की बीच बयानबाजी चल रही हैं .
आज मैं बेचैन हूँ ( फिल्म संतोष , गायक मोहिंदर कपूर )
आज मैं बेचैन हूँ आज मैं बेचैन हूँ
यार मैं बेचैन हूँ आज मैं बेचैन हूँ
ये महज तनहाइयाँ दर्द की अंगडाईयां
मौत की परछायिया यार मैं बेचैन हूँ ..............
एक नफ में माता एक गोरी का शबाब
एक मेरे दिन ख़राब ,यार मैं बेचैन हूँ ............
ये महल ये तख्तो ताज ये शरीफों के रवाब
हैं कहाँ बंदा नवाज , यार मैं बेचैन हूँ ........
गीत गाना हैं मना मुस्कराना हैं मना
सर उठाना हैं मना , यार मैं बेचैन हूँ ...........
(फिर सभी गाते हैं )
एक जिंदगी नहीं जिसको जी रहे हम
आस कोई भी नहीं घुट के रहा गया हैं दम
( फिर मनोज कुमार गाते हैं )
चल रहा हैं कारवां -2
चल रहा हैं नौजवान -2
सो रहे हैं रहनुमा , यार मैं बेचैन हूँ , आज मैं बेचैन हूँ ...................
बुधवार, 27 जनवरी 2010
आज गा लो मुस्करा लो महफिलें सजा लो ( ललकार फिल्म )
आज गा लो मुस्करा लो , महफिले सजा लो
क्या जाने कल कोई साथी छूट जाए
जीवन की डोर बड़ी कमजोर
किसको खबर हैं कहाँ टूट जाए , गा लो मुस्करा लो ...........
टूटा हुआ तारा हैं नदिया की धारा
हैं कौन ऐसा जो लौटा के लाये
हमसे जो बिछड़ा हैं साथी हमारा
हैं कौन ऐसा जो लौटा के लाये
अब ये नज़र रास्ते से हटा लो , गा लो मुस्करा लो ...........
शहीदों का खून हैं वफ़ा की निशानी
ये आंसुओं से धोते नहीं हैं
ये मौत हैं नाज़ करने के काबिल
वीरो की मौत पे रोते नहीं हैं
आज यादों को उनके गले से लगा लो , गा लो मुस्करा लो ................
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा , इंसान की औलाद हैं इन्सान बनेगा ( फिल्म धुल का फूल , 1959 )
तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा इंसान कि ओलाद हैं इंसान बनेगा
अच्छा हैं अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं हैं ,
तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं हैं
जिस इल्म ने इंसानों को तकसीम किया हैं
उस इल्म का तुझ पर कोई इलज़ाम नहीं हैं
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा ........
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती
हमने कहीं भारत कहीं इरान बनाया
जो तोड़ दे हर बंद वो तूफ़ान बनेगा, तू हिन्दू बनेगा ....
नफरत सिखाये जो धर्म तेरा नहीं हैं
इन्सां को रौंदे वो कदम तेरा नहीं हैं
कुरान ना हो जिसमे वो मंदिर नहीं तेरा
गीता ना हो जिसमे वो हरम तेरा नहीं
तू अमन और सुलह का अरमान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा ....
ये दीन के ताजिर ये वतन बेचने वाले
इंसानों की लाशो के कफ़न बेचने वाले
ये महलो में बैठो हुए कातिल ये लुटेरे
कांटो के एवज रूह ऐ चमन बेचने वाले
तू इनके लिए मौत का एलान बनेगा , तू हिन्दू बनेगा .....
या दिल की सुनो दुनियावालो -( अनुपमा फिल्म 1966)
या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं गम को ख़ुशी कैसे कह दूँ जो कहते हैं उनको कहने दो
ये फूल चमन में कैसा खिला माली की नज़र में प्यार नहीं
हँसते हुए क्या क्या देख लिया अब बहते हैं आंसू बहने दो ,
या दिल की ..........
एक ख्वाब ख़ुशी का देखा नहीं देखा जो कभी तो भूल गए
माँगा हुआ तुम कुछ दे ना सके , जो तुमने दिया वो सहने दो ,
या दिल की ...
