शनिवार, 14 नवंबर 2009

एक कविता

सरल कुमार के हृदय से निकली ये आधी अधूरी कविता आपको ज्यादा पसंद नही आएगी ।
क्योंकि उसकी प्रतिभा पर आपसे ज्यादा उसे शक है । पर खाली पीली दिमाग का दही करने की बात ही और है
बधाई लिख कर न भेजे नही तो सरल कुमार समझ जाएगा की आप झूठ बोल रहे है




1 टिप्पणी:

kunwarji's ने कहा…

झूठ बोलने से तो आपने ही मना कर दिया और सच बोलने का अब रिवाज सा नहीं रहा...........


अब हमारे कहने के लिए रह ही क्या गया है.

वैसे अब आप इसे पूरी ही कर देते तो . .............. ................



झेल लेंगे जी पूरी को भी..........










ज्यदा तो नहीं हो गया सर जी.........

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