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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

एक कविता- कह देना कुछ ख़ास नहीं

ये कविता मैंने इन्टरनेट से ही ली । इसके exact लिंक का मुझे अभी पता नहीं हैं । बस मैंने इसे देवनागरी में लिखा हैं जो उम्मीद हैं आपको अच्छी लगेगी । अगर आप में किसी को इसके मूल लेखक के बारे में पता चले तो बता देना जिससे मैं पोस्ट में उनका लिंक डालकर उन्हें इसका पूरा श्रेय दे सकूँ

कोइ तुमसे पूछे कौन हूँ मैं, बस कह देना कोई ख़ास नहीं
एक दोस्त कच्चा पक्का सा , एक झूठ आधा सच्चा सा
दर्द ढके परदे जैसा , वो बहाना है सबसे अच्छा सा
जीवन का एक साथी है, जो दूर हो के पास नहीं है
कोई पूछे कौन हूँ मैं , बस कह देना कोई ख़ास नहीं

हवा का एक वो झोंका है , कभी शांत तो कभी तूफानों सा
शकल देख नजरे झुका ले, सबसे प्यारा कभी बेगानों सा
वो जिंदगी का समंदर, पास है पर किसी को प्यास नहीं ,
कोई पूछे कौन हूँ मैं , बस कह देना कोई ख़ास नहीं

एक साथी जो बिना कहे भी सब कुछ कह जाता है
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है
यूँ तो उसके होने का कुछ गम नहीं
पर कभी आंसू बनकर बह जाता है
यूँ रहता तो मेरे दिल में ही है
पर आँखों को उसकी तलाश नहीं

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं,
बस कह देना कोई ख़ास नहीं

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...