मेरे पोस्ट ज्यादातर यथार्थ , दुःख और धर्म से जुड़े होते हैं । असल में जीवन में यही सब देखा हैं इसीलिए क्रिकेट ,फ़िल्मी मस्ती , राजनीति में अब मजा नहीं आता हैं । बीस साल ( अभी तीस ) तक कि उम्र तक ही सब देखकर लगा कि दुनिया में कही गड़बड़ हैं । माया मोह समाज धर्म को समझने कि कोशिश कि तो थोडा थोडा वैराग्य आया । इंजीनियरिंग पूरी करते करते दोस्त तो प्रोफेशनल हो चुके थे पर मैं एक सन्यासी जैसे साधारण हो चुका था। कोई ज्यादा अच्छा बुरा सोचा नहीं हर चीज़ को गहरे में उतरने नहीं दिया सिवाय धर्म और वैराग्य के ।
खैर मैं ये सब बाते इसीलिए लिख रहा हूँ आप में से बहुत से लोग सच में बहुत अच्छे हैं जो टिपण्णी भी देते हैं जबकि मैं खुद किसी को टिपण्णी नहीं देता हूँ । सारे समाज को देखकर लगता हैं कि जैसे हम सब मदहोश से जी रहे हैं बिना किसी मार्गदर्शन के । बस शायद सत्तर अस्सी साल कि उम्र तक होकर मर जाने के लिए सारा संघर्ष हैं । साथ के कई दोस्त देहांत को प्राप्त हो चुके हैं । अभी कल ही मेरी एक एक्स क्लास मेट (MBA में ) कि मृत्यु का पता चला । सारा प्रोफेशनल और इंजीनियरिंग प्रोफाइल धडाक धूम । सब इतना ख़राब लगता हैं कि जीने का मन नहीं करता ।
कहाँ हम सरकारों में कमी निकालते हैं । पर घर में एक साथ कुछ दुर्घटना हो जाये तो बस सब ख़त्म । फिर आप समाज से लगभग पांच छ साल पीछे चले जाते हो क्योंकि आपको भावनाए समाज के साथ संतुलन नहीं बनाने देती । सांसारिक काम इतने मुश्किल लगते हैं कि लगता हैं क्यों हम सब जैसे जिंदगी को बोझे कि तरह ढोए जा रहे हैं । जैसे एक सच्चा उदहारण बताता हूँ । मेरे पिता जी 2004 में मेरे इंजीनियरिंग के आखिरी साल में स्वर्गवासी हुए । अब क्योंकि मेरे अकेले के लिए तो एग्जाम डेट बदलेंगी नहीं । साल ख़राब होगा , यहाँ जिंदगी ख़राब हो गयी और प्रोफेशनल सोच कह रही हैं कुछ और ।
उस महीने में हम दूरसंचार इंजिनियर के लिए G P S तकनीकी कि ट्रेनिंग भी मिली और मैंने उसमे अच्छे नम्बर भी लाये । पर क्या ये सही लगता हैं कि जिंदगी कि मूलभूत चीजों को छोड़कर हम बेमतलब कि तथाकथित वैज्ञानिक जानकारी और भी ना जाने क्या क्या प्रोफेशनल एप्रोच जैसे भंवर जहाँ एक आदमी खो जाता हैं ।
सब कहते हैं कि ईश्वर दयालु हैं । और वो वास्तव में हमारी अपेक्षा से ज्यादा दयालु हैं । फिर भी हम उसकी तरफ जाने में क्यों आलसी हो जाते हैं ।
मेरी तो उम्र खैर तीस साल ही हैं पर मैंने साठ सत्तर साल के लोगो को दुनिया के मामलो में बुरी तरफ फंसे देखा और ऊपर से मुझ जैसे बन्दों को भी नसीहते देते सुना कि बेटा अपने कम धंधे करो परिवार से निभाओ आदि आदि बाते । ये सब बाते तो हम कर ही रहे हैं । पर दिक्कत यही तो हैं कि हमसे ये दुनिया ये जिंदगी कभी भी छीन सकती हैं , और बस कुछ व्यावहारिक लोग हमारी मृत्यु पर बाते ही बनाते दिखेंगे कि बंदा अच्छा था बुरा , ऐसे हुआ वैसे हुआ । और फिर पंद्रह दिन बाद फिर जिंदगी वही ।