क्या दर्द किशी का लेगा कोई इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आंसू और बहे अब ऐसे तसल्ली रहने दो ,
या दिल की ....
सोमवार, 25 जनवरी 2010
जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं -प्यासा फिल्म
गुरुदत्त जी जैसे फिल्मकार को उनकी प्रतिभा का हर कोई कायल हैं । सिर्फ उनतालीस साल की उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गयी । प्यासा फिल्म उनके सबसे बेहतरीन फिल्मो में से एक थी । वो इतनी प्रेरक और दर्दभरी फिल्मे छोड़ गए हैं कि लगता हैं कि कोई सत्तर अस्सी साल के अनुभव वाला व्यक्ति होगा गुरुदत्त ।
उन्होंने प्यासा फिल्म 1962 में बनायीं थी । असल में सरकारी मशीनरी सिर्फ नेहरु गुणगान में लगी हुई थी जैसे कि भारत बहुत विकास कर रहा हैं पर गुरुदत्त ने अपनी इस फिल्म में वास्तविकता दिखाई और इसमें उस समय के लिए दो प्रासंगिक गीत बनवाए , जिनमे एक था "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हैं " और दूसरा था " जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं " । इस दुसरे गीत के बोल इस प्रकार हैं
ये कूचे ये नीलाम घर दिलकशी के ये लूटते हुए कारवां जिंदगी के
कहाँ हैं कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो कहाँ हैं
ये दिलफेंक गलियां ये बदनाम बाज़ार गुमनाम राही ये सिक्कों कि झंकार
ये इस्मत के सौदे ये सौदों पे तकरार ,जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर वो .......
ये सदियों से बेखौफ सहमी सी गलिया ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलिया
ये बिकती हुई खोखली रंगरलिया, जिन्हें नाज़ हैं .........................
वो उजाले दरीचो में पायल कि छनछन थकी हारी साँसों पे तबले कि धनधन
वो बेरूह कमरों में खासी कि खनखन , जिन्हें नाज़ हैं .................
ये फूलों के गजरें ये पीकों के छीटें , ये बेबाक नज़रें ये गुस्ताख फिकरे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे , जिन्हें नाज़ हैं .................
यहाँ पीर भी आ चुके हैं जवां भी तनोमंद बेटे भी अब्बा मियां भी
ये बीवी भी हैं और बहन भी हैं माँ भी , जिन्हें नाज़ हैं ...............
मदद चाहती हैं ये हव्वा कि बेटी , यशोदा की हमजिंस राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत जुलेखां की बेटी , जिन्हें नाज़ हैं ..........
ज़रा हिंद के रहबरों को बुलाओ , ये गलिया ये कूचे ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ हैं हिंद पर उनको लाओ , जिन्हें नाज़ हैं ...........
प्रेमाभक्ति की अनूठी बातें
एक महिला साधक का वर्णन प्रेम के बारे में
जो मैं ऐसा जानती कि प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती कि तुम प्रीत ना करिहो कोए ।
रामायण में निषादराज गुह भगवान् से ही कह देते हैं कि प्रभु हमसे भक्ति के अपेक्षा ना करिए । हमारे तो दिन रात पाप करने में व्यतीत होते हैं और आप शुक्र मानिए कि हम आपके भोजन और वस्त्र चोरी करके नहीं ले गए ।
और भगवान् को गंगा नदी पार करवाने वाले केवट ने तो कहा कि चाहे मुझे लक्ष्मण जी बाण भी मारे तो भी मैं बिना श्री राम के चरण धुलाये नाव में नहीं बैठने दूंगा .
