वृन्दावन एक नाम हैं जो किसी भी हरिभक्त को सिर्फ एक बार के दर्शन से मोह लेता हैं । दुनिया का कोई तीर्थस्थल हो पर जब आप वृन्दावन जाते हो तो बस वहीँ के होकर रह जाते हैं । तभी तो वहां की टी शर्ट्स लोकप्रिय रहती हैं जिन पर लिखा होता हैं , I lost my heart in Vrindavan , सबसे पहली बात कि वृन्दावन जाये कैसे । इसके लिए वैसे मेरी ब्रज यात्रा की भाग एक और दो पोस्ट भी पढ़े । अगर आपको सिर्फ वृन्दावन जाना हैं तो बस दिल्ली की तरफ से आगरा आते हुए छटीकरा उतारे जो एक common स्थान हैं राधा कुंड, या गिरिराज जी जाने के लिए । छटीकरा से आपको auto मिल जायेगा जो चार या पांच रुपये में वृन्दावन में हरिकुंज चौराहे पर छोड़ देगा । अब धर्मशाला कहाँ लेनी चाहिए ये बताता हूँ ।
देखिये अगर आपको सारा वृन्दावन ही घूमना हैं तो हरिकुंज चौराहा जो लगभग वृन्दावन के बीच में पड़ता हैं और यहाँ से सबसे पहला मंदिर पड़ेगा बांके बिहारी जी का मंदिर । हरिकुंज में धर्मशाला लेने पर आप रिक्शा के काफी पैसे बचा सकते हैं , और अगर आपको सिर्फ और सिर्फ इस्कोन टेम्पल या साधारण भाषा में अग्रेजों के मंदिर के दर्शन या वृन्दावन की नौ किलोमीटर की परिक्रमा करनी हैं तो हरिकुंज चौराहे से एक किलोमीटर पहले ही बोल दे की आपको इस्कोन टेम्पल उतरना हैं । आप वृन्दावन के बड़े से गेट के सामने उतर सकते हैं , ये सब साथ साथ हैं
वहां काफी धर्मशालाएं हैं जो लगभग उचित दर रूम देती हैं ।
अब बात करते हैं । मंदिर के दर्शन की
एक - बांके बिहारी मंदिर :
वृन्दावन का यही सबसे प्रमुख मंदिर हैं । आप वृन्दावन आते हैं तो सिर्फ इसी मंदिर के लिए और कृष्ण जी को चार सौ साल पहले ठाकुर हरिदास जी ने यहाँ प्रगट किया था । मंदिर में बहुत तंग गलियों से होकर पहुंचना पडता हैं । हरिकुंज चौराहे से आप पैदल दस मिनट में पहुँच सकते हैं । मंदिर में भगवान् कृष्ण की सांवली मूर्ति हैं जो लगभग हर पांच मिनट बाद परदे बदलती रहती हैं । त्योहारों के दिन अगर आपको एक मिनट के दर्शन हो जाए तो आप वाकई भाग्यशाली हैं । मैं एक बार इतनी भीड़ में सिर्फ दस सेकंड ही दर्शन कर पाया था ।
दो -सेवाकुंज ,मीरा जी मंदिर , शाहजी मंदिर, निधिवन -
बांके बिहारी मंदिर के सबसे पास पड़ता हैं सेवा कुञ्ज । यह श्रधा और विश्वास हैं की कृष्ण भगवान् और श्री राधाजी यहाँ हर रात को रास के लिए आते हैं । यहाँ अगर रात को कोई जीवित व्यक्ति या प्राणी गलती से रहा जाए या तो उसकी मृत्यु हो जायेगी या गूंगा बहरा जो जायेगा । यहाँ छोटी छोटी झाडिया हैं और इतने बन्दर कि आपको डर लगे पर वे कहते कुछ नहीं हैं । अंदर एक छोटा मंदिर हैं । ललिता सखी के आग्रह पर बनाया गया भगवान् कृष्ण द्वारा बनाया गया ललिता कुंड भी हैं । पर यहाँ आपको बहुत सन्नाटा लगेगा । सब बिलकुल शांत ।
