ये कविता वैसे तो एक कृष्ण साधिका को समर्पित हैं पर बीच में मुझ बेवक़ूफ़ से एक प्रेमिका के भाव भी लिखे गए . सभी परम भक्त जन मेरी धृष्टता को क्षमा करे और इसे राधा जी द्वारा लिखी गयी कृष्ण को प्रेमपाती समझे या फिर एक सरल साधिका का अपने प्रेमास्पद को अपनी व्यथा कहना . मार्गदर्शन दे
तू गया हैं भूल कि तुने ही ये दिल चुराया हैं
भगवान प्रार्थनाओ से मिला तू मेरा हमसाया हैं
मन समय के इस दौर में शांत और बिलकुल मौन हैं
तू बता तेरा अलावा मेरे आंसू पीने वाला कौन हैं
हालातो को समझने का कुछ मुझे भी समय दे
मै परेशान हू बहुत अपनी बाहों में बस आश्रय दे
आत्मा तुझमे मिल चुकी बस शरीर लगता बोझ हैं
ना इलाज दुनिया में नस नस में चुभता ये रोग हैं
मै तेरी अब सदा के लिए फिर क्यों मुझे विरह से मार देता हैं
जब तुझसे सुकून माँगा अनोखी बातो से बांध देता हैं
अगर तू ही नहीं समझेगा तो फिर तो कुछ आशा नहीं
तू ना सहारा देगा फिर क्या बचा दूसरा भगवान कही
मेरी बातो का भी क्या बुरा मानना सब तेरा ही तो दिया हुआ हैं
जिम्मेदारियो में मर गया तन मेरा सिर्फ तेरी आस से जिया हुआ हैं
क्या मेरे हालात तुझे साफ़ साफ नहीं दिखाई देते
किस्मत के चुभे ये नश्तर क्या मदद की दुहाई नहीं देते
तुम कहाँ मै कहाँ बस मै तो वैसे ही मरी हुई हैं
तुम्हारा दुःख कैसे दूर करू जब अपनों में ही घिरी हुई हू
आँखे भी मुझसे कहती हैं पहचान लिया ना तुने अपना
तेरी दुआओ से देख सच हो गया "वीरेन " जैसा भी सपना
तुम क्यों नहीं कर देते ये प्यार का मौसम सुहाना
समां लो अपने आप में मुझे चाहे रूठ जाये जमाना
अपनी आत्मा से कोई भला नाराज़ होता हैं
तुम्हे परेशान करने की सोचना भी भगवान से धोखा हैं
मै ही तेरी राधे प्रिया फिर भी क्यों मुझे तंग करता हैं
मेरे आंसू पोंछ दे क्यों मुझे अलग समझता हैं
मै बहुत मजबूर हू कभी तो समझा करो
बस तुझसे ही आशा हैं इतना तो साथ दिया करो
मुझे मौका मिलेगा तो मै अपनी साँस साँस तुझे दे दूंगी
तेरे सारे दुखो को अपने दिल में लेकर सच में जान दे दूंगी
बस सिर्फ इस अंतिम दौर में मुझे तुम्हारी जरुरत हैं
कृष्ण तुम मेरी आत्मा हो भविष्य की भी ये एक हकीकत हैं
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
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शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011
शनिवार, 15 जनवरी 2011
भगवान के चौदह अंशावतारो और दस पूर्ण अवतारों पर कविता
भगवान के चौदह अंशावतारो और दस पूर्ण अवतारों पर ये कविता लिखी हैं . आशा हैं धार्मिक लोगो को पसंद आएगी .
आत्मा जैसे परमात्मा की भक्ति को तरसती हैं
संतो की मेघो रुपी करुना दुनिया पर बरसती हैं
प्रभु तेरे हर अवतार को प्रार्थना करनी हैं
रोम रोम में तुझे शरण कि धारणा भरनी हैं .
सनकादि ऋषियो मुझे अपने जैसा बच्चा ही बना दो
भक्ति ज्ञान आपका भागवत स्वरुप मुझे भी जना दो
व्यास के सारे पुराणो में आई वो सारी धर्म ज्ञान कि बाते
पुत्र जिनके शुकदेव रोशन कर गए परीक्षित की शापित राते
ब्रह्मा जी के मानस पुत्र होकर भी दासी के भाग्य में पुत्र का सौभाग्य दिया
देवर्षि नारद बनकर आपने ये अनोखा निष्कपट भक्ति सूत्र लिख दिया
देवहूति और कर्दम के दाम्पत्य को तुमने धन्य कर दिया
नौ बहनों के एक भाई बनकर कपिल मुनि का सांख्य रच दिया
अनोखे पति पत्नी बनकर सुयज्ञ और लक्ष्मी का जोड़ा पाया
इतिहास जिसका रहस्य बस हमेशा शास्त्रों में खोजता पाया
सती अनसूया और अत्री मुनि के त्रिदेव स्वरुप दत्तात्रेय तुम बनकर आये
अपने अगले अवतार में जिसे मारना था उस हैहेयिवंश को सहस्त्रबाहु बनाये
नर नारायण का रूप धरकर धर्म मूर्ति को तप का फल दिया था
उर्वशी को जंघा से जन्म देकर इंद्र को शर्मिंदा निष्फल किया था
फिर इन्ही धर्म मूर्ति को एक और दूसरा जन्म आपने दे दिया था
और इन्ही पृश्नी और सुतपा का बेटा बन अपना नाम पृश्नी गर्भा ले लिया था
दुष्ट वेन की भुजा से फिर आपने पृथु बनकर संतो का कल्याण किया
एक दयावान राजा बनकर पृथ्वी को बेटी का सम्मान दिया
सौ सौ बेटो के पिता ऋषभदेव बने और बेटे जड़भरत को तिलक कराया
उस परम ज्ञानी ने ही तो अगले जन्म में रहूगन को मुक्त कराया
सागर मंथन से आरोग्य के प्रतीक वो पहले चिकित्सा प्रधान
परम औषधि को खुद लेकर प्रगटे धन्वन्तरी भगवान
अमृत वितरण पर सबको मोहित करने मोहिनी बन आये
असुर राहू के शीश को काटकर केतु दो रूप बनाये
हंस और हयग्रीव अवतार बनकर तुम बस उद्धार करने आते हो
सब रूप तुम्हारे यही तो तो समय समय पर जाता जाते हो
ये चौदह अंशावतार पूरे हुए हम इनको शीश नवाते हैं
अब उस निर्गुण भगवान के पूर्ण दस अवतारों की गाथाये गुणों में लाते हैं
इस कल्प की स्थापना करने को मनु जी को चुन लिया
मछली का रूप धरकर जल में खड़े खड़े जैसे प्रलय का युग जिया
फिर मंदराचल अपनी पीठ पर रखकर कछुए ने समुन्द्र मंथन करवा दिया
माता लक्ष्मी को अपनी जान अपनाया और देवो को कल्प वृक्ष दिलवा दिया
वराह बनकर पृथ्वी को जल से निकाल कर ले आये
इसी द्वंद्व युद्ध में हिरण्याक्ष के प्राण पखेरू आपने उडाये
पैंतीस हज़ार सालो की हिरन्यकश्यप की तपस्या पर बच्चा प्रह्लाद भारी पड़ा
अनोखे मौत के वरदान की शर्ते पूरी करने नरसिंह जैसा भयंकर रूप अनाड़ी बड़ा
नन्हे नन्हे पैरो वाले वामन को तीन कदम भूमि भी ना मिली
शुक्राचार्य के त्यागे राजा बलि को बस पाताल की शरण मिली
जमदग्नि का वो उग्र बेटा परशुराम जिसने ब्रह्माण्ड को हिला डाला
इक्कीस बार क्षत्रियो को समेटा और सहस्त्रबाहु को मिटा डाला
फिर वो परम भक्त भरत का भाई राजा राम बनकर आ गया
माता सीता के अपहर्ता रावन को मिटाने सगुण राम छा गया
वो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिसे शिवजी ने पूजा था
लक्ष्मण और हनुमान के लिए वैसा इष्टदेव ना दूजा था
फिर वो मेरा अपना गोपियो वाला अर्जुन का सखा कृष्ण आया
जिसकी बस अभी याद आते आते दिल भर आया
यदुवंश और कुरुवंश को नष्ट करने जिसने महाभारत रचाया
परम अवतारों का वो शिरोमणि इतिहास में जिसने विश्वरूप दिखाया
जरा जन्म और व्याधि को जिसने बुध बनकर समझ लिया
उस परम संत ने अपने असली रूप को झटक लिया
अब कलयुग में परम तेजस्वी जो भयंकर युद्धों का नज़ारा रचेगा
और फिर वो कल्कि माता वैष्णोदेवी के जीवन का सहारा बनेगा
फिर भी हरि तो अनंत हैं और अनंत रहेगा .