कबीर जी तो अनूठी ही बात कहते हैं ( हिन्दुओं के मूर्ति पूजा के बारे में )
पाहन पूजे ते हरि मिले तो मैं पूजा पहार
ताते तो चक्की भली पीसी खाए संसार
और मुस्लिमों के बारे में उन्होंने कहा कि
कंकड़ पत्थर जोड़ के ली मस्जिद बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।
तो इस प्रकार हमने इश्वर प्रेम के अनूठे प्रसंग देखे , ये थोडा संक्षेप में था । कुछ और मिला तो जरुर लिखूंगा
शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
भक्ति से सम्बंधित कुछ अनुपम दोहे- भाग एक
उज्जवल पहने कापड़ा पान सुपारी खाय
कबीर हरि की भक्ति बिन बाँधा यमपुर जाय
संतों ने एक दोहा बताया हैं
डूबे सो बोले ही नहीं बोले सो अनजान
गहरो प्रेम समुद्र को कोऊ डूबे चतुर सुजान
इसका भाव यह हैं की इश्वर एक समुन्द्र की तरह हैं जो इश्वर के बारे में जानता हैं वो तो उसी में समा जाता हैं कुछ कह नहीं पाता, इसीलिए जो इश्वर के बारे में कहता हैं इसका मतलब वो अभी इश्वर के बारे में जानता ही नहीं हैं ।
मेरी विनम्र प्रार्थना हैं की संत समाज को इसमें अपवाद माने क्योंकि वो इश्वर को पूर्ण रूप में प्राप्त हैं और इश्वर की दिव्या प्रेरणा से ही हमारे मध्य सेवा के भाव से आया हैं । ऊपर वाला दोहा सिर्फ हमारे जैसे लोगो के लिए लागू होता हैं जो अपने थोड़े भक्ति के साधन को ही परम उपलब्धि मानकर ढोंग करने लगते हैं ।
एक दोहा और भी हैं जो संसार से वैराग्य जगा सकता हैं
छलनी में सदा पानी भरते रहे
अपनी समझ में बड़ा काम करते रहे ।
इसका तात्विक अर्थ यह हैं की हम संसारी लोग सुबह से शाम तक बड़े व्यस्त होकर काम में लगे रहते हैं और अपने इश्वर ,परलोक धर्मसम्बन्धी कामो को बिलकुल उपेक्षित किये रहते हैं । संसार के काम और उपलब्धि से हमें कभी भी मृत्यु से छुटकारा और मृत्यु के बाद की सद्गति नहीं मिल सकती हैं । फिर भी हम ये सब काम करते रहते हैं ।
अर्थात जैसे छलनी में पानी भरना मूर्खता हैं ऐसे ही दुनियादारी के काम भी कभी परलोक नहीं संवारते ।
परम ज्ञानी श्री उद्धव जी जो भगवन कृष्ण के चचेरे भाई थे । गोपियो को ज्ञान की शिक्षा देने गए और खुद ही उनके प्रेम भाव के सामने अपने आप को बौना महसूस करने लगे । गोपिओं ने उनसे सगुन साकार को ही अपना सर्वस्व बताया और निर्गुण निराकार को उपेक्षित बताते हुए कहा
" क्या करे हम ऐसे इश्वर को जो द्वार हमारे आ ना सके
माखन की चोरी कर ना सके मुरली की तान सुना ना सके
मन हर ना सके छल कर ना सके , तरसा ना सके
जो हमरे हृदय लग ना सके हृदय से हमें लगा न सके "
भजन- नाथ थारे शरण पड़ी दासी ( स्वामी रामसुखदास जी )
नाथ थारे शरण पड़ी दासी, नाथ थारे शरण पड़ी दासी
मोहे कर दो भवसागर से पार का दो जन्म मरण फांसी
नाथ मैं बहुत कष्ट पायी ,भटक भटक चौरासी योनी बिन ख्वाबे पायी
मिटा दो दुख्हों की राशी ,मोहे भवसागर से पार...
नाथ मैं पाप बहुत कीन्हा , संसारी भोगों की आशा ने दुःख बहुत दीन्हा
कामना हैं सत्यानाशी ,मोहे भवसागर से पार ......
नाथ मैं भक्ति नहीं कीन्ही ,झूठे भोगों की तृष्णा ने उम्र खो दीन्ही
दुःख मिटाओ हे अविनाशी , मोहे भवसागर से पार ........
नाथ अब सब आशा टूटी ,थारे श्रीचरणों की भक्ति एक हैं संजीवनी बूटी
हूँ नित दर्शन की प्यासी , मोहे भवसागर से पार ................
