ईश्वर प्रेम या अपने सच्चे प्रेम लगभग एक जैसे लगते हैं । संसारी प्रेम में बस ये होता हैं कि इसमें कभी कभी मोह भी होता हैं तो भेद कर पाना मुश्किल होता हैं । फिर भी चाहे कुछ भी हो अगर मोह हैं तो भी सारा ईश्वर को ही साक्षी मानकर किया जाये कि हे प्रभु उस लड़की का सौंदर्य भी तुने ही तो दिया और मेरे मन को कमजोर भी तुने ही तो किया । अब जैसी तेरी मर्ज़ी । बस हममे सदा सच्चा प्यार ही देना ।

राधा जी के विरह की अवस्था देखिये , वो जब कृष्ण से कहती हैं कि कृष्ण मेरी दशा तो देखो जब तुम मेरे पास नहीं होते हो तुम्हारे विरह में तड़पती हूँ , पर जब तुम्हारे पास आती हु तो भी पहले पल से लेकर आखिरी पल तक यही सोचती रहती हूँ कि तुमसे आज अलग भी होना हैं । मतलब दिल इतना बेक़रार होता हैं कि दूरी कि समय तो दुःख हैं कि प्रेमी पास नहीं हैं पर जब प्रेमी पास हैं तो उसके दूर हो जाने का दुःख हैं । यही विरह का प्रेम हम सबके लिए पहेली बना रहता हैं कि क्यों वृन्दावन में राधे राधे गूंजती हैं ।
सच में क्यों ना गूंजे । क्यों ब्रज चौरासी में सिर्फ राधे राधे ना हो । ये कोई ज्ञान जैसी भारी भरकम वास्तु थोड़े ही हैं , ये तो अपने अहम् को खो देने वाली विधि हैं जिसमे मिट जाना हैं , बर्बाद करना हैं अपने आप को । कोई इच्छा नहीं कोई अपेक्षा नहीं ।
इस प्रेम को समझाने के लिए ही भगवान् कृष्ण ने परम ज्ञानी उद्धव जी को राधाजी के पास भेजा था । प्रेम तो सच में ज्ञान जैसा नहीं । हमें प्रेम का पता नहीं इसीलिए राधा जी को नहीं समझ पाते हैं । जब उद्धव भी शुरू में नहीं समझ पाया तो मेरे जैसे की औकात नहीं हैं । वो तो सच में गोपियाँ पा गयी और वो सचिदानंद उनका दास होकर भी कहता हैं कि गोपिओं मैं तुम्हारा ऋणी हु और कभी तुम्हारा बदला नहीं चुका सकता ।
राधा जी के प्रेम में कहाँ शारीरिक आकर्षण हैं । अगर सच में ऐसा होता तो भगवान् कृष्ण जहाँ 16108 शादी कर सकते तो एक राधा जी से एक और कर लेते । ये तो अलग मामला हैं साहब , पूज्य संत मोरारी बापू कहते हैं कि ज्ञान सच में दो कौड़ी कि वस्तु हैं प्रेम के सामने । बस आपने अपने प्रेमी को दिल दिया और आप ख़त्म या तबाह हो गए । कोई कहीं के नहीं रहते , सिवाय रोने के कोई उपहार नहीं दे सकते अपने प्रेमी को । मैंने कथा से ही सुना हैं कि एक भक्तानी कहती हैं
" जो मैं ऐसा जानती कि प्रीत किये दुःख होए
मैं नगर ढिंढोरा पीटती कि तुम प्रीत ना करिहों कोई "
और एक और दोहा सा हैं जो मैंने अपने गुरु बापूजी के सत्संग से सुना हैं कि गोपियाँ उद्धव जी को कहती हैं
"
ये मुहब्बत कि बाते हैं उद्धव , बंदगी अपने वश कि नहीं हैं
यहाँ सर देकर होते हैं सौदे आशिकी इतनी सस्ती नहीं हैं
प्रेम वालो ने कब किससे पूछा , किसको पूछू बता मेरे उद्धव
यहाँ दम दम पर होते हैं सिजदे , सर उठाने को फुर्सत नहीं हैं "
प्रेम भक्ति के ऊपर मेरी एक दूसरी पोस्ट भी मैंने पहले लिखी थो जिसमे गोपिओ और उद्धव जी का संवाद हैं ।
लिंक ये हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/ki.html
आशा हैं ईश्वर प्राप्ति के पथिको को अच्छा लगेगा । विषय थोडा जटिल हैं , इसीलिए कोई गलती हो गयी हो तो कृपया मार्गदर्शन करें .