अभी जैसे ब्लॉग को ही ले । मुझे किसी ने पिछले साल कहा था कि ये एक अच्छा मंच हैं । पर अब यहाँ भी वही अखबार और मीडिया के लोगो ने गन्दगी फैलाकर हिन्दू मुस्लिम माहौल तैयार कर दिया हैं ।
पता नहीं छः सो ग्राम के दिमाग से उस ईश्वर को जज करते हैं जो खुद कहता हैं कि मुझे कोई नहीं जनता । वैसे एक दो पोस्ट मैंने इस पर भी लिखी थी पर कुछ ज्ञान शिरोमणि मुझे सीख देने आ गए कि ये तो सरल रस्ते हैं और आपकी ये बाते तो पहले भी लिखी हैं । बड़ी मुश्किल से ऐसे लोगो से चरण वंदना करके बचता हूँ । इनमे से दो के लिंक ये हैं
ईश्वर को कैसे जाने
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_06.html
ईश्वर प्राप्ति के सरल साधन
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html
जीवन का उद्देश्य
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_1312.html
हर बात के बात मेरे कहने का मतलब यही हैं क्यों नहीं हम सब एक दुसरे को प्यार करते , क्यों नहीं मदद करते एक दुसरे कि , समर्थन क्यों नहीं करते । पता नहीं कितने दिन कि जिंदगी हैं सब क्यों बरबाद करे ऐसी बातो में कि हिन्दू बड़े या मुस्लिम । कांग्रेस या भाजपा , अमेरिका या चीन ।
सारा संक्षेप तो यही हैं कि व्यवहार के लिए थोडा थोडा तो करें पर व्यर्थ समय ख़राब करके एक एक घंटे न्यूज़ वालो से बहस करना ठीक नहीं हैं । हमने बस टाइम पास करना होता हैं । कभी उस ईश्वर से भी पूछे कि तू क्या चाहता हैं । तेरे इस एक तरफा प्यार पर हमें अपनी शरण में ले क्यों हम डरे और डरे , फंसे और फंसाए .
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
कविता प्यार की - भाग दो
इस कड़ी में ये मेरी दूसरी कविता हैं । असल में पहले सोचा कि इन्हें भागो में ब्लॉग में ना डालू पर समरूप होने के कारन कविता कि मौलिकता नष्ट नहीं होती और पढने वाले के विचारो में तादात्मय स्थापित रहता हैं । अब क्योंकि मन में भावुकता ज्यादा हैं तो सोचा प्यार के विषय पर शायद काफी कविताये लिख सकता हूँ। वैसे ये सब कुछ अनुभव पर आधारित हैं । आशा हैं आपको थोड़ी बहुत तो पसंद आएगी ही भले ही आपने प्यार को महसूस किया हो या ना किया हो ।
इस कविता का पहला भाग ये हैं, जिसने नहीं पढ़ा हो कृपया लिंक देखे
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_9229.html
कोई और मुझे अब भाती नहीं , और वो मुझे अपनाती नहीं
मेरी जिंदगी घडी भर उसके बिना कटी नहीं
पर उसकी नज़र मेरी तरफ उठी ही नहीं
मुझे लगता हैं कि मेरे प्यार में ये कमी हैं
कि आँखों में दुखो से भी ज्यादा नमी हैं
उसके आंसू पोंछने की शायद सजा मिल गयी हैं