पंथी हूँ मैं उस पथ का
सिर्फ आपने अगर दुःख को जीया हो तो ही ढंग से sad songs के lyrics की बड़ाई करने का मन करता हैं ।
किशोर कुमार की आवाज़ में गाये गए इस गीत के बोल बहुत ही लाजवाब हैं
पंथी हूँ मैं उस पथ का , अंत नहीं जिसका
आस मेरी हैं जिसकी दिशा आधार मेरे मन का
संगी साथी मेरे अंधियारे उजियारे
मुझको राह दिखाए पलछिन के फुल्झारे
पथिक मेरे पथ के सब तारे
और नीला आकाश
इस पथ पर देखे कितने सुख दुःख के मेले
फूल चुने कभी खुशिओं के कभी कांटो से खेले
जाने कब तक चलना हैं मुझे इस जीवन के साथ
पंथी हूँ मैं उस पथ का ................
फिल्मों में गंभीर शायरी - कुछ शेर
हमारी हिंदी फिल्मो में अब वैसे काफी बदलाव आया हैं और अब गाने के बोल संवेदनशील कम रहा गए हैं । फिर भी कुछ पुराने और नए गानों में कई बार बहुत ही अच्छे शेर प्रयोग किये जाते हैं । इनमे से कुछ हैं :-
जिनको लगता हैं कि उनका चाहने वाला किसी और को पसंद करता हैं पर ऊपर से उनका होने का दिखावा करता हैं, उनके लिए दिलीप कुमार अभिनीत " आदमी " फिल्म के शीर्षक गीत से पहले की ये पंक्तिया प्रस्तुत हैं
तेरी मुहब्बत पे शक नहीं हैं तेरी वफाओं को मानता हूँ मगर तुझे किसकी आरज़ू हैं मैं ये हकीकत भी जानता हूँ
ये उनके लिए हैं जो अपने सपने तो लगभग पूरे कर लेते हैं । परन्तु मंजिल पाने के आखिरी चरण में जिन लोगों के लिए या जिन लोगों के साथ उन्होंने ये सपना देखा था वो अब उनके साथ ही नहीं हैं तो फिर उन्हें मंजिल पाने कि कोई चाह नहीं रहती । गाना आपने सुना होगा "मंजिलें अपने जगह हैं रास्ते अपनी जगह" । इस गाने से पहले ये शेर गाया गया हैं ।
मंजिलों पे आ के लुटते हैं दिलों के कारवां
कश्तिया साहिल पे अक्सर डूबती हैं प्यार कि
ये शेर मैंने गोविंदा की फिल्म गैम्बलर से लिए हैं दोनों ही शेर काफी अच्छी तरह से फिल्म में पेश किये हैं । पहला शेर झूठी हमदर्दी दिखने वाले लोगों के लिए हैं । और दूसरा अपने चाहने वालो से धोखा खाए हुए लोगों से हैं .
हर मोड़ पर मिल जाते हैं हमदर्द,
शायद मेरी बस्ती में अदाकार बहुत हैं
इस दौर में जिससे थी वफ़ा कि उम्मीद ,
आके उसी के हाथ का पत्थर लगा मुझे
अभी इस पोस्ट में थोड़ी ही सामग्री डाली हैं बाकि धीरे धीरे और भी फिल्म के गंभीर किस्म के शेर अगली पोस्टों में डालने की कोशिश करूँगा .
