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मंगलवार, 31 अगस्त 2010

प्यार पर कविता भाग-19


पिछली कड़ी में ही ये उन्नीसवी कविता हैं .


मेरे कंधे पर जब तुम सर रखती थी
तेरे लिए मेरी एक कविता बनती थी
साथ मेरे होने से तेरी किस्मत हंसती थी
तन्हाईयां ना तब तेरा दामन डसती थी

तेरे भावो को अपने शब्द दिए थे
तेरे सुखो के सारे रस्ते खोल दिए थे
सपनो को तेरे मैंने अपने नैन दिए थे
तू उड़ने लगी जब तो पंख दिए थे

मैं सबंधो की मर्यादा का ध्यान रखता था
आखिरी साँस तक तेरी राह तकता था
तेरे रोम रोम पाने को को मेरा दिल तरसता था
तेरी खुशबु में बह जाने को मेरा अंतस तड़पता था
तुझे छूने को मेरा अंग अंग मचलता था
तेरी ओर आने को एक लावा धधकता था

फिर जब तुने कुछ भी ना कहा था
तब मैंने ये क्या भूचाल सहा था
भविष्य का तुझे कहाँ पता था
इसीलिए मैंने इसे एकतरफा कहा था

शायद मेरे इतने जन्म ख़राब ना होते
तेरे जज़्बात अगर पहले मचले होते
मेरे अध्यात्म के यु झमेले ना होते
दुखो के मेरे यु सवेरे ना होते

कृष्ण राधा सा ही तो मेरा प्यार था
तेरी हर साँस पर मरना स्वीकार था
शिव और शक्ति का ही तो बस मिल जाना था
भूली राह पर ही तो लौट फिर कर आना था

मै ऐसा नहीं ना मुझे ये शोभा देता था
मेरा क्या स्वार्थ जो तेरे दुःख झेल लेता था
नैतिकता का कौन सा मानदंड तोड़ देता था
सिर्फ अपना भला करना ही तो छोड़ देता था

सूरज किरण होकर चिराग से रौशनी खोजती थी
प्रकाश की तू स्वामी और अँधेरे में सोचती थी
क्या कभी सच्चा प्यार बिना जन्मो के बंधन से मिलता हैं
किस्मत जगी तेरे जीवन में "वीरेन "आ गया लगता हैं

!! श्री हरि : !!
बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...