"वीरेन " को आदेश हैं तो बस लिखता रहेगा
कोई भी गलती हो तो कृपया मार्गदर्शन करे .
--
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
Email:virender.zte@gmail.com
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आत्मा जैसे परमात्मा की भक्ति को तरसती हैं
संतो की मेघो रुपी करुना दुनिया पर बरसती हैं
प्रभु तेरे हर अवतार को प्रार्थना करनी हैं
रोम रोम में तुझे शरण कि धारणा भरनी हैं .
सनकादि ऋषियो मुझे अपने जैसा बच्चा ही बना दो
भक्ति ज्ञान आपका भागवत स्वरुप मुझे भी जना दो
व्यास के सारे पुराणो में आई वो सारी धर्म ज्ञान कि बाते
पुत्र जिनके शुकदेव रोशन कर गए परीक्षित की शापित राते
ब्रह्मा जी के मानस पुत्र होकर भी दासी के भाग्य में पुत्र का सौभाग्य दिया
देवर्षि नारद बनकर आपने ये अनोखा निष्कपट भक्ति सूत्र लिख दिया
देवहूति और कर्दम के दाम्पत्य को तुमने धन्य कर दिया
नौ बहनों के एक भाई बनकर कपिल मुनि का सांख्य रच दिया
अनोखे पति पत्नी बनकर सुयज्ञ और लक्ष्मी का जोड़ा पाया
इतिहास जिसका रहस्य बस हमेशा शास्त्रों में खोजता पाया
सती अनसूया और अत्री मुनि के त्रिदेव स्वरुप दत्तात्रेय तुम बनकर आये
अपने अगले अवतार में जिसे मारना था उस हैहेयिवंश को सहस्त्रबाहु बनाये
नर नारायण का रूप धरकर धर्म मूर्ति को तप का फल दिया था
उर्वशी को जंघा से जन्म देकर इंद्र को शर्मिंदा निष्फल किया था
फिर इन्ही धर्म मूर्ति को एक और दूसरा जन्म आपने दे दिया था
और इन्ही पृश्नी और सुतपा का बेटा बन अपना नाम पृश्नी गर्भा ले लिया था
दुष्ट वेन की भुजा से फिर आपने पृथु बनकर संतो का कल्याण किया
एक दयावान राजा बनकर पृथ्वी को बेटी का सम्मान दिया
सौ सौ बेटो के पिता ऋषभदेव बने और बेटे जड़भरत को तिलक कराया
उस परम ज्ञानी ने ही तो अगले जन्म में रहूगन को मुक्त कराया
सागर मंथन से आरोग्य के प्रतीक वो पहले चिकित्सा प्रधान
परम औषधि को खुद लेकर प्रगटे धन्वन्तरी भगवान
अमृत वितरण पर सबको मोहित करने मोहिनी बन आये
असुर राहू के शीश को काटकर केतु दो रूप बनाये
हंस और हयग्रीव अवतार बनकर तुम बस उद्धार करने आते हो
सब रूप तुम्हारे यही तो तो समय समय पर जाता जाते हो
ये चौदह अंशावतार पूरे हुए हम इनको शीश नवाते हैं
अब उस निर्गुण भगवान के पूर्ण दस अवतारों की गाथाये गुणों में लाते हैं
इस कल्प की स्थापना करने को मनु जी को चुन लिया
मछली का रूप धरकर जल में खड़े खड़े जैसे प्रलय का युग जिया
फिर मंदराचल अपनी पीठ पर रखकर कछुए ने समुन्द्र मंथन करवा दिया
माता लक्ष्मी को अपनी जान अपनाया और देवो को कल्प वृक्ष दिलवा दिया
वराह बनकर पृथ्वी को जल से निकाल कर ले आये
इसी द्वंद्व युद्ध में हिरण्याक्ष के प्राण पखेरू आपने उडाये
पैंतीस हज़ार सालो की हिरन्यकश्यप की तपस्या पर बच्चा प्रह्लाद भारी पड़ा
अनोखे मौत के वरदान की शर्ते पूरी करने नरसिंह जैसा भयंकर रूप अनाड़ी बड़ा
नन्हे नन्हे पैरो वाले वामन को तीन कदम भूमि भी ना मिली
शुक्राचार्य के त्यागे राजा बलि को बस पाताल की शरण मिली
जमदग्नि का वो उग्र बेटा परशुराम जिसने ब्रह्माण्ड को हिला डाला
इक्कीस बार क्षत्रियो को समेटा और सहस्त्रबाहु को मिटा डाला
फिर वो परम भक्त भरत का भाई राजा राम बनकर आ गया
माता सीता के अपहर्ता रावन को मिटाने सगुण राम छा गया
वो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जिसे शिवजी ने पूजा था
लक्ष्मण और हनुमान के लिए वैसा इष्टदेव ना दूजा था
फिर वो मेरा अपना गोपियो वाला अर्जुन का सखा कृष्ण आया
जिसकी बस अभी याद आते आते दिल भर आया
यदुवंश और कुरुवंश को नष्ट करने जिसने महाभारत रचाया
परम अवतारों का वो शिरोमणि इतिहास में जिसने विश्वरूप दिखाया
जरा जन्म और व्याधि को जिसने बुध बनकर समझ लिया
उस परम संत ने अपने असली रूप को झटक लिया
अब कलयुग में परम तेजस्वी जो भयंकर युद्धों का नज़ारा रचेगा
और फिर वो कल्कि माता वैष्णोदेवी के जीवन का सहारा बनेगा
फिर भी हरि तो अनंत हैं और अनंत रहेगा .
"वीरेन " को आदेश हैं तो बस लिखता रहेगा
कोई भी गलती हो तो कृपया मार्गदर्शन करे .
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मंगलवार, 11 जनवरी 2011
अध्यात्म को समर्पित एक और कविता
यह कविता मेरे एक आध्यत्मिक दोस्त ने भेजी थी पहले पैरा का थीम उसका हैं जो वैसे मैंने चेंज भी कर दिया . दुसरे पैरे से मेरे भाव हैं .
भगवान् को आने के लिए माहौल दिव्य पाया था
दर्द उनका अपना नहीं, भक्तो के हित वो जमीन पर आया था
कोई समझ ना सका जिम्मेदारी कितनी भयानक मिली थी
कीड़े से लेकर इंद्र तक की किरणें भरी हुई पड़ी थी
किस किस की भावनाएं सुनी होंगी, ये तो गिना नहीं जा सकता
भगवान् के सिवा किसी और से इतना सहा नहीं जा सकता
भगवान् सबकी सुनते हैं, भगवान् की कौन सुने प्यारे !
