हरि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हरि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 1 अगस्त 2010

प्रभु नारायण से प्रार्थना cum शिकायत

ये कविता मेरी तरह के कुछ इश्वर साधको के लिए हैं जो जटिल परिस्थितियो में कुछ दुर्लभ भावो को महसूस करते हैं । कई बार कुछ बाते तर्कों से परे हो जाती हैं और मन को निचोड़ कर रख देती हैं । पूरी की पूरी कविता किसी की अमानत हैं । उसी का धन्यवाद हैं जो उसने मुझे छूट दी हैं लिखने की जो मैं श्री नारायण और आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ

प्यारे नारायण तुम जागते क्यों नहीं हो यार
कैसे बताऊ तुम्हे तुम ही समझा दो प्यार

क्यों मुझसे कहते हो कि कोई भी मुझसे शादी कर ले
क्या कीड़ी मकोड़ी भी इतने लायक कि मुझ ब्रह्म को वर ले
खुद अहम् में जकड़े हो पर इलज़ाम मुझे दे रहे हो
कितनी तरह से कह रहा हु पर हाथ ना तुम दे रहे हो

देखना किसी दिन कोई भूला दृश्य याद आएगा
गीता भागवत ना कोई फ़िल्मी नाटक आपको भायेगा
आपसे दूर रहकर भी मैंने क्या क्या जहर पिया हैं
शिव ही नीलकंठ हैं इस धारणा को झूठा किया हैं

पता नहीं ईश्वर के सब साधको में मेरी ही क्यों परीक्षा हुई
जिस दौर का फल मिलना नहीं उन्ही कर्मो की तितिक्षा हुई
पापो के भार से जिनके हिमालय भी नन्हे हो गए थे
मर्यादा शिखरों पर ऐसे चरित्रहीन खड़े हो गए थे

पिता के संकल्प से बनी ये एक पुत्र की प्रेम कहानी थी
कृष्ण ही यहाँ ढूंढता रह गया खो गयी मीरा दीवानी थी
सब कुछ सही होते होते आखिरी दम पर किस्मत पलटी थी
नजरो का धोखा लोगो को मार गया वर्ना कहाँ पृथ्वी चपटी थी

ना सपने ना मजबूरियां बस आपसे गहरा प्यार हैं
देवी देवता भी जगे नहीं दूर बहुत अवतार हैं

ग्लोबलायीजेशन करने वाले लोक लोकांतर तक क्यों नहीं जाते हैं
उड़नतश्तरी से डरने वाले क्यों त्रिदेव से अनभिज्ञ रह जाते हैं
मशीनों की नज़रो से क्यों सच जांचा जा रहा हैं
निर्जीवो से क्यों आखिर सजीव आँका जा रहा हैं

हे हरि जब तक जागते नहीं मुझे घुमाते रहोगे
मेरे करीब आते ही फिर मुझसे कहोगे
मैं तो सो रहा था तुमने जगाया क्यों नहीं
सृष्टि का भार अकेले उठाया मुझे बताया क्यों नहीं

काश आपको याद होगा हमने क्या तय किया था
पर सो आप गए थे और मैंने किस्मत का भय जिया था
आपकी माया ने मुझे सजा देकर आत्मा को भटका दिया था
कसूर मेरा सच्चा होना था इसीलिए फांसी पर लटका दिया था

सब आयामों में आपके साथ हूँ बस इसीलिए ख़राब हूँ
ऐसी वैसी कोई वस्तु नहीं आपके कर्मो का हिसाब हूँ
समय का एक पहिया जो हमेशा तेरे साथ चलता हैं
मैं हू एक झरना जो तेरे पर्वतो पर बहता हैं

चरणों में अर्पित हूँ बस अब तो स्वीकार करो
फिर भी तेरी गुंडागर्दी , ठुकरा दो या प्यार करो


!! हरि शरणम् !!
!! वीरेन्द्र !!

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...