आप तो दुनिया बनाकर भाग गए । अकेला मरने के लिए मुझे छोड़ दिया । बचपन में स्कूल में पिटाई खाने का डर सताता रहता था पर आप कोई ज्यादा मददगार ना हुए । उस साइंस के पीरियड में डिजिटल घडी की एक एक मिनट को गिनता मैं आखिरी क्षण में घंटी सुनने के लिए तरस जाता पर कमीना अमित फिर चुगली कर देता
" सर , इसने केमिस्ट्री कि कॉपी ही नहीं बनायीं " और दो तीन घूंसे प्राथमिक उपचार के तौर पर नसीब में आ ही जाते थे । बचपन में ही सत्संग में सुने संतोष के वचनों से इतना तो बल मिला कि चलो कॉपी तो बायोलोजी और फिजिक्स कि भी नहीं बनायीं , बस एक ही सब्जेक्ट पर धुनाई हुई ।
थ्री इडियट कि तर्ज़ पर इंजीनियरिंग जैसे पिटे पिटाए कोर्स में दाखिला ले लिया । सोचा था बड़े ही बुद्धिमान शिक्षक और छात्र मिलेंगे । सपने जब टूटे जब बस वहां इडियट ही इडियट दिखे । एक से एक बुद्धू शिक्षक मार्गदर्शक बने और आवारो , लफंगो कि एक बड़ी भीड़ जो बस " सीनियर " होने के कारण हमें " फ्रेंक " बनाने कि आड़ लेकर हमारा " सामूहिक $#%$#%$#%#^ " करती थी । किसी तरह जुगाड़ लगाकर चार साल पूरे करने के बाद पता चला कि बस
" नौकरी नहीं हैं "
सारे देवी देवताओं , नेताओं भाई भतीजों और जुगाडू लोगों के सामने दंडवत होकर एक " टुच्ची " किस्म की ट्रेनिंग कम जॉब हथिया ही ली । छः हज़ार का आश्वासन पाकर भी सेलरी कभी पचपन सौ को पता नहीं क्यों छू नहीं पाई । खैर पंद्रह बीस साल पड़े रहे उसी फटीचर कम्पनी में ।
शादी के लिए जब रंगमंच जम रहा था तो सोचा एक आध इंटर कास्ट सीन का विकल्प देखा जाए पर इस विकल्प पर परिवार से मिली आंतंकवादी टाइप की धमकियों ने शोले ठन्डे कर दिए । अब हम " वीरू " तो थे नहीं ।
खैर , अब जब कुछ विकल्प ही नहीं रहा तो घर वालों ने एक खानदानी , सुशील लड़की से शादी करवा दी । वैसे वो लड़की खानदानी , सुशील के साथ थोड़ी .........................मतलब थोड़ी ज्यादा काली और मोटी मुटल्ली किस्म कि थी । पर अब सरल उसे प्यार से प्रिया कहकर तसल्ली पा लेता हैं ।
जिंदगी में लगी वाट में चुन्नू और मुन्नू ने लगी वाट में जन्म लेकर दो होने के बावजूद भी चार चाँद लगा दिए । नर्सरी के टाइम बेटों कि फीस ने कन्यादान और दहेज़ की याद दिला दी ।
फिर तनख्वाह में बढ़ोतरी के लिए भगवान् से मन हटाकर बॉस के ऑफिस में जाने से पहले बड़ी लम्बी प्लानिंग करते कि अगर वो कमीना ये कहेगा तो मैं ये कह दूंगा , उसने ऐसे टांग अडाई तो मैं वैसे पलटी मरूँगा , ऐसे वैसे सब सोच लिया । अंदर घुसा तो सर बेचारे बहुत बिजी थे। भाई कंप्यूटर पर इतने गेम हैं कि आप किसी को बीच में तंग करेंगे तो अन प्रोफैशनल कहे जा सकते हैं । पर सर फिर भी ताश का गेम छोड़कर मेरी बात सुनने लगे । हर शब्द के साथ उनके चेहरे पर लाल रंगत आ रही थी और आँखे बड़ी हो रही थी । खैर उस दिन मुझे पहली बार पता चला कि विचारो का आदान प्रदान किसे कहते हैं , अर्थात मैं उस दिन अपने विचार लेकर बॉस के ऑफिस में गया था और उनके विचारों से सहमत हो आ गया था। और ऐसा कई सालों चलता रहा। कई बार दुर्घटनाये घटी जिन्हें इश्वर कि मर्जी रुपी ढाल कहकर अपने पापो को मैं बचाता रहा ।
स्कूल कोलेज और पड़ोसियों से बच्चो की शिकायतों ने किशोरवस्था की याद दिला दी, आखिर बच्चे किसके थे , बिलकुल बाप पर गए थे बल्कि और एडवांस वर्जन थे। पचास कि उम्र में हम अस्पतालों और अदालतों के परमानेंट तीर्थयात्री हो चुके थे । दोनों बेटे आवारा और लफंगे बनकर कहीं इंटर कास्ट जोड़ा बनाकर रह रहें हैं । फिर सेवा निवृति के महान दिन पर पूरे स्टाफ की ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी की जो गलती तीस साल पहले इस गैर प्रतिभावान व्यक्ति को लेकर की थी आज उसके सुधारने का समय आ गया था ।
फिर दस पन्द्रह साल घर के पास में पार्कों में आवारा कुत्तों और सूअरों के साथ मोर्निंग वाक् करते बिताये । वैसे वो वाक् कम थी टाक ज्यादा थी , जिसमे कश्मीर से कन्याकुमारी के नेताओं को निपटाना , अमरीका रूस पाकिस्तान की विदेश नीति को बदलने की बात कहने , सचिन के संन्यास पर दुविधा जताना और एक बड़े युद्ध की सम्भावना से दुनिया के खत्म होने जैसी दुर्घटना पर चर्चा करना ।
आखिरी समय में " प्रिया " किसी कथा सत्संग में गयी हुई थी कि परलोक कि टीम आ गयी और बोली
" TIME OUT DEAR "
और बस मेरी आखिरी पोस्ट खत्म । पर दिक्कत थी कि अब मेरी बहस मजबूत करने के लिए मेरा वकील साथ नहीं था , कहना ना होगा कि बचपन में स्कूल में शुरू हुई धुनाई परलोक में बदस्तूर जारी रही ।