कृपया पहले अगर आप हरदीप जी कि ये ब्लॉग पोस्ट पढेंगे तो थोडा पूरक सामग्री भी आपको मिलेगी ।
http://hardeeprana.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html
लेखक की संवेदना गहरी मानवीय संवेदना हैं . हरदीप ने इस पोस्ट में सही विश्लेषण किया जिसमे मुझे कहना पड़ा
" समर्थ को नहीं दोष गोसाई :
हमारे देश के संविधान या कानून में सच में ही अजीब हैं और फिर इसमें फंसते सिर्फ असहाय लोग ही हैं ।
इसी कड़ी में कहना पड़ेगा की पांच सात मजदूरों को सोयी अवस्था में अपनी B M W कार से कुचलने वाले तो एश में हैं और संसद और देश की आन पर हमले वालो को बचने के लिए मानव अधिकार का पेंच ढूंढ लिया जाता हैं .
ये तो बेचारे गाँव के कुछ लोग जिन्हें हमारे समाज के आधुनिक होने का पता नहीं हैं . इनको क्या पता की हमारे न्यायलय ने तो लड़के से लड़के की शादी तक को मान्यता दे दी हैं . इन पंचायत के लोगो को बस कहा जा सकता हैं किसी झूठी तथाकथित खानदानी इज्ज़त के लिए मजबूर हुए होंगे . उनका अपराध तो बिलकुल अक्षम्य हैं फिर दुःख ये हैं की गाँव के लोगो से नेताओ को सिर्फ वोट चाहिए और खुद नेता चाहते हैं कि लोग पिछड़े ही रहे . जब सो डेढ़ सो पुलिस वाले गुडगाँव में मुख्यमंत्री के कहने पर हज़ारो होंडा कर्मचारियो को कुत्तो कि तरह पीट सकते हैं तो क्या पांच लोगो से एक पति पत्नी को नहीं बचा सकते थे . खबर हमने सुनी थी कि जब इनको बचने के लिए उच्च न्यायलय से आदेश थे फिर किसकी इतनी हिम्मत हुई कि सबके सामने दो लोगो को मार दिया गया ।
जब संविधान में लिखा हैं कि बालिग लड़का लड़की शादी कर सकते हैं फिर भी पुलिस वालो के सामने कैसे उन्हें मार दिया गया . क्या गृह मंत्रालय कि कोई जिम्मेदारी नहीं बनती , आठ हज़ार कि तन्खवाह वाला सिपाही बेचारा कैसे पंचायतो कि भीड़ से निपट सकता हैं . एक भी छोटे से छोटे से नेता ने उस समय इसकी बुराई नहीं कि क्योंकि चुनाव का डर था . और गैरत ऐसी कि अब भी न्यायलय के इस निर्णय का समर्थन भी नहीं .
गोत्र और अंतरजातीय विवाद में हमारे हरियाणा में इतने इतने काण्ड हुए हैं कि मन तौबा कर जाये पर दिक्कत ये हैं कि इन्ही महापंचायतो के मतदान निर्णय से नेता जीतते और हारते हैं . इसीलिए मुख्यमंत्री तो क्या प्रधानमंत्री जिन्हें ऑस्ट्रेलिया में हुए एक मुसलमान पर हमले से रात को नींद नहीं आई अपने ही दिल्ली से तीन तरफ से सटे हरयाणा में हो रहे नरसंहारो पर कुम्भकरण बन जाते हैं । जिस परिवार के लोग मरते हैं वो जानते हैं कि जिंदगी क्या होती हैं । हर चीज़ में कायरो कि तरह बस न्यायलय को बलि का बकरा बनाया जाता हैं । अरे क्या अपने सामने मरती जिंदगी में हर बार सुप्रीम कोर्ट मदद करेगा .
हमारे देश में तीन चार विचारधाराओं के लोग एक साथ जी रहे हैं । एक तो हमारे जैसे पिछड़े हैं जहाँ गोत्र तक का ध्यान एक सामान्य शादी में रखा जाता हैं , बिलकुल सच कहूँगा स्वयं मुझे अपने रिश्ते के लिए गोत्र विवाद के चलते योग्य लड़की नहीं मिल पा रही हैं . कही मम्मी का गोत्र मिलता हैं कही दादी का । अपना खुद को तो खैर कभी हो ही नहीं सकता हैं ।
एक दूसरा समाज हैं जो हाई फाई लोग जो लिव इन और गे marriage करके भी आराम से रहते हैं । यहाँ कोई पंचायत नहीं हैं क्योंकि इनके पास पैसा पॉवर मीडिया और विदेशी लिंक हैं । शायद इसीलिए मेरे मुह से निकला समर्थ को नहीं दोष गोसाई । एक छोटा सा सा सच्चा उदहारण । एक हमारे युवा भारतीय नेता हैं श्री सचिन पायलट । वो तो बिलकुल परिपक्व हैं और उनके अपने प्रोफाइल में पूरी अच्छी छवि भी दिखती हैं ।, हर कोण से वो एक आधुनिक चेहरा हैं । इतने उदार कि इन्होने हर पिछड़ी सोच को दरकिनार करते हुए एक मुस्लिम लड़की (जो कि फारूख अब्दुल्ला कि बेटी हैं) से शादी कर ली । अब देखिये ये गुर्जर नेता हैं और मैं भी गुर्जर समाज से सबंधित रखता हूँ । हमारे बड़े बूढ़े इन्हें बेमतलब इन्हें गुर्जर नेता बेमतलब इन्हें गुर्जर कि शान आदि आदि नमो से नवाज देते हैं । पर अगर हम इनकी तरह अंतर धर्म तो क्या अगर अंतरजातीय विवाह तो क्या गोत्र का ध्यान रखे बिना अगर हम शादी कर लेते हैं तो हमारा सामाजिक बहिष्कार तय हैं पर सचिन जी कभी नहीं कहते कि वो गुर्जर नेता हैं । इतना द्विअर्थी मापदंड हैं कि बस निराशा ही हाथ लगती हैं .
!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
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