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बुधवार, 13 जनवरी 2010

हम मकर संक्राति और लोहड़ी हमेशा तेरह और चौदह जनवरी को ही क्यूँ मनाते हैं

सिर्फ मकर संक्रांति और लोहड़ी ही अकेले ऐसे त्यौहार हैं जो हमेशा क्रमशः तेरह और चौदह जनवरी को मनाये जाते हैं । इसका कारन यह यह कि ये सिर्फ ये दोनों त्यौहार सूर्य की गति पर निर्धारित होते हैं । इस दिन सूर्य उत्तर दिशा की और बढ़ते हैं, हालंकि वास्तव में पृथ्वी की धुरी बदलती हैं लेकिन लगता ऐसा हैं की सूर्य उत्तर को जा रहे हैं । जिससे मकर संक्राति से तापमान बढना शुरू हो जाता हैं । लोहड़ी हमेशा रात को मनाते हैं । वो सूर्य के उत्तरायण होने का स्वागत करने के लिए पहली रात में सूर्य के प्रतीक रूप अग्नि या आग जलाकर मनाई जाती हैं। हालाँकि बाद में फिर इसे पंजाबी नववधुओं के आगमन के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा ।
वैसे यही मकर संक्राति का दिन हैं जिसका महत्त्व जानने वाले भीष्म पितामह ने तीन महीने तक बाणों की शैया पर मृत्यु का इंतज़ार किया और इसी दिन अपनी मृत्यु स्वीकार की .

हम सभी जानते हैं कि हिन्दू , सिख और मुस्लिम धर्म के कैलेंडर चाँद की गति पर आधारित हैं। और अंग्रेजी कैलेंडर सूर्य की गति पर आधारित हैं । इसी लिए कभी भी हिन्दू , सिख या मुस्लिम धर्म का कोई त्यौहार इंग्लिश कैलेंडर की तारिख से मेल नहीं खाता हैं ।

इसीलिए और सब त्यौहारों की तरह ये कभी आगे पीछे नहीं होते जैसे होली या दीवाली आगे और पीछे सरक जाते हैं । ऐसा इसीलिए होता हैं क्योंकि हिन्दू धर्म में चाँद का महीना 29.3 दिन का होता हैं अगर इसमें दो तीन चाँद की गति का अंतर हो तो तीन सौ पचपन दिन का साल होगा । इसीलिए हर तीन साल बंद हिन्दू धर्म में एक महीना जोड़ देते हैं जिसे अधिक मास या लौंद का महीना कहते हैं ।

सुबह सुबह फेसबुक पर अपडेट कि हैं सोचा यहाँ भी डाल देता हू । पल पल मुश्किल होती जिंदगी आसान लगती हैं प्रभु तेरी बंदगी जी जी कर भी क्या हासिल ...