परमात्मा उन्हें सुनने योग्य स्वभाव मुझमे उतारें
मै सोचता था कि परमात्मा हो सकता हूँ
सबमे होकर उनका दुखड़ा रो सकता हूँ
मान्यताओ से पार सब अहम् खो सकता हूँ
करुना से सबके पाप जो धो सकता हू
पर कैसे कैसे जीव कैसी कैसी कामनाये मांगने लगे
तपस्वियों के हिस्से के सुख भी बगले झाँकने लगे
बुरे लोगो की चाँदी हो चली और अच्छो को आत्मघात करना पड़ा
उन्हें तो धर्म हज़म होना नहीं था पीने को विष मुझे सुकरात बनना पड़ा
जी भर आता हैं कि क्या मेरे साथ ऐसा होना ठीक था
सिर्फ सच्ची दुआ थी पर लगा ऐसे जैसे मांग रहा भीख था
अपनी जिंदगी जिनकी विवाद ऐसा भी हर शख्स दे रहा सीख था
ऊपर से उलटी पुलटी सबकी अपेक्षाओं से मेरा मन गया झीख था
पर फिर आखिरी कदम पर गोपियों पर घनश्याम गया रीझ था
इसीलिए अब सब कुछ ठीक हो जाने के "वीरेन" एकदम करीब था
सब हालत प्रभु के दिए हुए उसने बस अपनी चेतना मिला दी
नयी ऐसी उसकी बातो ने तो धर्म की भी जड़े हिला दी
सारे शास्त्रों में लिखी बातो से जोड़ जोड़ कुछ नयी बना दी
गूंगा बोले बहरा सुन ले पूजा की ऐसी विधिया बता दी
मंजिल जिनकी बस परमात्मा ऐसी गाड़िया चला दी
हर किसी को बैकुंठ भेजा यम की गलिया खाली करा दी
मेरा अब श्री हरि ही जाने क्योंकि अब बस उनका ही सहारा हैं
अनुराधा से कृष्णानुज मिलना तय क्योंकि "वीरेन " कुंवारा हैं
-- मै सोचता था कि परमात्मा हो सकता हूँ
सबमे होकर उनका दुखड़ा रो सकता हूँ
मान्यताओ से पार सब अहम् खो सकता हूँ
करुना से सबके पाप जो धो सकता हू
पर कैसे कैसे जीव कैसी कैसी कामनाये मांगने लगे
तपस्वियों के हिस्से के सुख भी बगले झाँकने लगे
बुरे लोगो की चाँदी हो चली और अच्छो को आत्मघात करना पड़ा
उन्हें तो धर्म हज़म होना नहीं था पीने को विष मुझे सुकरात बनना पड़ा
जी भर आता हैं कि क्या मेरे साथ ऐसा होना ठीक था
सिर्फ सच्ची दुआ थी पर लगा ऐसे जैसे मांग रहा भीख था
अपनी जिंदगी जिनकी विवाद ऐसा भी हर शख्स दे रहा सीख था
ऊपर से उलटी पुलटी सबकी अपेक्षाओं से मेरा मन गया झीख था
पर फिर आखिरी कदम पर गोपियों पर घनश्याम गया रीझ था
इसीलिए अब सब कुछ ठीक हो जाने के "वीरेन" एकदम करीब था
सब हालत प्रभु के दिए हुए उसने बस अपनी चेतना मिला दी
नयी ऐसी उसकी बातो ने तो धर्म की भी जड़े हिला दी
सारे शास्त्रों में लिखी बातो से जोड़ जोड़ कुछ नयी बना दी
गूंगा बोले बहरा सुन ले पूजा की ऐसी विधिया बता दी
मंजिल जिनकी बस परमात्मा ऐसी गाड़िया चला दी
हर किसी को बैकुंठ भेजा यम की गलिया खाली करा दी
मेरा अब श्री हरि ही जाने क्योंकि अब बस उनका ही सहारा हैं
अनुराधा से कृष्णानुज मिलना तय क्योंकि "वीरेन " कुंवारा हैं
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
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गुरुवार, 23 दिसंबर 2010
कृष्ण साधको और आत्म संगिनी को समर्पित कविता
ये कविता मेरी दो तीन दौर को इकट्ठे जोड़ कर बनायीं गयी हैं . इसमें कुछ बाते हैं जो मुझे अपनी उन कृष्ण भक्त साधको को कहनी हैं जो बस कृष्ण प्रेम में पागल हैं . फिर अपने उन दोस्तों को बतानी हैं जो मेरी soulmate की परिभाषा के बारे में पूछते रहते हैं . ये कविता soulmate वाले कन्सेप्ट से थोडा आगे भक्ति की धरा में उस भाव को बढ़ा देने के लिए लिखी हैं . वन्दना जी के लिए तो खैर हैं ही . अपनी soulmate ढूँढने के आखिरी प्रयासों में ये कविता लिखी हैं की उसे अकल आये और वो मेरी जिंदगी में आये किसी बहाने से . और अब असली प्रार्थना उस माता जी से जो दो महीने से मेरी बात सुन नहीं रही हैं क्योंकि ये कविता असल में उन्ही को पूरी समझ आएगी और मुझे भरोसा हैं की एक बार फिर से वो मेरे जीवन में आएँगी अपने पतिदेव को ढूँढने के लिए . अगर मिल गया हो तो भी बता दे . आजकल स्पिरिचुअल माहौल में बड़े बदलाव हो गए इसीलिए मजबूरी में मुझे कुछ बताना पड़ रहा हैं . पर ये सदा नहीं रहेगा और सृष्टि वापस एक बार रिसेट मोड में जाएगी . आशा हैं जिनके लिए लिखी गयी हैं वो मेल करेगी क्योंकि बहुत समय से रहस्य अपने अन्दर रखने से प्रोब्लम सहन नहीं हो रही हैं . बाकि सभी लोग एन्जॉय करे एक नोर्मल कविता की तरह कि वह क्या लिखा हैं वीरेन्द्र ने .
