भगवान् श्री कृष्ण सोलह कलाओं से सम्पूर्ण अवतार हैं। वे रस स्वरुप हैं ,आनंदस्वरूप हैं । बचपन से लेकर स्वधाम गमन तक उनकी हर लीला मनोहारी है। उन्ही परम पुरूष के सान्निध्य के लिए गोपिओं को अनेक जन्मो तक साधना करनी पड़ी । प्रसाद स्वरुप इश्वर ने उन्हें शरद पूर्णिमा के दिन सगुण ब्रह्म को असंख्य रूपों में प्रकट किया और प्रेमाभक्ति को सबसे श्रेष्ठ दर्शाया । रामानंद सागर के सीरियल "श्री कृष्ण " में इसका बहुत अच्छा वर्णन दिया है । उसी की ये पंक्तिया हैं ।पहले आकाश वाणी होती है
आकुल व्याकुल गोपिया ,उनकी दशा विचार रूप अनेकों धर प्रगट हुए प्रेम अवतार
इसके बाद श्री कृष्ण एक से अनेक हो गए , अब इसके बाद राधा जी , गोपिओं और कृष्ण जी का अलोकिक संवाद है जो इस प्रकार है । बीच में आकाशवाणी भी होती है .
कान्हा रे थोड़ा सा प्यार दे चरणों में ,बैठा के तार दे
ओ गोरी घूँघट उभार दे प्रेम की भिक्षा झोरी में दार दे
प्रेम गली में आके गुजरिया भूल गई रे घर की डगरिया ,
जप तन साधन तन मन जीवन सब तुझे अर्पण प्यारे सांवरिया
माया का तुमने रंग ऐसा डाला बंधन में बंध गया बाँधने वाले
कौन रमापति कैसा इश्वर मैं तो हूँ गोकुल का ग्वाला
ग्वाला रे थोड़ा सा प्यार दे ग्वालिन का जीवन संवार दे
आत्मा परमात्मा के मिलन का मधुमास है यही महारास यही महारास है
हो त्रिभुवन का स्वामी भक्तों का दास है , यही महारास महारास है
कृष्ण कमल है राधे सुवास है यही महारास है यही महारास है
हो इसके अवलोकन की युग युग को प्यास हैं यही महारास महारास हैं
तू झूठा वचन तेरे झूठे मुस्का के भोली राधा को लूटे
मैं भी हूँ सच्चा वचन मेरे सच्चे प्रीत मेरी पक्की तुम्हारे मन कच्चे
जैसे तू रखे वैसे रहूंगी दूँगी परीक्षा पीर सहूंगी
स्वर्गों के सुख भी नीके न लागे तू मिल जाए तो मोक्ष नही मांगे
सृष्टि के कण कण में जिसका आभास हैं यही महारास हैं यही महारास हैं
हो तारों में नर्तन फूलों में उल्लास हैं , यही ...
मुरली की प्रतिध्वनि दिशाओं के पास हैं , यही ...
हो अध्यात्मिक चेतना का सबमे विकास हैं , यही महारास हैं यही महारास हैं।
रास लीला प्रेम रस के साधकों के लिए अद्भुत अनुभूति हैं । यह इतनी पवित्र और रसमयी की स्वयं शिव जी गोपी बनकर रासलीला में प्रगट हुए , जिसके स्थान पर वृदावन में भगवन शिव का गोपेश्वर महादेव मन्दिर बना हैं।
!! राम !!
!! हरि ॐ !!
बापूजी का शुभाशीर्वाद आप पर सदा बना रहे ।
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