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
अलविदा ( दसविदानिया ) ( कैलाश खेर की आवाज़ में )
कुछ फिल्म और गीत हमेशा लीक से हटकर बनाये जाते हैं । इन्ही में से एक हैं फिल्म " दास विदानिया "। ये फिल्म हालीवुड फिल्म द बकेट लिस्ट से प्रेरित हैं ।
शीर्षक कुछ अजीबो गरीब हैं । असल में रूसी भाषा में do svidaniya का मतलब अलविदा होता हैं । इस फिल्म का अलविदा वाला गाना एक तरह से क्लाइमेक्स भी हैं । थोडा इसकी कहानी आपको बता दूँ जिससे आप lyrics की पृष्ठभूमि को समझ सकें ।
इस फिल्म का नायक विनय पाठक ( फेम खोंसला का घोंसला और भेजा फ्राय ) एक Multi-national company में Manager होता हैं । उसका छोटा भाई लव मैरिज करने के कारन इससे अलग रहता हैं । इसकी शादी नहीं होती हैं । इनकी मम्मी अक्सर बीमार भी रहती हैं । इसका बॉस सौरभ शुक्ला हमेशा बस इसे तंग करता रहता हैं साथ में कम्पनी कर्मचारी भी कोई ज्यादा सहयोग नहीं देते हैं ।
कहानी में और बड़ी मुसीबत होती हैं जब इसे पता चलता हैं की इसे कैंसर हैं । यहाँ पर इस फिल्म का ये अलविदा वाला गीत शुरू होता हैं , हालाँकि ये आगे भी थोडा थोडा दोहराया जाता हैं . अपनी पिटी पिटाई जिंदगी में बदलाव लाने के लिए ये चार पांच चीज़ें मरने से पहले करने की सोचता हैं जैसे पुरानी मित्र को आई लव यू बोलना , एक बड़ी कार लेना , विदेश यात्रा , बॉस को बेईज्ज़त करना और बेस्ट फ्रेंड से मिलना ।
ये सारे अरमान पूरे करता हैं पर दोस्त के पास जब विदेश जाता हैं तो दोस्त की पत्नी सोचती हैं की ये शायद केंसर का इलाज़ करने आया हैं तो बेचारा दोस्त का घर छोड़ देता हैं । वहां एक रूसी लड़की इसकी पिटाई कर देती हैं , तभी यह अलविदा वाला गाना शुरू होता हैं । इसके बाद ये आत्महत्या करने के लिए नदी में डूबने की कोशिश करता हैं की तभी यही रूसी लड़की इसकी जान बचाती हैं और इसकी दोस्त बन जाती हैं । फिल्म वैसे सबको पसंद नहीं आ सकती हैं ।
गीत के बोल ये हैं , ( स्वर कैलाश खेर का हैं )
जग सूना सूना ठहरा सा , मेरा सपना अपना गहरा गहरा सा
सारे शहर की जगमग के भीतर हैं अँधेरा
हर मुस्कान के पीछे छुपा हुआ गम का चेहरा
यही हैं सच तो हर पल को जी लूँ मैं जीभर के
और हंस हंस के ये कह दूँ दुखों के पत्थर से
अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा
कोई वक्त के आगे हारा हारा सा
कोई प्यार में फिरता मारा मारा सा
दिल के रिश्तों में क्यूँ दर्द हमेशा मिलता हैं
और क्यूँ काँटों पर ही फूल सुखों का खिलता हैं
यही हैं सच तो मैं इस सच को ही अपनाऊंगा
मर भी जाऊँगा तो मैं प्यार अमर कर जाऊंगा
अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा अलविदा
जिंदगी ना मिल अजनबी बनके
बंदगी शामिल हर दुआ बनके
मरने से पहले वो अपने सारे बिल आदि पूरे जमा करा देता हैं । एक आखिरी सपना अख़बार में नाम छपना - इसके लिए वो एडवांस में अखबार में पैसा देता हैं अपनी मृत्यु के बाद रस्म पगड़ी के विज्ञापन का । इस तरह वो संतुष्ट होकर मर जाता हैं ।
हम ना समझे थे ( गर्दिश )
इसका मूल विषय यह हैं कि एक शिक्षित युवक जैकी श्रोफ का पिता एक पुलिस सिपाही अमरीश पूरी हमेशा ये सपना देखता हैं कि उसका बेटा उसके ही थाने सीनियर अफसर बनकर आया हैं । परन्तु जैसा कि हम मिडल क्लास लोगों के साथ होता हैं ये परिवार भी कुछ ऐसे ही हालत देखता हैं । बेरोज़गारी से त्रस्त युवक जब अपने पिता का अपमान देखता हैं तो एक गुंडे से भिड जाता हैं आत्म सम्मान के लिए। फिर इसका पिता इसके ही खिलाफ हो जाता हैं कि क्या जरुरत थी ये सब करने क़ी ।
और दुखद पहलु ये कि जैकी श्रोफ पर पुलिस केस दर्ज हो जाता हैं जो उसके पुलिस अफसर बनने के सपने को तोड़ देता हैं । आस पास के इलाके में जैकी श्रोफ एक गुंडे के तौर पर मशहूर हो जाता हैं जो वो और उसका परिवार कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था।
इन्ही पंक्तियों में जैकी श्रोफ का दर्द बयान करता एक गीत उभरता हैं जो इस फिल्म की जान हैं और हमारे जैसे टूटे हुए सपने झेलने वालो को भावुक बना देता हैं , स्वर बाल सुब्रहमन्यम का हैं और गीत लिखा हैं जावेद अख्तर ने । इन पंक्तिओं का भाव बस यही हैं की जब हमारे जीवन का सबसे बड़ा सपना टूट जाता हैं तो कैसा लगता हैं .