उसको सहारा देते देते मेरी जमीन हिल गयी हैं
यूँ तो मेरे हालात पर लगभग सब लोग तरस खाते हैं
पर ज्ञान के चरम बिन्दु इसे पञ्च तत्वों का मोह बताते हैं
प्यार का सागर जब उसके लिए बह उठा
तो प्यार बंटता देख ईश्वर भी कह उठा
अब तेरे दिल में सिर्फ मेरे लिए प्यार नहीं
वीरेन अब मुझसे होगा तेरा उद्धार नहीं
ईश्वर जानता हैं कि वो मुझे चाहती ही नहीं
उसके दिल में मेरे लिए कोई प्रेम पाती भी नहीं
फिर क्यों मैं एकतरफा प्यार में मर गया हूँ
फूल अर्थी पर चढ़कर जैसे सज गया हूँ
पता नहीं गलती से किस रस्ते पर मुड गया हूँ
बीच चौराहे पर जैसे अकेला लुट गया हूँ
संसार में जैसे मुझे कुछ कमाना नहीं हैं
जिंदगी में मुझे अब कुछ पाना नहीं हैं
सब ख़त्म ऐसे हुआ कि रो पड़ता हूँ
बिछुड़ा अपनों से कि खो सकता हूँ
मेरी आँखों के आंसू मुझसे सहन नहीं होते
क्यों कभी सच्चे प्यार नसीब में नहीं होते
दर्द से भरी इस दुनिया में कभी गरीब ना होते
ईश्वर अगर आप हमारे इतने करीब ना होते
अभी बस थोड़ी ही पंक्तिया ही बना पाया हूँ । आगे और भागो में बनाने और आपको भेजने कि कोशिश करूँगा .
इस कविता का पहला भाग ये हैं, जिसने नहीं पढ़ा हो कृपया लिंक देखे
http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_9229.html
कोई और मुझे अब भाती नहीं , और वो मुझे अपनाती नहीं
मेरी जिंदगी घडी भर उसके बिना कटी नहीं
पर उसकी नज़र मेरी तरफ उठी ही नहीं
मुझे लगता हैं कि मेरे प्यार में ये कमी हैं
कि आँखों में दुखो से भी ज्यादा नमी हैं
उसके आंसू पोंछने की शायद सजा मिल गयी हैं
उसको सहारा देते देते मेरी जमीन हिल गयी हैं
यूँ तो मेरे हालात पर लगभग सब लोग तरस खाते हैं
पर ज्ञान के चरम बिन्दु इसे पञ्च तत्वों का मोह बताते हैं
प्यार का सागर जब उसके लिए बह उठा
तो प्यार बंटता देख ईश्वर भी कह उठा
अब तेरे दिल में सिर्फ मेरे लिए प्यार नहीं
वीरेन अब मुझसे होगा तेरा उद्धार नहीं
ईश्वर जानता हैं कि वो मुझे चाहती ही नहीं
उसके दिल में मेरे लिए कोई प्रेम पाती भी नहीं
फिर क्यों मैं एकतरफा प्यार में मर गया हूँ
फूल अर्थी पर चढ़कर जैसे सज गया हूँ
पता नहीं गलती से किस रस्ते पर मुड गया हूँ
बीच चौराहे पर जैसे अकेला लुट गया हूँ
संसार में जैसे मुझे कुछ कमाना नहीं हैं
जिंदगी में मुझे अब कुछ पाना नहीं हैं
सब ख़त्म ऐसे हुआ कि रो पड़ता हूँ
बिछुड़ा अपनों से कि खो सकता हूँ
मेरी आँखों के आंसू मुझसे सहन नहीं होते
क्यों कभी सच्चे प्यार नसीब में नहीं होते
दर्द से भरी इस दुनिया में कभी गरीब ना होते
ईश्वर अगर आप हमारे इतने करीब ना होते
अभी बस थोड़ी ही पंक्तिया ही बना पाया हूँ । आगे और भागो में बनाने और आपको भेजने कि कोशिश करूँगा .
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