शीश पगा ना झगा तन पे ,जाने को आयो बसों एही ग्रामा
धोती फटीसी लटी लुपटी सी और पामन पाहन की नहीं सामा
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक रहयो चकी सो वसुधा अभिरामा
पूछत दीनदयाल को धाम बतावत आपनो नाम सुदामा
नाम सुदामा का सुनते ही तज आसन दौड़े द्वार की ओरा
मुकुट कहीं तो कही पट उलझा मिलने को व्याकुल जी ना थोरा
ऐसी उतावली हैं घट में जैसे बावली वायु का मस्त झकोरा
मित्र से भेंट को मित्र चले ज्यू धावत चाँद की और चकोरा
उधर सुदामा जी द्वार पर खड़े सोचते हैं कि शायद कृष्ण आयेंगे नहीं इसीलिए द्वार से वापिस आ जाते हैं । प्रष्ठभूमि में कृष्ण कि दशा वर्णन करता गीत उभरता हैं
कौतुहल धरे यही सब देख रहे सुध बुध खोके कृष्ण दौड़े कहाँ जाते हैं
उड़ के चले हैं पीछे मुड़ के ना देखे ,
लीला देखने वाले तो कुछ समझ ना पाते हैं
गिरते हैं पड़ते हैं फिर उठ चलते हैं द्वारपालों सभी दासिओं से टकराते हैं
कौन ये महत्वपूर्ण आ गया हैं द्वार पे अगुवानी करने को ऐसे अकुलाते हैं
दीनो के बंधू करुना के सिन्धु नैनों में लेकर के जल बिंदु
सारे नातो से बढ़ के एक नेह का नाता निभाने चले हैं
भ्रमण करे जो फूलों के रथ पे चल कर वो पथरीले पथ पे
नंगे पाँव जो आया उसको नंगे पाँव बुलाने चले हैं
दर्शन क़ी अभिलाषा खोके
जगत हसाई से व्याकुल होके
आस के टुकडे सुदामा संजो के
अश्रु में जीवन डुबाने चले हैं
प्रेम परीक्षा कि घडी आई मित्र के नाम की हो ना हंसाई
मित्र परायण कृष्ण कन्हाई रूठा मित्र मनाने चले हैं
जब प्रभु कृष्ण द्वार पे आते हैं तो सुदामा नहीं मिलते हैं तो कृष्ण फिर पीछे पीछे ढूँढने चले जाते हैं । आखिरकार वो सुदामा को ढूंढ ही लेते हैं और दोनों गले मिलते हैं जो काफी भावुक दृश्य हैं , पृष्ठभूमि का गीत ये हैं
बरसों के बिछड़े दो मीत आज सन्मुख हैं
नैनो में दर्शनों के याचना पवित्र हैं
मिलने की ललक भी मिलने में झिझक भी हैं
बालपन के साथियों की दशा कुछ विचित्र हैं
दोनो के नैनो में आसुओं के मोती हैं
मोतियों में बालपन कि मित्रता का चित्र हैं
छोटा बड़ा उंच नीच राजा रंक कोई नहीं
प्रेम की धरा मित्र केवल एक मित्र हैं
भाव भरी इस भेंट को देख रहा संसार
देखने वाले कर रहे कृष्ण की जय जयकार