कुछ लोग ज्ञान को बड़ी भारी वस्तु बना देता हैं । असल में तो ज्ञान ही तो चीजों को सरल बना देती हैं । भक्ति और ज्ञान और प्रेम सब एक ही हैं । जब आप परम ज्ञानी हो तो आप पर प्रेम प्रगट होगा , या यूँ कहले की इनमे द्वैत क्यों लाया जाया जब ज्ञान में सब अद्वैत हैं तो प्रेम और ज्ञान में भिन्नता क्यों । सब एक में समाहित हो गया तो फिर अंतर प्रमाणित करने के लिए क्यों वातावरण तैयार करना ।
अभी बात प्रेम की ही करते हैं । राधा जी तो परम ज्ञानी हैं । वो परम भागवत हैं । मुझे प्रेरणा मिली और इस रचना का निर्माण हो गया । अब क्योंकि प्रेम पर ही आधारित हैं तो उसकी कड़ी में ये दसवी कविता होगी ।
नोवी कविता का लिंक ये हैं
http://saralkumar.blogspot.com/2010/05/blog-post_14.html
प्यार पर दसवी कविता
अश्रु के ये मोती लिए तेरा इंतज़ार करती हूँ
वृन्दावन के ग्वाले मैं तुझे प्यार करती हूँ
मन हरने वाले तुने प्राण क्यों ना हर लिए
अब दुःख होता हैं तेरी याद में राधा क्यों जिए
मथुरा क्या गया अपनी राधा को भूल गया हैं
तुझे पाने का अब राधा का सपना टूट गया हैं
सोने के महल तुझे तो लगता हैं भा गए
झाड़ वृन्दावन के मुझे रास आ गए
हजारो रानियाँ तू समुन्द्र से भी घेर लाया था
ढाई कोस दूर की राधा को ना देख पाया था
राधा ने तो अपना सर्वस्व तुझ पर छोड़ दिया था
अपनी हर मंजिल का रास्ता तुझ तक मोड़ दिया था
मेरे कृष्ण तेरे दर्शन की मै सदा प्यासी हूँ
विरह से उपजी प्यास बस आंसुओ से बुझाती हूँ
नटखट कान्हा तुझे मैंने किस घडी वर लिया था
क्यों एक छिछोरे में अपना मन धर लिया था
अगर मैं रूठ गयी तो तेरी बंसी की तान बिगड़ जाएगी
राजकुमारिया भले तुझे मिल जाये पर ये ग्वालिन बिछड़ जाएगी
राधा राधा बस इतने शब्द तेरे सुनने को मेरे कान तरस जाते हैं
मेरे कृष्ण मेरे कृष्ण जैसे स्वर होठो से बरस जाते हैं ।
अभी के लिए राधा जी ने इतनी ही प्रेरणा दी हैं । बाकि उनकी कृपा रही तो बात और आगे तक बढ़ेगी ।
धन्यवाद ,
वीरेंद्र
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