ek vridh ka pachhtava old man poem kavita hindi hindu blog virender saral zte saralkumar dharmik bhakti लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ek vridh ka pachhtava old man poem kavita hindi hindu blog virender saral zte saralkumar dharmik bhakti लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

एक कविता - एक नास्तिक वृद्ध का पछतावा

ये कविता उन लोगों के लिए हैं जो सारी उम्र बिना इश्वर को याद किया बिताते हैं और अंत में पछताते हैं ,

कविता ली हैं वन्दनीय संत श्री आशुतोष महाराज के संस्थान दिव्या ज्योति जाग्रति संस्थान से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका अखंड ज्ञान से । इसके लेखक हैं श्री अमित कुमार दीक्षित और दिसम्बर 2009 में प्रकाशित अंक में पृष्ठ 18 पर हैं ये कविता हैं ।

सूखी सूखी घास जैसे पानी को तरसती हैं
हाँ आज मेरी उम्र वैसे जवानी को तरसती हैं
क्या समां था वो क्या वक्त था वो हरि भक्ति करने का
अब तो चंद सांसे बची हैं कब वक्त जाये मरने का
हरि ने भी तब मुझ पर तरस खाया था
मुझे ज्ञान देने हेतु कुछ संतो को भिजवाया था
तब जवानी का आलम भी खूब छाया था
और उस वक्त मैंने बस तन को सजाया था
याद आता हैं वो वक्त जो रेत की तरह फिसल गया
पानी का बहाव था जो निकल गया बस निकल गया
अब जाने कब मौके मिले बस खुद से कहता जाता हूँ
कोई मेरा अब साथी नहीं , रो रो के पछताता हूँ
बुढ़ापे के बादलों में जब मौत की बारिश बरसती हैं
हाँ आज मेरी उम्र जवानी को तरसती हैं

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...