ये भजन मैंने 2008 में बापूजी के दिल्ली ( द्वारिका ) में हुए सत्संग में सुना था । मुझे इसके मूल लेखक का पता नहीं हैं । पर ये भजन बहुत ही अच्छा हैं जिसमे इश्वर प्रेमी भक्तों के भाव बिलकुल सटीक प्रदर्शित किये गए हैं ।
जर्रे जर्रे में हैं झांकी भगवान् की , किसी सूझ वाली आँख ने पहचान की
नामदेव ने पकाई रोटी कुत्ते ने उठाई, पीछे घी का कटोरा लिए जा रहेमुझे ओढनी उढ़ा दी इंसान की
निगाह मीरा की निराली पी के जहर की प्याली
ऐसा गिरिधर बसाया हर श्वास मेंबड़ी कृपा हैं कृपानिधान की , बलिहारी हूँ मैं आपके एहसान की ,
इसी तरह सूरदास निगाह जिनकी थी ख़ास
ऐसा नैनो में नशा था हरिनाम का गुरु नानक कबीर सही जिनकी थी नजीर
देखा पत्ते पत्ते में निरंकार को
नजदीक और दूर वही हाजर हजूर
यही सार समझाया संसार को
ये जहां शहर गाँव और जंगल बियाबान
मेहरबानियाँ हैं उस मेहरबान की
सारी चीज़ें हैं ये एक ही दूकान की
जर्रे जर्रे में हैं झांकी भगवान की ...............