हम ना समझे थे बात इतनी सी ,
ख्वाब शीशे के दुनिया पत्थर की
आरज़ू हमने की तो गम पाए ,रौशनी साथ लायी थी साए
साए गहरे थे रौशनी हलकी ।, हम ना समझे .........
सिर्फ वीरानी सिर्फ तन्हाई जिंदगी हमको ये कहाँ लायी
खो गयी हमसे राह मंजिल की , हम ना समझे ......
क्या कोई बेचे क्या कोई बांटे अपने दामन में सिर्फ हैं कांटे
और दुकाने हैं सिर्फ फूलों की , हम ना समझे ......
मुझे ये गीत बहुत भाता हैं क्योंकि कभी कभी मुझे अपनी कहानी भी लगता हैं . गाने का लिंक नीचे दिया गया हैं कृपया सुन कर देखिये
http://www.youtube.com/watch?v=kEqvffo-DrQ
दर्शन दो घनश्याम -भजन
हम सभी ने थोडा बहुत नरसी भगत या नरसी मेहता के बारे में सुना हैं । सौराष्ट्र गुजरात में इन्होने पंद्रहवी सदी में जन्म लिया था । इन्हें सूर्यवंशी भगवान् श्रीराम के पूर्वज राजा मुचुकंद का पुनर्जन्म माना गया । भगवान् कृष्ण ने इनके वरदान के प्रभाव से कालयवन जैसे राक्षस को भस्म किया था । फिर भगवान् कृष्ण ने अगले जन्म में भक्ति का वरदान दिया जिससे यही राजा मुचुकंद भक्त नरसी मेहता के रूप में आये । इनके भजन बहुत लोकप्रिय हैं । " वैष्णव जन तो तेने रे कहिये जे पीर परायी जाने रे " वाला भजन तो महात्मा गाँधी जी ने आत्मसात किया था । इनके ऊपर जो 1957 में "नरसी भगत फिल्म बनी थी जिसमे ये नीचे वाला भजन लिखा गया था । कुछ लोगों ने "slumdog millionarie" फिल्म देखने के बाद इसे सूरदास जी का भजन मान लिया जो एक गलत तथ्य हैं । नरसी भगत फिल्म का भजन ये हैं :-दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे
मन मंदिर की जोत जगा दो घटघट बासी रे
मन्दिर मन्दिर मूरत तेरी ,फिर भी दिखे ना सूरत तेरी
युग बीते ना आई मिलन की पूरनमासी रे ,दर्शन दो ...........
द्वार दया का जब तू खोले पंचम सुर में गूंगा बोले
अँधा देखे लंगड़ा चलकर पहुंचे काशी रे ,दर्शन दो ..........
पानी पीकर प्यास बुझाऊ नैनों को कैसे समझाउं
आँख मिचौनी छोडो अब मन के बासी रे ,दर्शन दो .....
निर्बल के बल धन निर्धन के तुम रखवाले भक्त जनो के
तेरे भजन में सब सुख पाऊ मिटे उदासी रे , दर्शन दो ......
नाम जपे पर तुझे ना जाने उनको भी तू अपना माने
तेरी दया का अंत नहीं हैं हे दुःख नाशी रे , दर्शन दो .........
आज फैसला तेरे द्वार पर मेरी जीत हैं तेरी हार पर
हर जीत हैं तेरी मैं तो चरण उपासी रे , दर्शन दो ......
द्वार खड़ा कब से मतवाला मांगे तुमसे हार तुम्हारी
नरसी की ये विनती सुनलो भक्त विलासी रे , दर्शन दो ...
लाज ना लुट जाये प्रभु तेरी नाथ करो ना दया में देरी
तीन लोक छोडो अब कर दो गंगा निवासी रे
दर्शन दो घनश्याम नाथ
मोरी अँखियाँ प्यासी रे .................
