हे हरि !!!!
मुझे लगता था कि आप मेरी प्रार्थना से शायद प्रसन्न हो जाएँगे और मेरे पाप क्षमा करके मुझे दर्शन देंगे । परन्तु अब इतने सालो के बाद अब मेरा हौंसला बिलकुल टूट गया हैं और मैं ये कहने को विवश हुआ हूँ कि
" शायद मेरे पाप ज्यादा थे , मेरी अपेक्षा से ज्यादा मैंने पाप किये होंगे या फिर मेरी प्रार्थनाओ में दम नहीं होगा ,नहीं तो आप तो कभी भी अन्याय नहीं करते । मैं बेवक़ूफ़ पता नहीं क्यूँ सोचता था कि शायद आप मेरी इस बात पर या मेरे इस काम पर प्रसन्न होंगे और आखिरकार बेपर्दा होकर मेरे सामने कहीं से जैसे बादलों में से या कही धुंध से या एक अँधेरे से प्रगट होकर कह देंगे कि बस भाई आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

मुझे अब आपके दर्शन का भरोसा टूट चूका हैं । कोई प्रवचन या भक्ति कि कोई विधा अब मुझे उठाने में सही नहीं होगी क्योंकि अब मुझमे आपके लिए वो प्यार रहा नहीं । दुःख इस बात का हैं कि जो समय मैंने आपके बारे में सोचने में बिताया वो समय अगर सदुपयोग करता तो शायद कैरियर में काफी तरक्की होती । आपके डर से मैं दुनिया के भोगो का आनंद तो ना ले सका पर क्षणिक और कमजोर वैराग्य के कारन मैं ना तो धर्म ही निभा सका और अधार्मिक लोगों ने मुझे कभी अपना माना नहीं ।
प्रभु मैंने कोई प्रसिद्धि नहीं चाही थी । बस मुझे शांति मिल जाती । मैंने कोई बड़े वैभव के लिए आपकी शरण ली थी ऐसा नहीं हैं । बस इतना सोचा था कि शायद जब संत बोलते हैं कि आप दयालु हैं और सब कुछ दे देते हैं तो मन ने एक कल्पना रची कि दुखी संसार में जब मेरे पास कोई वजह नहीं हैं जीने कि , तो शायद आप संकल्प मात्र से मुझे अपनी शरण में ले ले । गीता , रामायण और कई ग्रन्थ पढ़े जिससे कि आपमें रूचि हो । आप कि प्रशंसा से भरे सारे ग्रन्थ मुझे हौसला तो दे सके पर यथार्थ में आपके दर्शन करा सके ।
मैं क्या करूँ प्रभु अगर मैं आपको पाने के योग्य नहीं हूँ । पर आपकी वजह से अब मैं ना तो संसार में कोई ज्यादा सफल व्यक्ति हूँ और मेरी धार्मिक यात्रा भी अब मेरी हिम्मत टूटने कि वजह से खत्म हो गयी हैं । मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि हे हरि , सबके पास आपको पाने कि ताकत नहीं । कोई और आगे साधक मिले तो उस पर दया कर देना ।
बस इतना ही कह सकता हूँ आपके लिए ( हालाँकि मैं गलत भी हो सकता हूँ )
" हम को खबर भी होने नहीं दी किस मोड़ पर ला के दिल तुने तोडा
अपना बनाना रहा दूर तुने ओरों के हो जाए ऐसा ना छोड़ा
तेरी जफा का चर्चा ही कैसा अपनी वफ़ा पे मैं शर्मा रहा हूँ
.जो प्यार तुने मुझको दिया था वो प्यार तेरा मैं लौटा रहा हूँ
अब कोई तुझको शिकवा ना होगा तेरी जिंदगी से चला जा रहा हूँ "
अगर आपको हम पसंद नहीं थे तो फिर क्यों हमें जन्म दिया । हम तो समर्थ नहीं थे पर आप तो आकर समझा सकते थे । खैरइलाही अजब हैं ये तेरी खुदाई
कि दोनों जहाँ पर हुकूमत हैं तेरी
अँधेरे उजाले में हर जिंदगी हैं
कि कई मुश्किलों में ये जन्नत हैं तेरी