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रविवार, 10 जनवरी 2010

वंशावली भाग दस - भगवान् के चौदह अंशावतार ( नर नारायण ,, पृथु , ऋषभदेव

अभी हम सात अवतारों की चर्चा कर चुके हैंअब इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हैं

आठवां अवतार ( सुयग्य भगवान् )

इस अवतार का बहुत ही कम वर्णन हुआ हैंप्रजापति रूचि का विवाह पहले मनु की बेटी आकूति से हुआ थातब ब्रह्मा जी आज्ञा से एक यज्ञ करवाया गया जिसमे से रूचि और आकूति जी के पुत्र और पुत्रवधू प्रगट हुएयही थे भगवान् सुयज्ञ और माता लक्ष्मीसुयज्ञ जी को कुछ दिन के लिए उनके नाना मनुजी अपने साथ ले गएभगवान् सुयज्ञ और माता लक्ष्मी के बारह पुत्र हुए जो तुषित आदि नामो से जाने गएइस अवतार का मुझे अभी इतना ही पता चला हैं

नौवां अवतार ( भगवान् नर नारायण )

धर्मराज जी और मूर्ती ( ये पार्वती जी के पिछले जन्म की बहन थी अर्थात दक्ष और प्रसूति की बेटी थी । )
ने अपने पिछले जन्म की तपस्या के फलस्वरूप ( ये पिछले जन्म में पृश्नी और सुतपा थे ) भगवान् को पुत्र रूप में पायाभगवान् विष्णु ने अपने दो अंश रूप में जन्म लियाहालांकि अवतारों की गिनती एक ही मानी जाएगी
नर नारायण के रूप में ये दोनों आजन्म ब्रह्मचारी रहेनारायण इसमें स्वयं भगवान् के अंशरूप हैंइसमें नर छोटे भाई बने और बाद में द्वापर युग में श्री कृष्ण के साथ धनुर्धारी पांडव अर्जुन बनकर आये

उर्वशी
अप्सरा भगवान् के इसी अवतार में इंद्र के वैभव और अप्सराओं को तुच्छ बताने के लिए अपनी जांघ से प्रगट की थीभगवान् नारद जी इनके पास सबसे अधिक समय रहे थेयहाँ की तपस्या के प्रभाव से ही नारद जी की पूर्णब्रह्म में दृढ स्थिति प्राप्त हुईभगवान् नारायण जी ने ही नारद जी को महामंत्र दिया जो आज कलयुग में बहुत बहुत प्रसिद्ध हैंहालांकि बाद में चैतन्य महाप्रभु ने भी इसी महामंत्र को और लोकप्रिय बनाया
ये महामंत्र आप सभी जानते होंगे :
" हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"


दसवां अवतार ( भगवान् पृथु )
प्रथम मनु के दो पुत्र हुए प्रियव्रत और उतानपादउतानपाद के प्रसिद्ध पुत्र हुए ध्रुव जो बचपन में श्री हरि की तपस्या करने चले गए और सगुण इश्वर को प्रगट कियाइनके बारे में भी सभी जानते होंगेध्रुव से छः पीढ़ी बाड़ा राजा अंग हुएउनके बेटे वेन हुएये बहुत ही दुष्ट थेइनके कोई संतान नहीं थीइनकी मृत्यु के बाद इनके शव को देखकर ऋषि मुनि और राजा गण चिंतित थे की उत्तराधिकार कौन होगा

अब
आपस में विचार किया गया और इनकी दायीं भुजा का मंथन किया गया जिसमे से भगवान् विष्णु स्वयं पृथु अवतार में प्रगट हुएइन्होने पुनः वेन के काल में किये सारे बुरे कर्मो को दूर करके प्रजा में धर्म की स्थापना कीधरती के अंश से एक कन्या प्रगट हुईजिसका नाम पृथु जैसा ही पृथ्वी रखा गया , तभी से धरती को पृथ्वी कहा गयाभगवान् पृथु के दस प्रसिद्ध पुत्र भी हुए जो प्रचेता के नाम से जाने गएइन्होने अपनी तपस्या से शिव जी और विष्णु जी को सगुण रूप में प्रगट किया


ग्यारहवां अवतार ( भगवान् ऋषभदेव )

पहले मनु के पुत्र प्रियव्रत की शादी विश्वकर्मा जी हुई और उनके आग्नीध्र आदि प्रसिद्ध पुत्र हुएआग्नीध्र के तीन पुत्र हुए उत्तम , तामस और रैवत , ये तीनो बाद में क्रमशः मनु भी बनेआग्नीध्र की पुत्री उर्ज्स्वती का विवाह शुक्राचार्य से हुआ जिससे देवयानी प्रगट हुई जो राजा ययाति की पत्नी बनी
राजा आग्नीध्र ने एक अप्सरा पूर्वचिती से विवाह किया जिससे राजा नाभि का जन्म हुआइन्ही राजा नाभि और उनकी पत्नी मेरु देवी से भगवान् ऋषभदेव का जन्म हुआइन्होने फिर पुनः धर्म को स्थापित किया और अपने आखिरी समय में वन को चले गएइनके सौ पुत्र हुएइन्होने अपने पुत्र भरत को राज्य दियाइनके नब्बे पुत्र तो साधना से मोक्ष को प्राप्त हुएइनके नौ योगेश्वर पुत्र अभी भी जीवित माने जाते हैंये परम विद्वानों से बात करते हैं

इन्ही राजा
भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा पहले यह अजनाभखंड के नाम से प्रसिद्ध था ( कुछ लोग दुष्यंत और शकुन्तला के पुत्र भरत के पुत्र के नाम से मानते हैं वो गलत धारणा हैं , शास्त्रों में भारत का नाम भगवान् के पुत्र भरत के नाम पर बदले जाने के साक्ष्य हैं । ) राजा भरत की पूरी कथा , जो इनकी हिरन में आसक्ति , पुनर्जन्म और रहुगन से इनकी भेंट आदि आप श्रीमद भागवत में भी पढ़ सकते हैंमुझे समय मिला तो किसी पोस्ट में वर्णन करूँगा

अब बाकी बचे तीन अवतार - भगवान् हंस , हयग्रीव और चौदहवां अवतार .

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...