बुधवार, 13 जनवरी 2010
दैनिक कड़ियाँ भाग एक
और वैसे भी आप सभी जानते हैं कि कुछ बातो को ज्यादा शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता हैं । वे बस छोटी हो सकती हैं पर महत्व उनका बहुत अधिक होता हैं । मैंने सोचा कि इन पर कोई बड़ी पोस्ट लिखना संभव ना हो तो कम से कम ऐसी तीन चार बातों को मिलाकर लिखने से कुछ तो प्रासंगिक होगा । ये दैनिक कडिया Tweeter या माइक्रो पोस्ट जैसी होंगी । इसमें जो बातें थोड़ी व्यंग्य जैसी होंगी उनमे सरल का नाम डाल दूंगा और बाकि तो जीवन में घटी हुई बातों में किसी के नाम कि आवश्यकता ही नहीं होंगी . जिंदगी में बीते रोज के सुख दुःख के अनुभव मैं दैनिक कडिया के क्रमशः भागों में पोस्ट करता रहूँगा .
कई ऑटो / टैक्सी वाले अधिक से अधिक सवारी भरने के चक्कर में बिलकुल अधर्म पर उतर जाते हैं . ऑटो में ठूंस ठूंस कर भरी सवारियो के बीच बस हमारा धैर्य कई बार जवाब दे जाता हैं , आँखों से दुनिया की झलक पाने के लिए सवारिओं के बीच में से दुनिया की झलक मिल जाती हैं और हमारे मन को नरक की ।
एक आशंका जताई जा रही हैं की हमारे देश में सोचे समझे तरीके से स्वायिन फ्लू को फैलाया गया । पूरे दो महीने चैनलो और सरकारों ने हमें जानबूझकर दवाईयों के नाम बताये । खुद बहार से आने वाले लोगो पर कोई फुलप्रूफ चेकिंग जैसा काम नहीं किया । ऊपर से हमें समाचारों में निश्चित रहने को कहा गया की फलां फलां अमेरिकेन कम्पनी से बात हो गयी हैं , दवाई की कोई कमी नहीं होने दी जायेगी । जबकि T B या कैंसर से इससे भी जयादा लोग मरते हैं । पर बाहरी दवाई कम्पनी से मिली सरकार और मीडिया चैनल पैसा खा चुके थे । और जब पूरा माहौल तैयार हो गया तो कोई टेंसन लेने को तैयार नहीं । अब तो मरीजों की संख्या भी शायद लाखों लोगों को पार कर चुकी हैं फिर कोई सरकार या चैनल संवेदनशील क्यूँ नहीं होता । तब तो सात आठ मरीजों के लिए भी प्रेस कांफ्रेंस होती थी । हमारे बेशर्म स्वास्थ्य विभाग ने कहा था की हमें कोई चिंता नहीं बस एक दो हफ्तों में हम नियंत्रण पा लेंगे । पता नहीं जैसे हमारे देश में सरकार हैं भी या नहीं ।
कसाब को तो आप सभी जानते ही हैं । उस को देश में LIVE टेलीकास्ट के जरिये सबने देखा था । वो अंतिम अकेला आतंकवादी जो बचा था । उसने खुद गुनाह कबूल किया था । देश पर हमला जैसा सबसे बड़ा अपराध , जिसके देश के सब नागरिक चश्मदीद गवाह और उसे मुजरिम साबित करने के लिए सरकार ने उसकी ही सेवा में पन्द्रह करोड़ रुपये और एक वकील लगा दिए । जबकि एक आम नागरिक कभी भी अपने रोज के झगड़ों के लिए वकील की फीस नहीं दे सकता हैं । इस केस में साबित करने के लिए पता नहीं अभी क्या बचा हैं
ऐसी ही कुछ दिल को छूने वाली बातें आपके साथ शेयर करता रहूँगा । शीर्षक दैनिक कड़ियाँ ही रहेगा बस भाग का क्रम बढ़ता रहेगा ।
सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सुबह सुबह लोग भक्ति के संगीत में डूबने का नाटक करते हुए उस भगवान् को बेवक़ूफ़ बनाते हैं जो हम सबसे ज्यादा चालाक हैं और...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...