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बुधवार, 30 जून 2010

हमारे ईश्वर और समाज ( एक कविता )

कविता थोड़ी लम्बी हैं । शुरू कि पंक्तियो में ईश्वर कि ही बाते हैं, अंत में सामाजिक विसंगतियां कविता का रूप लेती हैं । आशा हैं आपको ज्यादा पसंद नहीं आएगी क्योंकि ये depression भरी हैं ।

मुझको प्यारे प्रभु के विरह का भक्तियोग था
दुनिया कि नजरो में ये एक मानसिक रोग था

ईश्वर जब मेरा अपना हैं तो क्यों ना कमी निकालू
जब तक पूरा मन खाली ना हो दो चार ताने दे डालू

फिर भी मेरा हरि मुझे सपनो में पुकारेगा
आँखों में आंसू ले मुझे मनाने जायेगा

मुझसे कहता हैं कि मुझे मिलने को उसका भी दिल तरसता हैं

प्रेम में मुझे बहा ले जाने को उसका एक झरना तरसता हैं

चाहे निर्गुण या सगुण दोनों ही मेरे तो साध्य हो गए
मेरी भक्ति की विधा पर टूटने को रिवाज बाध्य हो गए

इष्ट संग एक हो जाने को आत्मा में संकल्प हुआ था
तभी प्रेम की एक झलक ने मुझे अंदर तक छुआ था

सबमे समाया श्रीहरि एक आनंद का जरिया था
चुन लाया प्यार के मोती जिससे वो भक्ति का दरिया था

शब्दों में ना पढूंगा सिर्फ भावो को पाउँगा
वो ना मेरे पास आये तो खुद चला जाऊंगा

उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहूगा
मैं शिकायत करू तो भी तो तेरा ही रहूँगा
समां चुका तुझमे चाहे जीऊंगा या मरूँगा

अब थोड़ी मन की भड़ास सुना देता हूँ
दिल की खटास से प्यास बुझा देता हूँ

तिल तिल कर मरती मेरी जिंदगी देखिये
टूटते सपने वाली एक दुनिया सहेजिये
मेरे सारे अन्यायों के बीच ईश्वर कहाँ था
उजडती रोज़ किस्मत वो मेरा जहाँ था

सुन्दर चेहरा उनका उन्नति में सहायक था
प्रतिभा और परिश्रम ने जो दौर झेला वो भयानक था
शराब पीना सामाजिक हो गया था
इसीलिए मैं असामाजिक बन रो गया था

चरित्रवान होना मेरे लिए संतो ने ही चाहा था
पर कुछ ने इसे इगो प्रोब्लम कहा था

ऐसे लोगो से भी क्या शिकायत जिनमे मूर्खता के साये हैं
सिर्फ चेहरे की खाते हैं , ये नहीं पता दुनिया में क्यों आये हैं

अंतिम सत्य तो मृत्यु हैं क्या उसकी तैयारी उनकी हैं
दो गज में दफ़न हो जायेगे सारी दुनिया जिनकी हैं

सरल कहो या वीरेन कहो , आयाम से पार वाली बात कह गया
जो हरि ना झेल पाए , वो तो उन आसुओ को भी सह गया



!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे
virender.zte@gmail.com

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...