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रविवार, 15 नवंबर 2009

एक कविता /कंपनी/ ऑफिस आदि कि टुच्ची राजनीति / सरल कुमार को गुस्सा क्यों आता है



सरल कुमार एक कम्पनी कर्मचारी भी है । कई कंपनियों के कर्मचारिओं के आपसी सबंधो से सबको परेशानी होती है । इसी माहौल को चरितार्थ करती है ये कविता । आशा है आपको पसंद आएगी

धन्यवाद भेज देना नही तो हो सकता है कि एक प्रतिभाहीन कवि समय से पहले निराश हो जाए । फ़िर आप क्यों जिम्मेदार रहे किसी को हतोत्साहित करने के लिए । ये काम तो सरल कुमार के लिए उसके हालत ही कर देंगे। तो कविता का झूठा आनंद उठाये और अपने कीमती समय को इस बोरिंग कविता से अर्थहीन बनायें , तो यहाँ से शुरू होती है कविता ----

उनकी उलझी गुत्थी को सुलझाने में हमारा माथा दुःख जाता है

सबके उल्टे कामो से हमारा कोमल दिल टूट जाता है

और फ़िर उनको लगता है कि मुझे गुस्सा बहुत आता है ..

उनकी टेढी चालों से बस उनका हित सध जाता है

उनके स्वार्थ में लिप्त हर काम प्रोफेशनल कहलाता है

कोई किसी का नही यहाँ पर बस पैसों का ही नाता है

गुस्सा ही दीखता उनको प्यार मेरा छुप जाता है

उनकी हर गलती पर मैं हैरान कभी नही होता हूँ

बस उनके बुरे वक्त के आ जाने से मैं डरता हूँ

जब हंस के हिस्से कि खुशी कौवा लूट ले जाता है

पता नही तब उनको लगता है कि मुझे गुस्सा बहुत आता है।

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दूसरी कविता है , हालाँकि ये थोडी inspired है ( चोरी कि हुई है जसपाल भट्टी जी के फ्लॉप शो से ,आख़िर सरल कुमार कोई अनु मलिक से कम थोड़े ही है inspiration लेने में ) अपनी नासमझी की वजह से शायद सरल कुमार उपहास का पात्र तो बन ही जाता है

ये ऑफिस है बेईमानो का हैवानो का , इस ऑफिस का यारों क्या कहना

घूमे निठ्ठले यहाँ सारे बारों में , खड़े सीधे बेचारे बेकारों में

क्रेडिट सारा झूठे ले जाते हैं , सच्चे तो काम कि कीमत भी नही पाते हैं

चमचों कि तरक्की मिनटों में , सीधो को पेनाल्टी सेकंडों में

यहाँ काम की कीमत जीरो है , यहाँ बॉस का चमचा हीरो है ,


सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...