मै फिर तुम्हे कहता हू
दर्द तुम्हारा भी खुद सहता हू
उस कृष्ण कि ना बस तुम बात करो
उसके लिए ना तुम अपनी काली रात करो
भक्ति कि दुनिया का वो सबसे बड़ा दाग हैं
फोड़ दिए जिसने मेरी गोपियों के भाग हैं
छीन कर मेरे होठो कि हंसी जो दर्द सारे अपने दे गया
सपनो से भरी मेरी आँखों में जो बहते आंसू दे गया
मेरी आत्मा को जो सबमे बसाकर टुकडो में मुझे बाँट गया
कुरेद कर मेरे जख्मो को उन पर नमक छांट गया
उसी कृष्ण की तू क्यों इतनी दीवानी हैं
पाकर जिसे अच्छे अच्छो की जिन्दगी वीरानी हैं
मेरे आंसुओ का मै तुम्हे अब भी वास्ता देता हू
उसकी दुनिया से जाने को सीधा रास्ता बता देता हू
प्राणों से बसी उसकी यादो को बस तुम सदा के लिए भूल जाओ
चुपचाप सोने की कोशिश करो ना वृन्दावन की धूल खाओ
अगर ऐसा ना कर पाई तो मेरी तरह कही की ना रहोगी
फूलो से डरने वाली तुम दर्द के कांटे बता कैसे सहोगी
तेरे सारे सवालो का जवाब मै चुप रहकर दे देता हूँ
तेरे मौन व्यंग्यो को मै चीख चीख कर ले लेता हूँ
मेरी भक्ति बस तेरा प्यार फिर क्यों मुझे खींच नहीं लेती
किस्मत तेरे सामने हैं फिर क्यों मुट्ठी में भींच नहीं लेती
संदेह क्यों करती हैं जब विश्व का पूरा रहस्य तेरे सामने हैं
आत्मा तू जिसकी हैं उस पर अविश्वास के क्या मायने हैं
सिर्फ और सिर्फ उसका हो जाना तेरा प्रारब्ध हैं
पूछ अपनी सांसो से क्या ये नए जीवन का आरंभ हैं
बिना शर्तो के जो कृष्ण को मजबूर कर गया
उस वीरेन के हिस्से का सारा सुख क्यों मर गया
दुनिया अपने हिसाब से तोलेगी क्योंकि पुराने सारे तराजू हैं
मेरे ज्ञान समझ को जो उठा पाए ऐसे ना किसी के बुद्धि में बाजू हैं
जितनी जल्दी हो सके अपने जीवन की दिशा तय करके रहो
देर अगर हो गयी तो शायद माफ़ी मांगने लायक भी ना रहो
सच ये कि अँधेरी रात को मिटाने जैसे कोई सूरज उगता हैं
झूठ बोलती तेरी बुद्धि जो वीरेन तुझे पागल लगता हैं
मै फिर तुम्हे कहता हू
दर्द तुम्हारा भी खुद सहता हू
उस कृष्ण कि ना बस तुम बात करो
उसके लिए ना तुम अपनी काली रात करो
भक्ति कि दुनिया का वो सबसे बड़ा दाग हैं
फोड़ दिए जिसने मेरी गोपियों के भाग हैं
छीन कर मेरे होठो कि हंसी जो दर्द सारे अपने दे गया
सपनो से भरी मेरी आँखों में जो बहते आंसू दे गया
मेरी आत्मा को जो सबमे बसाकर टुकडो में मुझे बाँट गया
कुरेद कर मेरे जख्मो को उन पर नमक छांट गया
उसी कृष्ण की तू क्यों इतनी दीवानी हैं
पाकर जिसे अच्छे अच्छो की जिन्दगी वीरानी हैं
मेरे आंसुओ का मै तुम्हे अब भी वास्ता देता हू
उसकी दुनिया से जाने को सीधा रास्ता बता देता हू
प्राणों से बसी उसकी यादो को बस तुम सदा के लिए भूल जाओ
चुपचाप सोने की कोशिश करो ना वृन्दावन की धूल खाओ
अगर ऐसा ना कर पाई तो मेरी तरह कही की ना रहोगी
फूलो से डरने वाली तुम दर्द के कांटे बता कैसे सहोगी
तेरे सारे सवालो का जवाब मै चुप रहकर दे देता हूँ
तेरे मौन व्यंग्यो को मै चीख चीख कर ले लेता हूँ
मेरी भक्ति बस तेरा प्यार फिर क्यों मुझे खींच नहीं लेती
किस्मत तेरे सामने हैं फिर क्यों मुट्ठी में भींच नहीं लेती
संदेह क्यों करती हैं जब विश्व का पूरा रहस्य तेरे सामने हैं
आत्मा तू जिसकी हैं उस पर अविश्वास के क्या मायने हैं
सिर्फ और सिर्फ उसका हो जाना तेरा प्रारब्ध हैं
पूछ अपनी सांसो से क्या ये नए जीवन का आरंभ हैं
बिना शर्तो के जो कृष्ण को मजबूर कर गया
उस वीरेन के हिस्से का सारा सुख क्यों मर गया
दुनिया अपने हिसाब से तोलेगी क्योंकि पुराने सारे तराजू हैं
मेरे ज्ञान समझ को जो उठा पाए ऐसे ना किसी के बुद्धि में बाजू हैं
जितनी जल्दी हो सके अपने जीवन की दिशा तय करके रहो
देर अगर हो गयी तो शायद माफ़ी मांगने लायक भी ना रहो
सच ये कि अँधेरी रात को मिटाने जैसे कोई सूरज उगता हैं
झूठ बोलती तेरी बुद्धि जो वीरेन तुझे पागल लगता हैं
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
प्यार ( soulmate ) पर लिखी एक ईश्वर प्रेरित कविता
बीच में समय नहीं मिला , वैसे मिल भी जाता तो क्या होता एक खस्सी सी कविता ही लिख देता जिसे मेरे अलावाएक दो लोग पढ़ लेते । ईश्वरीय प्रेम एक वरदान हैं , उसे soulmate concept से जोड़कर एक कविता बनायीं हैं । आशा हैं आपको अच्छी लगेगी ।
राधा सीता या मीरा जैसी ना कोई आराधक चाहिए
लैला हीर जूलियट जैसी के गीत भी क्या गाईये
आधुनिक फिल्मो की भी ना दास्ताँ होगी
शायद मेरी प्रेमिका कुछ ऐसी होगी
जिसके आंसू भी मेरी आँखों से बह जाये
बोल उसके हो और होंठ मेरे कह जाये
जब प्यार करू उसको तो मर्यादा बह जाये
ब्रह्मचर्य की बात नहीं बस गोपिभाव रह जाये
जिसके हिस्से के दुःख मेरी किस्मत बन गयी हो
दू अब उसको पूर्ण भक्ति जो वासना में भी लुट गयी हो
धोखा जिसे सारे जहाँ से मिलता रहता हो
बहुत बुरी गालिया जिसका दिल सदा सहता हो
भाव की उलझनों में खोयी हुई वो पागल बहुत प्यारी हो
अपने जीवन में सारी उम्मीदे वो खो चुकी सारी हो
तब कही से उसके भाग्य का भास्कर बनकर आऊंगा
छुपी हुई उसकी प्रेमाभक्ति तब कृष्ण से मांग लाऊंगा
बिन फेरे ही वो अर्धांगिनी बनकर जी लेगी
दुनिया जिसकी बस एक झलक देखने को तरसेगी
दहेज़ में जो बस मुझे खोयी हुई अमानत देगी
पुण्य से भरी उसकी झोली परिवार में खुशिया भर देगी
सारे जीवन का वो आधार उसके कदम बड़े शुभ होंगे
सबको सुलभ रही पर फिर देवताओ को भी दर्शन दुर्लभ होंगे
वही तो प्रेरणा बनी सारे नए इतिहास लिखने को
बाल्मीकि या तुलसीदास के नए ग्रन्थ की रचना करने को
जहा वो मौत मांगती थी वहा से जीवन की शुरुवात होगी
उन्ही गलत कदमो से तो उसके सही होने की बात होगी
तब खुलेगा एक नए युग के राज का परदा
जैसे पूर्णब्रह्म जन्म लेता हैं यदा यदा
बहुत समय हो चला है
जिन्दगी को बर्बाद होते होते
अपनी आत्मा के उस टुकडे को बस प्रभु अब मिला दो
गुरुमंत्र बापूजी आपका दिया हैं बस कृपापात्र बना दो
नयी धर्म कि एक परिभाषा लिखने का वक्त आया हैं
बापूजी , सरल और चरम बिंदु का मिलना ईश्वर को भाया हैं
कुछ कुछ आकाशवाणी जैसा हो जाने का प्रारब्ध हैं
अद्भुत संयोग हो जाने का बस एक दौर आरंभ हैं
पिता हो या परमपिता हो अब तो सब मिल ही सकते हैं
दीपक को भले तरस जाये पर सूरज उसके चमक सकते हैं
राधा सीता या मीरा जैसी ना कोई आराधक चाहिए
लैला हीर जूलियट जैसी के गीत भी क्या गाईये
आधुनिक फिल्मो की भी ना दास्ताँ होगी
शायद मेरी प्रेमिका कुछ ऐसी होगी
