अभी हम सात अवतारों की चर्चा कर चुके हैं । अब इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हैं ।
आठवां अवतार ( सुयग्य भगवान् )
इस अवतार का बहुत ही कम वर्णन हुआ हैं । प्रजापति रूचि का विवाह पहले मनु की बेटी आकूति से हुआ था ।तब ब्रह्मा जी आज्ञा से एक यज्ञ करवाया गया जिसमे से रूचि और आकूति जी के पुत्र और पुत्रवधू प्रगट हुए ।यही थे भगवान् सुयज्ञ और माता लक्ष्मी । सुयज्ञ जी को कुछ दिन के लिए उनके नाना मनुजी अपने साथ ले गए ।भगवान् सुयज्ञ और माता लक्ष्मी के बारह पुत्र हुए जो तुषित आदि नामो से जाने गए । इस अवतार का मुझे अभी इतना ही पता चला हैं ।
नौवां अवतार ( भगवान् नर नारायण )
धर्मराज जी और मूर्ती ( ये पार्वती जी के पिछले जन्म की बहन थी अर्थात दक्ष और प्रसूति की बेटी थी । )
ने अपने पिछले जन्म की तपस्या के फलस्वरूप ( ये पिछले जन्म में पृश्नी और सुतपा थे ) भगवान् को पुत्र रूप में पाया । भगवान् विष्णु ने अपने दो अंश रूप में जन्म लिया । हालांकि अवतारों की गिनती एक ही मानी जाएगी ।
नर नारायण के रूप में ये दोनों आजन्म ब्रह्मचारी रहे । नारायण इसमें स्वयं भगवान् के अंशरूप हैं । इसमें नर छोटे भाई बने और बाद में द्वापर युग में श्री कृष्ण के साथ धनुर्धारी पांडव अर्जुन बनकर आये ।
उर्वशी अप्सरा भगवान् के इसी अवतार में इंद्र के वैभव और अप्सराओं को तुच्छ बताने के लिए अपनी जांघ से प्रगट की थी । भगवान् नारद जी इनके पास सबसे अधिक समय रहे थे । यहाँ की तपस्या के प्रभाव से ही नारद जी की पूर्णब्रह्म में दृढ स्थिति प्राप्त हुई । भगवान् नारायण जी ने ही नारद जी को महामंत्र दिया जो आज कलयुग में बहुत बहुत प्रसिद्ध हैं । हालांकि बाद में चैतन्य महाप्रभु ने भी इसी महामंत्र को और लोकप्रिय बनाया ।
ये महामंत्र आप सभी जानते होंगे :
" हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
दसवां अवतार ( भगवान् पृथु )
प्रथम मनु के दो पुत्र हुए प्रियव्रत और उतानपाद । उतानपाद के प्रसिद्ध पुत्र हुए ध्रुव जो बचपन में श्री हरि की तपस्या करने चले गए और सगुण इश्वर को प्रगट किया । इनके बारे में भी सभी जानते होंगे । ध्रुव से छः पीढ़ी बाड़ा राजा अंग हुए । उनके बेटे वेन हुए । ये बहुत ही दुष्ट थे । इनके कोई संतान नहीं थी । इनकी मृत्यु के बाद इनके शव को देखकर ऋषि मुनि और राजा गण चिंतित थे की उत्तराधिकार कौन होगा ।
अब आपस में विचार किया गया और इनकी दायीं भुजा का मंथन किया गया जिसमे से भगवान् विष्णु स्वयं पृथु अवतार में प्रगट हुए । इन्होने पुनः वेन के काल में किये सारे बुरे कर्मो को दूर करके प्रजा में धर्म की स्थापना की । धरती के अंश से एक कन्या प्रगट हुई । जिसका नाम पृथु जैसा ही पृथ्वी रखा गया , तभी से धरती को पृथ्वी कहा गया । भगवान् पृथु के दस प्रसिद्ध पुत्र भी हुए जो प्रचेता के नाम से जाने गए । इन्होने अपनी तपस्या से शिव जी और विष्णु जी को सगुण रूप में प्रगट किया ।
ग्यारहवां अवतार ( भगवान् ऋषभदेव )
पहले मनु के पुत्र प्रियव्रत की शादी विश्वकर्मा जी हुई और उनके आग्नीध्र आदि प्रसिद्ध पुत्र हुए । आग्नीध्र के तीन पुत्र हुए उत्तम , तामस और रैवत , ये तीनो बाद में क्रमशः मनु भी बने । आग्नीध्र की पुत्री उर्ज्स्वती का विवाह शुक्राचार्य से हुआ जिससे देवयानी प्रगट हुई जो राजा ययाति की पत्नी बनी ।
राजा आग्नीध्र ने एक अप्सरा पूर्वचिती से विवाह किया जिससे राजा नाभि का जन्म हुआ । इन्ही राजा नाभि और उनकी पत्नी मेरु देवी से भगवान् ऋषभदेव का जन्म हुआ । इन्होने फिर पुनः धर्म को स्थापित किया और अपने आखिरी समय में वन को चले गए । इनके सौ पुत्र हुए । इन्होने अपने पुत्र भरत को राज्य दिया । इनके नब्बे पुत्र तो साधना से मोक्ष को प्राप्त हुए । इनके नौ योगेश्वर पुत्र अभी भी जीवित माने जाते हैं । ये परम विद्वानों से बात करते हैं ।
इन्ही राजा भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा पहले यह अजनाभखंड के नाम से प्रसिद्ध था ( कुछ लोग दुष्यंत और शकुन्तला के पुत्र भरत के पुत्र के नाम से मानते हैं वो गलत धारणा हैं , शास्त्रों में भारत का नाम भगवान् के पुत्र भरत के नाम पर बदले जाने के साक्ष्य हैं । ) राजा भरत की पूरी कथा , जो इनकी हिरन में आसक्ति , पुनर्जन्म और रहुगन से इनकी भेंट आदि आप श्रीमद भागवत में भी पढ़ सकते हैं । मुझे समय मिला तो किसी पोस्ट में वर्णन करूँगा ।
अब बाकी बचे तीन अवतार - भगवान् हंस , हयग्रीव और चौदहवां अवतार .
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रविवार, 10 जनवरी 2010
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