यहाँ से बिलकुल निकलते ही दो गली छोड़ कर मीरा बाई का मंदिर हैं जहाँ मीरा जी कभी रहती थी । मंदिर एकदम शांत हैं । आपको बिलकुल सब मौन लगेगा । सेवाकुंज से निकलते ही किसी से पता पूछ ले क्योंकि गलिया थोड़ी जटिल हैं और आपसे ये मंदिर छूट भी सकता हैं । मीरा जी के मंदिर से थोडा आगे शाह जी का बड़ा मंदिर हैं और इसके बिलकुल सामने ही निधिवन कि गली हैं । निधिवन और सेवाकुंज लगभग एक जैसे हैं पर निधिवन में आपको इतना सनाटा नहीं मिलेगा । यहाँ लगभग हर तरह से अच्छा लगने वाला माहौल हैं । बन्दर भी नहीं हैं और रस्ते में जगह जगह छोटे छोटे चार पांच मंदिर आपके आपको उत्साहित करते रहेंगे । यहाँ का शाम का कीर्तन बहुत दिव्य हैं , जरुर भाग ले ।
तीन -यमुना जी और केशी घाट
यहाँ निधिवन से पैदल यमुना नदी के दर्शन करें और वही केशी घाट भी हैं जहाँ भगवान् कृष्ण ने केशी राक्षस को मारा था । शाम को यहाँ जमुना जी कि आरती होती हैं । वैसे वहां नाव का भी प्रबंध हैं ।
चार - रंगनाथ मंदिर , श्री दाऊ जी मंदिर , गोदाविहार मंदिर , गोविन्द नामदेव, मीरा भजनाश्रम, लालाबाबू मंदिर , गोपेश्वर महादेव मंदिर ।
ये सभी मंदिर वृन्दावन के आखिरी छोर पर पड़ते हैं । अगर आप निधिवन में हैं तो वहा से पैदल रंगनाथ जी मंदिर में जा सकते हैं । पन्द्रह मिनट का रास्ता हैं ।
रंगनाथ मंदिर में अगर आप पहली बार जा रहें हैं तो गाइड ले क्योंकि ये इतना बड़ा और जानकारियों से भरा मंदिर हैं कि आप चौंक जाएँगे । बड़े बड़े गेट और मंदिर का क्षेत्र पूरे वृन्दावन में इस मंदिर के जितना किसी का नहीं हैं । इस मंदिर में एक सो आठ पुजारी हैं । आधे सुबह और आधे शाम को आरती में सहाय होते हैं । मंदिर में लगा शुद्ध सोने का पांच सो किलोग्राम का खम्भा आप को चौंका सकता हैं । अन्दर एक कमरा हैं जिसमे इस मंदिर के निर्माता लक्ष्मीदास द्वारा दिए गए उपहारों का । यहाँ एक से एक कीमती उपहार हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते । अन्दर एक शीशमहल मंदिर हैं जो पूरा कांच का बना हुआ हैं । अन्दर और साइड में भगवान् के विविध रूपों के कई मंदिर हैं। वैसे इसे घूमने में एक घंटा लग जाता हैं ।
इसके बाद मंदिर के बायीं तरफ गोविन्द नामदेव मंदिर हैं जो राजा मानसिंह ने अकबर के समय बनवाया था । पर बाद में ओरंगजेब ने इर्ष्या वश मंदिर की चार मंजिले तुडवा दी । अब भी मूल मंदिर की तीन मंजिलें बची हैं । यह बहुत विहंगम मंदिर जो आप एक बार देखना पसंद करेंगे ।
रंगनाथ जी मंदिर के दाहिने तरफ चलने पर ब्रह्मसरोवर हैं जो काफी सुखद दर्शन का आभास देता हैं । इसके लगभग साथ ही लालाबाबू द्वारा बनवाया गया मंदिर हैं । इस मंदिर की निर्माण कहानी इसकी दीवारों पर लिखी हैं । मैंने अपने गुरु बापूजी से इसके निर्माण की कहानी सत्संग में सुनी थी । इस मंदिर के दर्शन से पहले आप चाहे तो रंगनाथ जी मंदिर के सामने बलराम जी के दाऊ मन्दिर और मीरा जी भजन के स्थान भजनाश्रम के भी दर्शन कर सकते हैं । यहाँ विधवा ओरते सतत कीर्तन करती हैं ।
