अभी तक हमने चार अंशावतारों के बारे में जाना । अब आगे की चर्चा करते हैं ,
पांचवां अवतार ( अवतार दत्तात्रेय )
ब्रह्मा जी के छायापुत्र कर्दम मुनि और मनु जी की पुत्री देवहूति से उत्पन्न नौ कन्याओं में एक थी - अनसूया । अनसूया जी का विवाह हुआ ब्रह्मा जी के नौ मानस पुत्रो में से एक से - ऋषि अत्री । अत्री ऋषि और अनसूया के अंश से भगवान् विष्णु ने जन्म लिया भगवान् दत्तात्रेय के रूप में । इस अवतार में शिवजी और ब्रह्मा जी ने विष्णु जी के भाई के रूप में जन्म लिया क्रमशः ऋषि दुर्वासा और चन्द्रमा
के रूप में ।
असल में तीनो देविओं ( माता पार्वती, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती ) ने देवी अनसूया की परीक्षा ली थी जिससे वरदान स्वरुप त्रिदेवों को पुत्र रूप में पाया । ये किसी भी दम्पति के लिए दुर्लभ और महान वरदान था । देवी अनसूया को हम सब सती अनसूया के नाम से भी हम जानते हैं । ये भगवान् राम के समय में भी रहे थे।
भगवान् दत्तात्रेय परम सिद्ध के रूप में जाने जाते हैं । परम ब्रह्मचारी होने के कारन इन परम तेजोमय विभूति ने हैहयवंशी राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन को शक्तिशाली होने का वर दिया । पर बाद में ये राजा दुष्ट हो गया । इसने जमदग्नि ऋषि के आश्रम में दुर्व्यवहार किया । जिससे कुपित होकर विष्णु जी के ही पूर्णावतार भगवान् परशुराम ने सहस्त्रबाहु अर्जुन का वध कर दिया । संक्षेप में भगवान् दत्तात्रेय जी का यही वर्णन हैं ।
छठा अवतार ( विश्वमोहिनी अवतार )
समुन्द्र मंथन से निकले अमृत को राक्षसों से बचाने के लिए भगवान् ने स्त्री रूप को धारण किया । इस अवतार के बारे में भी आप सभी साधको को पहले से ही ज्ञात होगा ।
सातवाँ अवतार ( भगवान् धन्वन्तरी )
समुन्द्र मंथन के समय अमृत कलश को लेकर निकले भगवान् विष्णु ने अपना वैद्य शिरोमणि स्वरुप धारण किया और चिकित्सा के क्षेत्र को समृद्ध किया । इनके बारे में सभी परिचित होंगे ।
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