कविता थोड़ी रहस्यमय सी हैं , बस कुछ बाते बन गयी , इश्वर माफ़ करे क्योंकि कुछ जगह ज्यादा हो गया । जो आप में से रहस्य समझ जाये । वो उत्तर दे दे । एक ने तो देना ही हैं क्योंकि वो तो अध्यात्म का सिरमौर हैं ।
वो नदी के समन्दर में मिलने कि बाते
खुली छत पर वो तारे भरी राते
अँधेरे जब मेरे सारे खिल जाते
उसे याद याद करते आंसू आ जाते
तब मैं सोचता कि प्यार मेरा चुना हुआ नहीं था
फिर भी तबाह होना होगा सुना हुआ कहीं था
संग जहाँ ईश्वर होना था साया अपना भी नहीं था
स्वीकारा क्योंकि पिछले जन्म का नाता कही था
भविष्य क्या देखू जब भूतकाल में नीव रखी गयी
जिसका मैं जीवत्व उसकी हत्या की नीव रची गयी
दोष उसका था ही नहीं जिम्मेदारी तो सबकी बनती थी
कुटुम्बी दायरों में रोज किसी की तकदीर लुटती थी
आँखों के सामने होते भी मेरी आंखे देख ना पाई
बहुत गहराई आत्मा एक दोस्त के अक्स से छलक पाई
समय बदल गया था तो चरित्र के मायने बदल गए थे
सिर्फ एक बार के स्पर्श से मेरे सवाल मचल गए थे
वो वही था जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था
मन्नते जिसकी लेकर वृन्दावन में भटक रहा था
क्यों ब्रज की भूमि का शनिदेव उसको प्यारा था
अंतिम दम तक वो इष्टदेव जो हुआ ना हमारा था
जमीन आसमान भी जहाँ मिला करते हैं
क्षितिज कि परिभाषा वहां दिया करते हैं
चिराग कहा वीरेन जैसे सूरज से बढ़कर होगा
जीव कि तो बात कहाँ ब्रह्म से वो चढ़कर होगा
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!श्री हरि माफ़ करे मुझे!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
पर मैं भी क्या करू अब कोई रास्ते ही नहीं बचे हैं
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