हे हरि !
जब एक हाड़ मास का पिता अपने बच्चो के अपराधो को ना देखकर सिर्फ उन्हें वात्सल्य भाव से गले लगा लेता हैं तो फिर क्यों आप परमपिता होते हुए भी हमारी योग्यता को हिसाब से दर्शन देने को इंतज़ार करवा रहे हैं । हम जैसे हैं प्रभु तेरे हैं। अगर मिटटी से सने हैं हमारे पाँव तो प्रभु ये मिटटी बनाने वाला भी तू ही हैं ।
अगर हमारे मन कमजोर हैं तो प्रभु हम क्या करें । हमें तो ये भी नहीं पता कि इस शरीर में मन किस जगह होता हैं । इसको आप वश में करने को कहते हैं पर हमें तो बेचारे मन के सहारे हमने सारे सुख महसूस हुए हैं । हमें तो आपका सहारा हैं पर इस बेचारे मन को तो बस हमारा ही हैं ना । संस्कृत के बड़े बड़े श्लोको में इसके पीछे सारे ऋषि डंडा लेकर पड़े रहते हैं । पर मेरे तो आनंद का जरिया ही यही हैं । इसने ही मुझे आपसे प्यार करना सिखाया । वृन्दावन के मंदिरों में , तीर्थयात्रा कि धक्का मुक्की में भी बेचारे इसी ने तो हौसला दिया और कहा कि ईश्वर जरुर तुझे दर्शन देंगे । बुद्धि तो तब भी तीर्थयात्रा और धर्मशाला और खाने के खर्चे का हिसाब लगा रही थी ।और दो दिन के समय को टाइम वेस्ट मान रही थी ।
उम्र का हवाला दे रही थी की अभी से क्यों। बुढ़ापे में शायद बुद्धि मुझे वृन्दावन लेकर जाएगी ।
और आत्मा तो अभी मिली नहीं जो कुछ था सारा मन ही तो झेल रहा था । किस बुद्धि के भरोसे मैं बैठ जाऊ प्रभु जो मेरे पिता की मृत्यु के समय कोई तिकड़म भी नहीं लगा पाई थी। अकेला मन था जिसने कहा कुदरत एक रास्ता बंद करती हैं तो दूसरा खोल भी देती हैं तू हिम्मत मत हार तेरे लिए तेरे इष्टदेव सहायता करेंगे वो आपकी इतनी बड़ाई करता हैं और आप उसे ही छोड़ने को कहते हैं । मेरे दोस्तों के असमय छूट जाने के समय भी तो मन ने ही सहारा दिया कि और अच्छे मिल जायेगे ।
हमेशा बुरे हालत में ये मुझे कहता हैं कि आने वाला समय अच्छा होगा । मेरी आँख में आंसू हो तो ये उदास होता हैं । बुद्धि तो तब भी कोई प्रोफेशनल सोच में उलझी रहती हैं कि कैसे झूठे तरीके से प्रोमोशन लिया जाए और कैसे फ्रौड़ तरीके से इनकम टैक्स बचाया जाये । सरकारों की टैक्स थोपने और कीमते बढ़ाने को चल रही मनमर्जी , क्रिकेट की चकाचौंध में व्यस्त समाज में ये एक अकेला मेरी दुनिया में हौसला भरता हैं की तू अपने से नीचे वालो को देख वो भी तो कितने अभावो में जी रहें हैं ।
फिर क्यों आप सब मुझे इस मन को छोड़ने के लिए कहते हैं । जिसने मेरा हमेशा साथ दिया और हौंसला भी यही देता हैं आपसे मिलने का मैं उसे कैसे छोड़ दू प्रभु। मुझे तो आपका धाम चाहिए मेरे इस मन के साथ।
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