ये कविता एक दोस्त को समर्पित हैं जो इन दिनों समस्याओ में हैं , ईश्वर करे वो शीघ्र ही ठीक हो जाये ,अगर वो ये पढ़े तो जवाब दे कि समस्या ख़त्म हुई कि नहीं

सख्त लोहे की जंजीरे मिली , पर हाथ तो उसके फूलो जैसे हैं
संतो से भी जो पूजी जाती , हालत उसके बदतर कैसे हैं
सवालों का उसका सागर जिसमे बस मैं बहता जाता हूँ
भक्ति का फल टूटे दिल को सारा कुछ मैं कहता जाता हूँ
धर्म को जिसने नित्य नया जीवन दिया था
कालकूट श्री हरि ने उसके होंठो से पिया था
रिवाजो में लिपटी होती वो एक दिल की दीवानी थी
प्यार और धर्म में उलझी खोती एक दर्द की कहानी थी
मीरा राधा का प्रियतम कृष्ण उसका कोई चाहने वाला था
सीता माता की परीक्षा लेने वाला उत्तम मर्यादा वाला था
सबमे सूक्ष्म रूप में बसती पर उस दिल को वो देख ना पाई
ज्ञान से सब वो देखने वाली नैनो में किसी के बस ना पाई
चरम शिखर पर पहुंची आत्मा, पातालो से भी ठुकराई थी
एकत्व को प्राप्त जीवत्व वो परतो में भी चिनवाई थी
परम समर्थ वो अबला कैसी प्रार्थना कर गयी थी
तपती दोपहरी में जिसकी झील दुःख से भर गयी थी
शरीर थी या आत्मा जीवन रह भी गया था नहीं
मदद करने को कोई संत बचा था क्या कही
ऊंगली सबने उठा दी दर्द उसका ना कोई उठा पाया
सबके लिए खुद को छोड़ा पर दिल उसका ना वफ़ा पाया
नारायण या जीव वो या उसमे ही समाया हमसाया था
सब मुझमे सब मेरे "वीरेन " के लिए ना कोई पराया था