जिसके आंसू भी मेरी आँखों से बह जाये
बोल उसके हो और होंठ मेरे कह जाये
जब प्यार करू उसको तो मर्यादा बह जाये
ब्रह्मचर्य की बात नहीं बस गोपिभाव रह जाये
जिसके हिस्से के दुःख मेरी किस्मत बन गयी हो
दू अब उसको पूर्ण भक्ति जो वासना में भी लुट गयी हो
धोखा जिसे सारे जहाँ से मिलता रहता हो
बहुत बुरी गालिया जिसका दिल सदा सहता हो
भाव की उलझनों में खोयी हुई वो पागल बहुत प्यारी हो
अपने जीवन में सारी उम्मीदे वो खो चुकी सारी हो
तब कही से उसके भाग्य का भास्कर बनकर आऊंगा
छुपी हुई उसकी प्रेमाभक्ति तब कृष्ण से मांग लाऊंगा
बिन फेरे ही वो अर्धांगिनी बनकर जी लेगी
दुनिया जिसकी बस एक झलक देखने को तरसेगी
दहेज़ में जो बस मुझे खोयी हुई अमानत देगी
पुण्य से भरी उसकी झोली परिवार में खुशिया भर देगी
सारे जीवन का वो आधार उसके कदम बड़े शुभ होंगे
सबको सुलभ रही पर फिर देवताओ को भी दर्शन दुर्लभ होंगे
वही तो प्रेरणा बनी सारे नए इतिहास लिखने को
बाल्मीकि या तुलसीदास के नए ग्रन्थ की रचना करने को
जहा वो मौत मांगती थी वहा से जीवन की शुरुवात होगी
उन्ही गलत कदमो से तो उसके सही होने की बात होगी
तब खुलेगा एक नए युग के राज का परदा
जैसे पूर्णब्रह्म जन्म लेता हैं यदा यदा
बहुत समय हो चला है
जिन्दगी को बर्बाद होते होते
अपनी आत्मा के उस टुकडे को बस प्रभु अब मिला दो
गुरुमंत्र बापूजी आपका दिया हैं बस कृपापात्र बना दो
नयी धर्म कि एक परिभाषा लिखने का वक्त आया हैं
बापूजी , सरल और चरम बिंदु का मिलना ईश्वर को भाया हैं
कुछ कुछ आकाशवाणी जैसा हो जाने का प्रारब्ध हैं
अद्भुत संयोग हो जाने का बस एक दौर आरंभ हैं
पिता हो या परमपिता हो अब तो सब मिल ही सकते हैं
दीपक को भले तरस जाये पर सूरज उसके चमक सकते हैं
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
मेरी आध्यात्मिक समस्या ( spiritual problem ) पर एक कविता
काफी दिन हो गए थे कोई गंभीर सी कविता लिखे । जाहिर हैं अध्यात्म के लिए ही लिखी होगी क्योंकि कुछ चीज़े बीच में ऐसी घटती रहती हैं जो धर्म के विशिष्ट जनों से परामर्श के लिए जरुरी हो जाती हैं । कृपया ध्यान दे इस एक दुर्लभ कविता पर
जिंदगी मेरी किस दोराहे पर खड़ी हो गयी हैं
झूठी आशा में जीवन की खुशिया खो गयी हैं
मेरी नस नस रोम रोम में एक उम्मीद जिन्दा हैं
व्यवहार का वो मेरा अक्स जिस पर शर्मिंदा हैं
मेरे इष्टदेव मुझे सपनो में जब आकर कह जायेंगे
दुखती मेरी रग रग जब वो छू कर सहलायेंगे
मेरे गुरु या इष्टदेव सिर्फ एक बार तो सहारा दे जाते
पहले ही इतना टूट चुका हूँ इतनी अग्नि परीक्षा ना करवाते
मैं ये तो था ही नहीं जो अलग वेश धारण किया था
परमभक्ति का अधिकारी कैसी वासना का नरक जिया था
सिर्फ ईश्वर कि आँखों का ही मुझे सहारा था
अक्स अपना कुछ उसने हमसाये में उतारा था
अध्यात्म की कुछ कडियों का ही बस नज़ारा था
बुरे दौर में मन के अपराध बोध को जिसने संवारा था
ये क्या हैं क्यों हैं जिंदगी कैसी पहेली बन गयी हैं
एक बुरी किस्मत अब जैसे मेरी सहेली सी हुई हैं
रातो के जागने कि अब गिनतिया भूल गया हैं
रुठती धर्म कि पगडंडियों पर भी झूल गया हु
क्या होगा अगर मुझे कोई योग भ्रष्ट का दाग लगा देगा
शरण किसकी मांगू जब शिव सा सरल भी मुझे भगा देगा
गुरु को तो सब पता हैं मेरी लाचारी तो वो हमेशा जानते हैं
मै कही का नहीं रहा फिर क्यों वो मुझे अब भी समर्थ मानते हैं
ज्योतिषियो की बात क्या मानू जब संकल्प से सब बदल सकता हूँ
सिर्फ अगर स्वार्थी हो जाऊ तो दुनिया का मुकद्दर बन सकता हूँ
पर यही तो वो अच्छाई हैं मेरी और मेरा जोर नहीं
दुसरे चाहे मुझसे सब छीन ले पर मैं कभी चोर नहीं
उस देवी के भी तो चरणों में गिरकर देख चुका हूँ
नाक रगड़ रगड़ कर कितनी बार उसके दर से उठा हूँ
क्या मैं इतना नीच हु की मुझे माफ़ ही नहीं किया जायेगा
क्या मैं इतनी दूर हू की कोई पार्षद ना मुझ तक हांका जायेगा
अपनी तरफ से तो हमेशा ही मजबूर होने की दुहाई देता हैं
बहन बेटी माँ दोस्त मानकर सारी उसकी बलाए लेता हू
क्या फिर भी मै कोई पाप की आंधी को जी लेता हू
कही कोई भगवान् नहीं बस एक बार तसल्ली से रो लेता हूँ
वो किसी की अभी अमानत क्या पता कभी मेरी होगी
आचार संहिता की कैसी नैतिक बातें जो हमारी जान लेंगी
कुदरत के सारे धर्म नयी परिभाषा मांगते हैं
समर्थ तो हूँ मैं पर जाने क्यों मेरे हाथ कांपते हैं
शायद कही अपने स्वार्थी होने का डर हैं
पक्षपाती होने का दाग लग जाने की मुझे फिकर हैं
जब खुद ही मै न्यायधीश बन गया हू
गवाही देने को तो फिर ना रह ही गया हूँ
प्रभु आपका बेटा हूँ बस अब स्वीकार लो
सारा कुछ तेरा किया धरा मेरा दुःख काट दो
फिर से वो ही भक्ति की धारा में लौटा दो
उस महान शिष्य की चेतना का पर्दा हटा लो
चाहे कुछ भी हो इस जन्म में भी उसे मिला दो
वीरेन सच्चा साधक हैं ये बस दुनिया में गूंजा दो
पूर्ण ब्रह्म का वो पथिक उस महान लड़की को पा जाए
पुरे सारे जहाँ को ये अनमोल रिश्ता दिल से भा जाये
विष्णु लक्ष्मी के बेटे बहु की वो पहली जोड़ी बन जाये
दुनिया के संकट के बदलो का अँधेरा अब छट जाये
ऐसा भी क्या कभी किसी के साथ अजब संयोग होता हैं
पूरी दुनिया के मालिक का बेटा क्या एक लड़की के लिए रोता हैं
अंतर्यामी एक जीव क्यों अपने स्वार्थ के लिए ना ईमान खोता हैं
त्रिदेव और सारे देवता जिस उलझन को सुलझा ना सके
मेरे ये कैसे आयाम जो सब मिलकर मुझे ना हरा सके
फिर भी मेरे अपने धर्म को सारे ग्रन्थ ना मिटा सके
मेरे अलावा कौन था जो इसे स्पिरिचुअल प्रोब्लम बता सके
ना अपना कोई लाभ ना भविष्य दिख रहा हैं
ऊपर बैठा कृष्ण मेरे लिए क्या क्या रच रहा हैं
दिल टूटा आत्मा लुप्त और दिमाग का कुछ ठिकाना नहीं
बिना स्वार्थ के लुट बैठा अब "वीरेन " सयाना नहीं
जिंदगी मेरी किस दोराहे पर खड़ी हो गयी हैं
झूठी आशा में जीवन की खुशिया खो गयी हैं
मेरी नस नस रोम रोम में एक उम्मीद जिन्दा हैं
व्यवहार का वो मेरा अक्स जिस पर शर्मिंदा हैं
मेरे इष्टदेव मुझे सपनो में जब आकर कह जायेंगे
दुखती मेरी रग रग जब वो छू कर सहलायेंगे
मेरे गुरु या इष्टदेव सिर्फ एक बार तो सहारा दे जाते
पहले ही इतना टूट चुका हूँ इतनी अग्नि परीक्षा ना करवाते
मैं ये तो था ही नहीं जो अलग वेश धारण किया था
परमभक्ति का अधिकारी कैसी वासना का नरक जिया था
सिर्फ ईश्वर कि आँखों का ही मुझे सहारा था
अक्स अपना कुछ उसने हमसाये में उतारा था
