नाथ थारे शरण पड़ी दासी, नाथ थारे शरण पड़ी दासी
मोहे कर दो भवसागर से पार का दो जन्म मरण फांसी
नाथ मैं बहुत कष्ट पायी ,भटक भटक चौरासी योनी बिन ख्वाबे पायी
मिटा दो दुख्हों की राशी ,मोहे भवसागर से पार...
नाथ मैं पाप बहुत कीन्हा , संसारी भोगों की आशा ने दुःख बहुत दीन्हा
कामना हैं सत्यानाशी ,मोहे भवसागर से पार ......
नाथ मैं भक्ति नहीं कीन्ही ,झूठे भोगों की तृष्णा ने उम्र खो दीन्ही
दुःख मिटाओ हे अविनाशी , मोहे भवसागर से पार ........
नाथ अब सब आशा टूटी ,थारे श्रीचरणों की भक्ति एक हैं संजीवनी बूटी
हूँ नित दर्शन की प्यासी , मोहे भवसागर से पार ................