जिनको कृष्ण की भक्ति सुहाती है उन्हें मीरा जी की श्रेष्ठता कहने की आवशयकता नही है। दुर्गम परिस्थितिओं के होते हुए भी उन्होंने ईश्वर प्रेम को नही त्यागा और हमारे जैसे सरल साधकों के लिए एक अद्भुत उदहारण बनकर चली गयी । अभी भी वृन्दावन और द्वारिका जैसे कृष्ण लीलास्थालों पर मीरा जी के काल की झलकियाँ मिल ही जाती हैं । उनके भजन इतने प्यारे और सरल है जो सदा प्रासंगिक लगते हैं । उन्ही में से एक भजन है जो काफी अच्छा है । जगत के रंग क्या देखू तेरा दीदार काफी है,
चली जाऊ मैं वृन्दावन तेरा दरबार काफी है
करूँ मैं प्यार किस किस से , तेरा एक प्यार काफी है
नही चाहिए ये दुनिया के निराले रंग ढंग मुझको ,
चली जाऊँ मैं वृन्दावन तेरा दरबार काफी है
दुनिया के साजे बाजों से हुए है कान अब बहरे ,
कहा जाके सुनु अनहद तेरी झंकार काफी है ,
चली जाऊँ मैं वृन्दावन तेरा दरबार काफी है
जगत के रिश्तेदारों ने बिछाया जाल माया का ,
बुला लो बैकुंठ में मुझको तेरा परिवार काफी है ,
चली जाऊँ मैं वृन्दावन तेरा दरबार काफी है