अध्यात्म की कुछ कडियों का ही बस नज़ारा था
बुरे दौर में मन के अपराध बोध को जिसने संवारा था
ये क्या हैं क्यों हैं जिंदगी कैसी पहेली बन गयी हैं
एक बुरी किस्मत अब जैसे मेरी सहेली सी हुई हैं
रातो के जागने कि अब गिनतिया भूल गया हैं
रुठती धर्म कि पगडंडियों पर भी झूल गया हु
क्या होगा अगर मुझे कोई योग भ्रष्ट का दाग लगा देगा
शरण किसकी मांगू जब शिव सा सरल भी मुझे भगा देगा
गुरु को तो सब पता हैं मेरी लाचारी तो वो हमेशा जानते हैं
मै कही का नहीं रहा फिर क्यों वो मुझे अब भी समर्थ मानते हैं
ज्योतिषियो की बात क्या मानू जब संकल्प से सब बदल सकता हूँ
सिर्फ अगर स्वार्थी हो जाऊ तो दुनिया का मुकद्दर बन सकता हूँ
पर यही तो वो अच्छाई हैं मेरी और मेरा जोर नहीं
दुसरे चाहे मुझसे सब छीन ले पर मैं कभी चोर नहीं
उस देवी के भी तो चरणों में गिरकर देख चुका हूँ
नाक रगड़ रगड़ कर कितनी बार उसके दर से उठा हूँ
क्या मैं इतना नीच हु की मुझे माफ़ ही नहीं किया जायेगा
क्या मैं इतनी दूर हू की कोई पार्षद ना मुझ तक हांका जायेगा
अपनी तरफ से तो हमेशा ही मजबूर होने की दुहाई देता हैं
बहन बेटी माँ दोस्त मानकर सारी उसकी बलाए लेता हू
क्या फिर भी मै कोई पाप की आंधी को जी लेता हू
कही कोई भगवान् नहीं बस एक बार तसल्ली से रो लेता हूँ
वो किसी की अभी अमानत क्या पता कभी मेरी होगी
आचार संहिता की कैसी नैतिक बातें जो हमारी जान लेंगी
कुदरत के सारे धर्म नयी परिभाषा मांगते हैं
समर्थ तो हूँ मैं पर जाने क्यों मेरे हाथ कांपते हैं
शायद कही अपने स्वार्थी होने का डर हैं
पक्षपाती होने का दाग लग जाने की मुझे फिकर हैं
जब खुद ही मै न्यायधीश बन गया हू
गवाही देने को तो फिर ना रह ही गया हूँ
प्रभु आपका बेटा हूँ बस अब स्वीकार लो
सारा कुछ तेरा किया धरा मेरा दुःख काट दो
फिर से वो ही भक्ति की धारा में लौटा दो
उस महान शिष्य की चेतना का पर्दा हटा लो
चाहे कुछ भी हो इस जन्म में भी उसे मिला दो
वीरेन सच्चा साधक हैं ये बस दुनिया में गूंजा दो
पूर्ण ब्रह्म का वो पथिक उस महान लड़की को पा जाए
पुरे सारे जहाँ को ये अनमोल रिश्ता दिल से भा जाये
विष्णु लक्ष्मी के बेटे बहु की वो पहली जोड़ी बन जाये
दुनिया के संकट के बदलो का अँधेरा अब छट जाये
ऐसा भी क्या कभी किसी के साथ अजब संयोग होता हैं
पूरी दुनिया के मालिक का बेटा क्या एक लड़की के लिए रोता हैं
अंतर्यामी एक जीव क्यों अपने स्वार्थ के लिए ना ईमान खोता हैं
त्रिदेव और सारे देवता जिस उलझन को सुलझा ना सके
मेरे ये कैसे आयाम जो सब मिलकर मुझे ना हरा सके
फिर भी मेरे अपने धर्म को सारे ग्रन्थ ना मिटा सके
मेरे अलावा कौन था जो इसे स्पिरिचुअल प्रोब्लम बता सके
ना अपना कोई लाभ ना भविष्य दिख रहा हैं
ऊपर बैठा कृष्ण मेरे लिए क्या क्या रच रहा हैं
दिल टूटा आत्मा लुप्त और दिमाग का कुछ ठिकाना नहीं
बिना स्वार्थ के लुट बैठा अब "वीरेन " सयाना नहीं
बुधवार, 20 अक्टूबर 2010
कृष्ण प्रेमाभक्ति को समर्पित एक कविता
यह कविता वैसे एक कृष्ण भक्त साधक को समर्पित हैं । असल में में मैंने एक कथा के वीडियो में उनकी अति दुर्लभ छवि देखि जिसे देखकर सहज ही मन उन्हें प्रणाम करने का हो आया. आशा हैं आप लोगो को मेरे भाव अच्छे लगेंगे जो उनकी भक्ति को समर्पित हो. वैसे भी कृष्ण भक्तो का गुणगान करने का पुण्य बहुत होता हैं और मै इस तरह में पुण्य कमाने में उस्ताद हूँ .
भक्ति में डूबी वो कैसी लड़की हरिभक्तानी थी
मेरे मन को भायी गोपिभाव में डूबी देवांगी थी
उसके चरणों में मर ही जाने का मन करता था
कहीं का नहीं रहा मैं जीने से अब डरता था
घोर कलयुग में भी ऐसे जीव रहते हैं
कृष्ण प्रेम के दिव्य कण जिनके हृदय में बहते हैं
सतत आंसू क्यों ना ऐसे प्रेम पर बहते जाये
अथक मेरे बोल क्यों ना कविता कहते जाये
परम भक्त होने का ये कैसा दर्द सहते आये
सदा सदा हम किशोरी जी के चरणों में रहते आये
इसीलिए कभी हरिभक्तो को आंकना नहीं चाहिए
कृत्रिम प्रकाश नहीं आंसुओ से जलता हृदय चाहिए
तब समझेंगे कि कथा का क्या अर्थ होता हैं
फिर कहेंगे कि क्यों जीव थोथे कर्म ढोता हैं
बिछुड़ी गोलोक धाम की किसी पार्षद की बानगी लगी
अपने प्रिय कृष्ण से एकतरफा भक्ति में दीवानी जगी
क्या प्रेमाभक्ति इतना पागल बना देती हैं
देकर सारा दुःख वो चैन सारा छीन लेती हैं
भक्ति जैसा कुछ ईश्वर को प्यारा आयाम नहीं
राधा मीरा जैसा परम जीव मिल जाये बस कही
तो कृष्ण भी दर्शन पाकर धन्य हो जाता हैं
तभी विरह का हर गीत "वीरेन " गाता हैं
भक्ति में डूबी वो कैसी लड़की हरिभक्तानी थी
मेरे मन को भायी गोपिभाव में डूबी देवांगी थी
उसके चरणों में मर ही जाने का मन करता था
कहीं का नहीं रहा मैं जीने से अब डरता था
घोर कलयुग में भी ऐसे जीव रहते हैं
कृष्ण प्रेम के दिव्य कण जिनके हृदय में बहते हैं
सतत आंसू क्यों ना ऐसे प्रेम पर बहते जाये
अथक मेरे बोल क्यों ना कविता कहते जाये
परम भक्त होने का ये कैसा दर्द सहते आये
सदा सदा हम किशोरी जी के चरणों में रहते आये
इसीलिए कभी हरिभक्तो को आंकना नहीं चाहिए
कृत्रिम प्रकाश नहीं आंसुओ से जलता हृदय चाहिए
तब समझेंगे कि कथा का क्या अर्थ होता हैं
फिर कहेंगे कि क्यों जीव थोथे कर्म ढोता हैं
बिछुड़ी गोलोक धाम की किसी पार्षद की बानगी लगी
अपने प्रिय कृष्ण से एकतरफा भक्ति में दीवानी जगी
क्या प्रेमाभक्ति इतना पागल बना देती हैं
देकर सारा दुःख वो चैन सारा छीन लेती हैं
भक्ति जैसा कुछ ईश्वर को प्यारा आयाम नहीं
राधा मीरा जैसा परम जीव मिल जाये बस कही
तो कृष्ण भी दर्शन पाकर धन्य हो जाता हैं
तभी विरह का हर गीत "वीरेन " गाता हैं
मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010
भाव दर्शन और निवारण - एक कविता
गुरुदेव दया कर दो की अब मै इस कविता के भाव को पुर्णतः दिव्य बनाकर इसमें आपकी दीक्षा से आई समझ से अलौकिक बनाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर सकू. जो भी लिखा जायेगा वो आपकी दया होगी . सब आपका दिया हुआ हैं . पर मेरी नासमझी गलतिया करा देती हैं . फिर भी बापूजी मै आपके शरणागत हूँ . यह आध्यात्मिक कविता किसी व्यक्ति विशेष के उत्तर में हैं कोई मनोरजन के लिए नहीं . वो सूचित कर दे कि उनका मुद्दा सुलझा कि नहीं . बाकि सभी ज्ञान भक्ति से साधको से निवेदन हैं कि त्रुटी बता दे , आपके श्री चरणों में नमन .
