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शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

सती मोह संवाद ( संत तुलसी दास जी के रामचरित मानस से )

तुलसी दास जी क़ी रामचरित मानस की एक एक चौपाई बहुत अर्थपूर्ण होती हैं । जब मैं छोटा था तो सोचता था कि ये सब बस भगवान् राम की जीवनी को कविता का रूप दिया गया हैं । परन्तु संतो के श्री मुख से जब कथा के रहस्य को सुनना शुरू किया तो पता चला कि सभी ऊंची स्थिति के संत जैसे तुलसीदास , सूरदास या बाल्मीकि जी सारी लीलाओं को प्रत्यक्ष ध्यान रूप में देखकर लिखा करते थे . वे कभी भी कोरी गप्प या मनमाना साहित्य नहीं लिखते थे । जो होता था वही इष्टदेव की सत्प्रेरणा से उसे वे लिपिबद्ध करते थे ।

ऐसा ही संवाद माता पार्वती के पिछले जन्म सती से संबध हैं । जब मैं इन चौपाई को पढता तो लगता था की बिलकुल सामान्य हैं पर जब पूज्य संत श्री मोरारी बापूजी ने इनका अर्थ बताया तो तुलसीदास जी लिए अगाध श्रीध उत्पान हुई । पंक्तिया नीचे दी हुई हैं । ये बालकाण्ड भाग के शुरू का संवाद हैं ।


एक बार त्रेता युग माहि शम्भू गए कुम्भज ऋषि पाहि
संग सती जग जगनी भवानी पूजेही ऋषि अखिलेश्वर जानी
रामकथा मुनि बर्ज बखानी सुनी महेश परम सुखु मानी
ऋषि पूछी हरिभगति सुहाई कही शम्भू अधिकारी पाहि
कहत सुनत रघुपति गुण गाथा कछु दिन तह रहे गिरिनाथा
मुनि सन विदा मांगी त्रिपुरारी चलेऊ भवन संग दच्छकुमारी


इसकी पहली पक्ति में भगवान् शिव राम कथा सुनने के लिए ऋषि कुम्भज यानि अगस्त्य के पास आते हैं । अब दूसरी पंक्ति में भगवान् शिव को अखिलेश्वर माना गया और माता पार्वती को जग जननी । ऋषि अगस्त्य दोनों का पूजन करते हैं ।
अब तीसरी पंक्ति देखे , रामकथा को सुनकर महेश ने परम सुख माना मतलब माता पार्वती को श्रोता वर्ग से निकाल दिया । अब तुलसी दास जी ने ऐसा क्यों किया । असल में माता जी के मन में ऋषि अगस्त्य की रामकथा के लिए कोई आदर नहीं था । वो मन में सोच रही थी की भगवन शिव ने जिद की तो मुझे आना पड़ा पर ये तो अभी से हमें प्रणाम कर रहा हैं । तो उन्हें कथा को और कथाकार को विशेष आदर नहीं दिया जो बाद में उन्ही के स्वयं के पतन का कारन बना और शिव जो उनका त्याग करना पड़ा ।

खैर अब जो आगे की भी दो पंक्तिओं की सारी चर्चा सिर्फ शिवजी और ऋषि के बीच की हैं, क्योंकि माता का ध्यान कथा में था ही नहीं । और छठी पंक्ति में तुलसीदास जी बोलते हैं की दोनों जब वापिस कैलाश जाते हैं तो माता पार्वती हमें जाते हुए सिर्फ माता सती एक चतुर पिता दक्ष की पुत्री ही दिखाई देती हैं अर्थात एक माप तौल करने पिता की चतुर पुत्री , जबकि जब वो कथा सुनने आई थी तो उन्हें कितना मान देकर जग जननी भवानी कहा था ।


इसी समय के त्रेता युग में भगवान् राम ने जन्म लिया था । अब माता सीता को रावण हरण कर के ले गया था ।अब क्योंकि भगवान् शिव राम कथा को सुन कर आये थे तो पूरे भक्ति भाव से प्रणाम करने लगे । पर माता ने तो कथा को ज्यादा आदर नहीं दिया था । इसीलिए भगवान् की परीक्षा ही लेने के लिए सीता जी का रूप धर लिया ।बाद की घटनाये तो आपको पता ही होंगी कि कैसे शिव जी ने माता सती को त्यागने का मन बना लिया , फिर इश्वर के बनाये संयोग से दक्ष ने यज्ञ किया और माता सती का शरीर अग्नि में समर्पित हुआ और अगले जन्म में हिमालय पुत्री के रूप में माता पार्वती बनकर आई ।


हमें तो बस यही सीख मिलती हैं कि हमें हमेशा ऋषि और उनके वचनों को श्रेष्ठ ही मानना चाहिए । कभी भी अपनी बुद्धि से उन्हें आंकना नहीं चाहिए । जब माता सती जैसो से भी गलती हो सकती हैं तो हम क्यों बेमतलब अपने तर्कों को सही सोचे । और सदा हमें शास्त्रों को प्रामाणिक मानना चाहिए और अगर दिक्कत हो तो फिर संतो से ही सलाह लेनी चाहिए ।

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...