लालाबाबू मन्दिर के बाद आप गोदाविहार मंदिर में जा सकते हैं जो तीन चार घर छोड़ कर ही हैं । यह मंदिर सबसे अलग हैं । शायद ही कोई देवी देवता हो जिसकी मूर्ति इसमें ना हो । आप एक बार इस मंदिर में जरुर जाये। मैंने पुरानो में कथा सत्संगो में जितने देवी देवताओं के बारे में सुना हैं वे सब इसमें हैं और महापुरुषों यहाँ तक कि देशभक्तों के स्मारक भी यहाँ बनाये गए हैं । केंद्र में भगवान् श्री हरि और माता लक्ष्मी की बड़ी मूर्ति हैं और हनुमानजी और गरुड़ जी इनके द्वारपाल हैं । मंदिर रंगनाथ जितना बड़ा तो नहीं हैं पर आप लगभग उतना ही समय लगा सकते हैं जितना आपने रंगनाथ मंदिर में लगाया हो ।
इस मन्दिर से थोड़ी दूर हैं गोपेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर , यहाँ भगवान् शिव ने भगवान् श्री कृष्ण की रासलीला में शामिल होने के लिए गोपी रूप धारण किया था । इस मंदिर के बाद आप अपनी यात्रा को इस क्षेत्र से लगभग विराम दे सकते हैं ।
पांच - इस्कोन टेम्पल (अंग्रेजों का मंदिर ) या कृष्ण बलराम मंदिर
बांके बिहारी मंदिर के बाद अगर कोई मंदिर सबसे प्रसिद्ध हैं तो वो शायद इस्कोन टेम्पल ही हैं । मंदिर में महामंत्र
हरे कृष्ण ...हरे हरे की गूंज आपको अन्दर तक भक्तिमय कर देगी । आप कैसे भी व्यक्ति हो अगर आप एक बार यहाँ आये हैं तो शायद ही ऐसा हो की वृन्दावन आप आये और यहाँ ना आये । मंदिर के प्रवेश द्वार के पास बना श्रील प्रभुपाद का मंदिर बड़ा ही दर्शनीय हैं । फिर मुख्य मंदिर हैं जिसमे राधा कृष्ण , कृष्ण बलराम और गौर निताई की अलौकिक मूर्तियाँ हैं । बस जब आप यहाँ बैठेंगे तो सहज ही आपका मन कहेगा की इन अंग्रेजो को यहाँ क्या मिलता हैं जो सारी सुख सुविधा छोड़कर जो इस छोटे से गाँव में आकर बस गए हैं । शाम का पांच से आठ बजे तक का कीर्तन जिसने भी सुना होगा वो अवश्य ही दीवाना हो गया होगा .
मंदिर में पीछे ही धर्मशाला और भोजनालय हैं । दोनों ही बहुत साफ़ सुथरे हैं । अगर आपको सिर्फ इसी एक दो और मंदिर के दर्शन करने हो इस्कोन मंदिर में ही रुकना चाहिए नहीं तो फिर हरिकुंज चौराहे पर धरमशाला ढूंढ सकते हैं ।
वैसे कई और भी मंदिर हैं जैसे पागल बाबा का मंदिर , सुदामा जी की कुटिया, स्नेह्बिहारी मंदिर । पर मैंने सिर्फ पहली पोस्ट होने के कारन थोड़ी थोड़ी सामग्री डाली हैं । अगर श्री राधा जी की दया रही तो और भी वृन्दावन के बारे में जानकारी दूंगा । वैसे वृन्दावन में इतने मन्दिर हैं कि सारी जिंदगी बीत जाएगी दर्शन करते करते । अभी के लिए इतना ही , अगली पोस्ट में मथुरा जन्मभूमि के लिए समर्पण होगा .
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रविवार, 14 मार्च 2010
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