मेंरी नजरो में देखो तो यही रूप सर्वोत्तम हैं ,
परमपुरुष शिव के भी इष्ट मर्यादा पुरुषोतम हैं
दोनों भेदों से पार गुरु का निर्गुण अहम् हैं
चरम बिंदु हो या लघु वीरेन उसे दोनों सहन हैं
अपना ही हमसाया सबमे फिर परिवार की बात कहा रही
माता पिता भाई बहन नहीं बस दुनिया एक नदी की धार बही
पूर्णब्रह्म हैं गुरु वो पूरा प्रेम भी जानते हैं
पर हमारी ख़ुशी के लिए कभी कभी व्यवहार मानते हैं
नहीं तो हम गलत मतलब भी समझ जायेंगे
और मनमाने अर्थो से अपना ही अनर्थ कर जायेंगे
उनका गुरु बन जाना हमारा ही स्वार्थ हैं
बापूजी का जन्म तो ईश्वर प्रार्थना का परमार्थ हैं
रघुबीर की इच्छा से ही हनुमान का अंतस हिला होगा
सूक्ष्म रूप से ना शायद ना सीता का पता मिला होगा
पूरब पश्चिप की बात क्या प्रेमाभक्ति तो दिशाओ से भी पार हैं
पूर्ण सरलता के लिए तो ज्ञान भी एक पक्की दीवार हैं
बस शरणागति का एक राजमार्ग सब धर्मो का सार हैं
बड़ी बड़ी ज्ञान की बाते तो गोपियों के लिए बस भार हैं
सबको कृष्ण जी मिले तो भी राधा का दिल ना टूटेगा
वो कृष्ण की चेतना हैं उसका प्यार अलग हो तो ही बंटेगा
राम के विरह से भरत में उपजी वो द्वापर के विरह की छवि हैं
सच्चे प्रेम का एक आराधक क्या "वीरेन " भी कोई कवि हैं
जो तुने सहा वो तेरी साधना के अंतिम पड़ाव में था
तू किसी को दोष ना दे तेरा हमसाया किसी छलाव में था
वृक्ष की जड़ और शाखाये सच्चे प्रेमी होने की निशानी हैं
उनकी एक गाड़ी के दो पहिये की बात ना मैंने कभी मानी हैं
वो कभी एक जैसे होते ही नहीं सम्पूरक होते हैं
या वो दोनों स्त्री पुरुष या दोनों नपुंसक होते हैं
बस यही था "गे " या "लेस्बियन" का व्यभिचार
मेरी इन गूढ़ बातो को तुम कर लेना स्वीकार
पर ये सब एक क्षणिक अवसाद से आया तुझमे विचार था
त्रिदेवो तक को खंडित किया जिसने वो मन का व्यभिचार था
गुरुत्व तो चेतना की धुरी हैं
विधा ज्ञान और भक्ति हर बार उनसे ही जुडी हैं
वो कृष्ण और राम से उपजे परमहंस हैं
कलयुग मानस में उपजे संतो के राजहंस हैं
उनसा निराला कभी हुआ ना हो सकता हैं
विश्वगुरु बनाना उनका नहीं ईश्वर का स्वार्थ हो सकता हैं
कोई कही जन्मे या मरे हमें ना व्यवहार में पड़ना हैं
ईश्वर खुद कर्म काट दे और झाड़ दे जो झड़ना हैं
बापूजी के वचनों ने ही तो हमेशा राह दिखाई हैं
वर्ना ज्ञान ने तो हमेशा ही नौका डुबाई हैं
शिष्य होने पर भी कहाँ उन्होंने बंधन लादे हैं
हममे ही कमी हैं जो उनके सामने से भागे हैं
इस जन्म का सारे जन्मो से जिन्होंने मुझे पार किया
वही मेरे बापू हैं जिन्होंने बस अपना मुझे स्वीकार किया
फिर भी बहन अपने फायदे के लिए पढ़ ले जो पढना हैं
सिर्फ तेरी मदद के लिए आया और क्या "वीरेन" ने काव्य गढ़ना हैं
मेंरी नजरो में देखो तो यही रूप सर्वोत्तम हैं ,
परमपुरुष शिव के भी इष्ट मर्यादा पुरुषोतम हैं
दोनों भेदों से पार गुरु का निर्गुण अहम् हैं
चरम बिंदु हो या लघु वीरेन उसे दोनों सहन हैं
अपना ही हमसाया सबमे फिर परिवार की बात कहा रही
माता पिता भाई बहन नहीं बस दुनिया एक नदी की धार बही
पूर्णब्रह्म हैं गुरु वो पूरा प्रेम भी जानते हैं
पर हमारी ख़ुशी के लिए कभी कभी व्यवहार मानते हैं
नहीं तो हम गलत मतलब भी समझ जायेंगे
और मनमाने अर्थो से अपना ही अनर्थ कर जायेंगे
उनका गुरु बन जाना हमारा ही स्वार्थ हैं
बापूजी का जन्म तो ईश्वर प्रार्थना का परमार्थ हैं
रघुबीर की इच्छा से ही हनुमान का अंतस हिला होगा
सूक्ष्म रूप से ना शायद ना सीता का पता मिला होगा
पूरब पश्चिप की बात क्या प्रेमाभक्ति तो दिशाओ से भी पार हैं
पूर्ण सरलता के लिए तो ज्ञान भी एक पक्की दीवार हैं
बस शरणागति का एक राजमार्ग सब धर्मो का सार हैं
बड़ी बड़ी ज्ञान की बाते तो गोपियों के लिए बस भार हैं
सबको कृष्ण जी मिले तो भी राधा का दिल ना टूटेगा
वो कृष्ण की चेतना हैं उसका प्यार अलग हो तो ही बंटेगा
राम के विरह से भरत में उपजी वो द्वापर के विरह की छवि हैं
सच्चे प्रेम का एक आराधक क्या "वीरेन " भी कोई कवि हैं
जो तुने सहा वो तेरी साधना के अंतिम पड़ाव में था
तू किसी को दोष ना दे तेरा हमसाया किसी छलाव में था
वृक्ष की जड़ और शाखाये सच्चे प्रेमी होने की निशानी हैं
उनकी एक गाड़ी के दो पहिये की बात ना मैंने कभी मानी हैं
वो कभी एक जैसे होते ही नहीं सम्पूरक होते हैं
या वो दोनों स्त्री पुरुष या दोनों नपुंसक होते हैं
बस यही था "गे " या "लेस्बियन" का व्यभिचार
मेरी इन गूढ़ बातो को तुम कर लेना स्वीकार
पर ये सब एक क्षणिक अवसाद से आया तुझमे विचार था
त्रिदेवो तक को खंडित किया जिसने वो मन का व्यभिचार था
गुरुत्व तो चेतना की धुरी हैं
विधा ज्ञान और भक्ति हर बार उनसे ही जुडी हैं
वो कृष्ण और राम से उपजे परमहंस हैं
कलयुग मानस में उपजे संतो के राजहंस हैं
उनसा निराला कभी हुआ ना हो सकता हैं
विश्वगुरु बनाना उनका नहीं ईश्वर का स्वार्थ हो सकता हैं
कोई कही जन्मे या मरे हमें ना व्यवहार में पड़ना हैं
ईश्वर खुद कर्म काट दे और झाड़ दे जो झड़ना हैं
बापूजी के वचनों ने ही तो हमेशा राह दिखाई हैं
वर्ना ज्ञान ने तो हमेशा ही नौका डुबाई हैं
शिष्य होने पर भी कहाँ उन्होंने बंधन लादे हैं
हममे ही कमी हैं जो उनके सामने से भागे हैं
इस जन्म का सारे जन्मो से जिन्होंने मुझे पार किया
वही मेरे बापू हैं जिन्होंने बस अपना मुझे स्वीकार किया
फिर भी बहन अपने फायदे के लिए पढ़ ले जो पढना हैं
सिर्फ तेरी मदद के लिए आया और क्या "वीरेन" ने काव्य गढ़ना हैं
रविवार, 3 अक्टूबर 2010
ईश्वर और हमसाया ( soulmate ) को समर्पित कविता
यह कविता बहुत ही दुर्लभ हैं , सारे भाव ईश्वर प्राप्त साधको के हैं । अपने जीवन के अनुभव के तौर पर लिखी हैं । सबको समझ नहीं भी आ सकती हैं । जिस जिस को जितना समझ आएगा वो बस ईश्वर के लिए तरस जायेगा । बस फिर भी आप मुझे मेल करके पूछ सकते हैं या ब्लॉग पर कमेन्ट करके ।
राधा के विरह से उपजा मै प्रेम का अहंकार
नहीं होने का भाव को जिसने कर लिया स्वीकार
जब हैं ही नहीं तो फिर किसकी सत्ता बनकर आया हैं
कृष्ण तो था नहीं फिर किस परम पुरुष का हमसाया हैं
शिवत्व को पाने में अब पार्वती भी लाचार हो गयी हैं
सूर्य किरण के पुण्य से अब दीपक की लौ बुझ गयी हैं
वैष्णवी को किसी और के हवाले किया गया था
कल्कि सा हमसाया जब उसके द्वार ना दिया गया था
अब समय और आत्माए मिलने का वक्त आ गया हैं
विश्वगुरु बनने का संकल्प उन संत को भा गया हैं
ब्रह्मज्ञान की विधा अभी सर्वोपरि ही बताई जाएगी
परन्तु भक्ति की ऊँचाई तक ना भावनाए लायी जाएगी
उद्धव का पश्चाताप पूरा होने का समय आ गया हैं
गोपिभाव में क्योंकि वो पूरा नहा गया हैं
कृष्ण के अहम् से अब वो कभी अंगीकार नहीं होगा
अद्वैत को पाया मै अब फिर द्वैत को ही भज लेगा
सगुण सारे निर्गुण हरि से भी पार की बात हैं
ज्ञान का उजाला नहीं भक्ति प्यार की रात हैं
शरणागति से उपजी ये कैसी करामात हैं
गले मिलते बापूजी के दस्तखत आत्मसात हैं
अब मेरे सारे संकल्प पूर्ण में मिलने जा रहे हैं
चरम बिंदु जो अब ज्ञान के मिटने आ रहे हैं
बहुत बहुत सहे वो विरह के पल उसमे समां जायेंगे
क्या प्रभु मेनका के अंग विश्वामित्र में वफ़ा पाएंगे
ब्रह्मचर्य हो या व्यभिचारी चाहे समय का ही कसूर हो
क्यों अहम् या ग्लानी जब माया तक का ही दस्तूर हो
भक्ति तो इससे आगे के द्वार खोलती हैं
हमसाये में ईश्वर का जब वो अहम् झोंकती हैं
तभी तो एक आत्मा दो शरीरो से वही बोलती हैं
अवचेतन मन की वो बाते कैसे राज खोलती हैं
अच्छा भला या बुरा हो एक भाव भी इधर से उधर नहीं
जो मैंने कहा वो अंतर मन का स्वर्ग कोई बाह्य नरक नहीं
देर से ही सही पर मूल फायदे में पड़ा कुछ फरक नहीं
एक तरफ़ा प्यार में होगा "वीरेन" का बेडा गरक नहीं
राधा के विरह से उपजा मै प्रेम का अहंकार
नहीं होने का भाव को जिसने कर लिया स्वीकार
जब हैं ही नहीं तो फिर किसकी सत्ता बनकर आया हैं
कृष्ण तो था नहीं फिर किस परम पुरुष का हमसाया हैं
शिवत्व को पाने में अब पार्वती भी लाचार हो गयी हैं
सूर्य किरण के पुण्य से अब दीपक की लौ बुझ गयी हैं
वैष्णवी को किसी और के हवाले किया गया था
कल्कि सा हमसाया जब उसके द्वार ना दिया गया था
अब समय और आत्माए मिलने का वक्त आ गया हैं
विश्वगुरु बनने का संकल्प उन संत को भा गया हैं
ब्रह्मज्ञान की विधा अभी सर्वोपरि ही बताई जाएगी
परन्तु भक्ति की ऊँचाई तक ना भावनाए लायी जाएगी
उद्धव का पश्चाताप पूरा होने का समय आ गया हैं
गोपिभाव में क्योंकि वो पूरा नहा गया हैं
कृष्ण के अहम् से अब वो कभी अंगीकार नहीं होगा
अद्वैत को पाया मै अब फिर द्वैत को ही भज लेगा
सगुण सारे निर्गुण हरि से भी पार की बात हैं
ज्ञान का उजाला नहीं भक्ति प्यार की रात हैं
शरणागति से उपजी ये कैसी करामात हैं
गले मिलते बापूजी के दस्तखत आत्मसात हैं
अब मेरे सारे संकल्प पूर्ण में मिलने जा रहे हैं
चरम बिंदु जो अब ज्ञान के मिटने आ रहे हैं
बहुत बहुत सहे वो विरह के पल उसमे समां जायेंगे
क्या प्रभु मेनका के अंग विश्वामित्र में वफ़ा पाएंगे
ब्रह्मचर्य हो या व्यभिचारी चाहे समय का ही कसूर हो
क्यों अहम् या ग्लानी जब माया तक का ही दस्तूर हो
भक्ति तो इससे आगे के द्वार खोलती हैं
हमसाये में ईश्वर का जब वो अहम् झोंकती हैं
तभी तो एक आत्मा दो शरीरो से वही बोलती हैं
अवचेतन मन की वो बाते कैसे राज खोलती हैं
अच्छा भला या बुरा हो एक भाव भी इधर से उधर नहीं
जो मैंने कहा वो अंतर मन का स्वर्ग कोई बाह्य नरक नहीं
देर से ही सही पर मूल फायदे में पड़ा कुछ फरक नहीं
एक तरफ़ा प्यार में होगा "वीरेन" का बेडा गरक नहीं
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सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...
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सबसे पहले तो आप का धन्यवाद जो आपने अपना कीमती समय ख़राब करने की ठान ही ली हैं । दूसरा सरल कुमार जी बेचारे महत्वाकांक...